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क्या सोशल नेटवर्क चुनाव परिणामों में निहित विस्मय पर पानी फेर सकता है ?

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  • क्या सोशल नेटवर्क चुनाव परिणामों में निहित विस्मय पर पानी फेर सकता है ?
    क्या सोशल नेटवर्क चुनाव परिणामों में निहित विस्मय पर पानी फेर सकता है ?

२०१९ का वर्ष, और विश्व के सबसे वृहद लोकतंत्र भारत में चुनाव, अपने पूरे उमंग और ज़ोर शोर के साथ अभी-अभी सम्पन्न हुआ है । बीते अन्य वर्षों के समान, ९०करोड़ लोगों का उत्साह बढ़ाने एवं अपने मताधिकार के उपयोग के लिए उन्हें प्रेरित करने के बाद कई पुराने कीर्तिमान टूटे और नए स्थापित हुये | इस व्यापक अभ्यास से पता चलता है कि चुनाव परिणाम की सटीक भविष्यवाणी करना कितना चुनौती-पूर्ण है | यद्यपि राय एवं मत आधारित पूर्वानुमान (ओपिनियन एवं एक्ज़िट पोल) उनकी भविष्यवाणियों को थोड़ा उजागर करते हैं, किंतु यहाँ पर ‘आश्चर्य’ नामक एक तत्व भी होता है जो जनता और बाजारों को हिला कर रख देता है | सामाजिक जन-प्रसार माध्यमों के आगमन के साथ ही राजनीतिक दलों ने भी अपने-अपने चुनाव अभियानों को नए सिरे से तैयार किया है, और वांछित दर्शकों तक सुगमता से पहुँच स्थापित करने के लिए रणनीति तैयार की है | तो, क्या ये सामाजिक जन-प्रसार जालक अर्थात सोशल नेटवर्क आने वाले चुनाव परिणामों का सुराग दे सकता है ?

जी हाँ, आई.आई.टी. खड़गपुर, आई.आई.टी. कानपुर एवं प्रिन्सटन विश्वविद्यालय, यूएसए के शोधार्थियों द्वारा किये गए एक सहयोगात्मक अध्ययन के अनुसार यह बिलकुल संभव है | चुनाव परिणामों में ‘आश्चर्य' तत्व का विश्वसनीय पूर्वानुमान लगाने एवं इसे कम करने की संभावनाओं पर सुझाव देने के लिए उन्होंने मतदाताओं के ऑफ-लाइन एवं ऑन-लाइन सामाजिक जन-प्रसार जालक के आधार पर एक प्रतिरूप अर्थात मॉडल की संरचना की है | यह अध्ययन डाटा साइंस और डाटा प्रबंधन पर आधारित एसीएम इंडिया संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के कार्य-विवरण में प्रकाशित किया गया है |

आई.आई.टी. कानपुर के डॉ. स्वप्रभ नाथ, जो इस अध्ययन के एक प्रमुख अनुसंधान-कर्ता हैं, के अनुसार “चुनाव में आश्चर्य केवल निकटतम प्रतिद्वंद्विता वाले चुनावों से संबंधित एक घटना है ”| ‘आश्चर्य तत्व’ जो मतदाता के दृष्टिकोण से परिभाषित होता है, एक ऐसा परिदृश्य है, जो तब सामने आता है, जब मतदाताओं का अपेक्षित प्रत्याशी जीत नहीं पाता | “हमारा लक्ष्य है, सामाजिक जन-प्रसार जालक से जुड़े हुये एक मतदाता के लिए इस आकस्मिक परिणाम का अनुमान लगाना और सामाजिक जन-प्रसार जालक पर स्थित उसके संपर्क-संवाद के माध्यम से विजयी होने वाले अभ्यर्थी का पता लगाना,” वह बतलाते हैं |

प्रत्याशी की स्थिति के बारे में मतदाताओं की जानकारी का स्रोत उनके ऑन-लाइन एवं ऑफ-लाइन दोनों प्रकार के सामाजिक संबंध होते हैं | आश्चर्य तत्व पर मीडिया का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है, किंतु इसका अन्वेषण, शोध के इस प्रारंभिक चरण में न रखकर भविष्य की कार्य योजना में शामिल है | सम्बन्धों की जानकारी और उनकी प्राथमिकताओं के आधार पर (जिसका अनुमान लगाना आसान होता है, क्योंकि वे सामाजिक रूप से अत्यंत निकट होते हैं, और एक मतदाता अपने इन सामाजिक पड़ोसियों की गति-विधि का सामाजिक जन-प्रसार माध्यम पर अनुगमन कर सकता है) वे एक बुद्धिमत्तापूर्ण अनुमान लगाते हैं, कि कौन सा प्रत्याशी/दल विजयी होगा| और जब यह अनुमान सही साबित नहीं होता तो मतदाता को आश्चर्य होता है क्योंकि वह इस के लिए तैयार नहीं होता ।

इस अध्ययन के शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तावित गणितीय प्रतिरूप अर्थात मैथमेटिकल मॉडल, सामाजिक जन-प्रसार जालक के 'होमोफिली प्रभाव' से प्रेरित है | इसके अनुसार लोग सामान्यत: समान मानसिकता वाले अन्य लोगों के साथ संबंध बनाने की प्रवृत्ति रखते हैं | प्रतिरूप दिखाता है कि जब 'अनुमानित पूर्वाग्रह ' और 'वास्तविक पूर्वाग्रह ' के मध्य का अंतर एक सीमा से अधिक हो जाता है तब चुनावी परिणाम एक 'आश्चर्य' के रूप में उभर कर सामने आता है |

अनुमानित पूर्वाग्रह दूसरे मतदाता (फिर चाहे वो समान अथवा विरोधी राजनैतिक विचारधारा रखता हो) से संबंध का अनुमान है जबकि वास्तविक पूर्वाग्रह संबंध की वास्तविक संभावना है | इन दोनों पूर्वाग्रहों के मूल्य ज़रूरी नहीं कि एक से हों, अत: एक मतदाता वास्तविकता से बहुत दूर किसी प्रत्याशी के विजेता होने का मिथ्या अनुभव कर सकता है, जो परिणाम घोषित होने के बाद उसके लिए विस्मयकारी होता है |

मतदानों के अलग अलग नियम होते हैं जिनके अनुसार जनादेश को व्यक्त किया जा सकता है | कुछ चुनाव ‘बहुलता’ का उपयोग करते हैं (भारतीय आम चुनावों में यही होता है), जहाँ मतदाता केवल अपने मन-चाहे प्रत्याशी को मत देते हैं एवं अधिकतम मत प्राप्त करने वाला प्रत्याशी विजयी होता है | यद्यपि, एक अन्य मतदान नियम ‘बोरडा स्कोरिंग’ के अनुसार मतदाता, प्रत्याशियों को एक श्रेणी या रैंक प्रदान करते हैं और प्रत्येक पद को एक भार प्रदान किया जाता है – अधिकतम गुरुता भार अर्थात वेट प्राप्त करने वाला प्रत्याशी विजयी घोषित होता है | इसी प्रकार एक और नियम 'वीटो' के अंतर्गत प्रत्येक मतदाता किसी  एक प्रत्याशी को अस्वीकार कर देता है | प्रस्तुत अध्ययन इस बात का अन्वेषण करता है कि चुनाव में 'आश्चर्य' क्यों और कैसे होता है | प्रतिरूप और इसके अनुभवजन्य परीक्षण बताते हैं कि किसी भी प्रकार का मतदान नियम, मतदाताओं के समस्त वर्गों के लिए ‘आश्चर्य‘ को कम नहीं कर सकता है, अर्थात किसी मतदान नियम विशेष को आगे रखने से समस्त मतदाताओं के लिए विस्मयकारी या चमत्कारिक परिणाम नहीं आएँगे, इस बात की संभावना बहुत ही क्षीण है, विशेष कर जब चुनाव प्रतिद्वंद्विता अत्यंत निकटतम हो |

शोधकर्ताओं ने 'ब्रेक्सिट' नामक लोकप्रिय यूके-ईयू जनमत संग्रह के आँकड़ों का उपयोग करके अपने प्रतिरूप का परीक्षण किया है | यह २०१६  में आयोजित एक जनमत संग्रह था जिसमें यूनाइटेड किंगडम ने यूरोपीय संघ को छोड़ने के लिए मतदान किया था | यह एक निकटतम प्रतिद्वंद्विता वाला चुनाव था, जिसके दो पक्ष थे – छोड़ना या बने रहना | और आखिरकार यूरोपीय संघ को छोड़ने के पक्ष में आने वाला जनादेश सारे विश्व को चौंकाने वाला था, या एक आश्चर्य /झटके से कम नहीं था | शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रतिरूप से प्राप्त परिणाम उपरोक्त आँकड़ों पर सटीक बैठते हैं |

यद्यपि, किसी एक दल/प्रत्याशी का अपने प्रतिद्वंद्वी पर जीत का अंतर यदि बहुत भारी है तो परिणामों में चौंका देने की संभावना कम होगी, क्योंकि तब मतदाता इस परिणाम की अपेक्षा कर चुका होता है, भले ही  उसके अनुमानित पक्ष में छोटी-मोटी त्रुटियाँ ही क्यों न हों | “इसलिए, यदि किसी चुनाव के लिए वैश्विक परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हैं कि इसके परिणाम चकित नहीं करने वाले हैं, साथ ही आप अपने राजनैतिक पक्षों के एक अच्छे आकलन-कर्ता हैं, तो आपका स्थानीय अवलोकन (जैसे कि आपके मित्रों की मतदान शैली)  विजयी होने वाले प्रत्याशी के बारे में बहुत कुछ व्यक्त कर देता है”, डॉ. नाथ कहते हैं |

अध्ययन बताता है कि परिणाम चमत्कारिक हो सकता है यदि (क) मतदाता अपने पूर्वाग्रह के अच्छे आकलन-कर्ता न हों, और (ख) चुनाव में निकटतम प्रतिद्वंद्विता हो | “यद्यपि चुनाव में विजय किसकी होगी , यह  पूर्वानुमान लगाना आकर्षक प्रतीत होता है, किंतु व्यापक नमूनों और उनके सांख्यिकीय सामान्यीकरण के अभाव में, जो स्वयं में एक अत्यधिक महंगी प्रक्रिया है,  यह (लगभग) असंभव है”, डॉ. नाथ  का निष्कर्ष है |