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निर्णय प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए ग्रामीण स्तर पर बाढ़ जोखिमों की खोज

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निर्णय प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए ग्रामीण स्तर पर बाढ़ जोखिमों की खोज

छायाचित्र : दीपक दास

जलवायु परिवर्तन ने विश्व भर में अप्रत्याशित वातावरण की अवस्थाओं को जन्म दिया है। उग्र चक्रवात, अत्यधिक बाढ़, भयंकर सूखा और अनियंत्रित हो रही जंगल की आग बहुत आम हो चुके हैं। भारत भी इसके प्रभाव से मुक्त नहीं है और यहाँ पिछले कुछ दशकों में बाढ़ संबंधित क्षति पर औसतन ४७४५ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च किए गए हैं। यद्यपि पिछले शोध-कार्यों में बाढ़ संकट से निपटने वाली राष्ट्रीय स्तर की नीतियों के संचालन हेतु वैश्विक जलवायु परिवर्तन मॉडल उपयोग में लाये गए थे, तथापि प्रत्येक गाँव के स्तर पर संकट की भविष्यवाणियाँ कर पाने के लिए इन अध्ययनों से प्राप्त जानकारी पर्याप्त नहीं है।

एक नवीन अध्ययन में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई (आईआईटी बॉम्बे) एवं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर (आईआईटी खड़गपुर) के शोधार्थियों ने अलग-अलग गाँवों में बाढ़ जनित विषमताओं के निर्धारण के लिए, वैश्विक जलवायु मॉडल के साथ साथ स्थानीय वर्षा एवं नदी प्रवाह मॉडल का सम्मलित उपयोग किया। उन्होंने ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के विभिन्न गाँवों के लिए बाढ़ के जोखिमों की भविष्यवाणी करते हुये अपने दृष्टिकोण का प्रदर्शन किया। इसरो – आईआईटीबी अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी प्रकोष्ठ तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार (एसपीएलआईसीई -जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम) द्वारा वित्त-पोषित यह अध्ययन साइंस ऑफ दि टोटल एनवायरनमेंट नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया था।

जगतसिंहपुर महानदी बेसिन के डेल्टा में स्थित है, जो बारिश और बंगाल की खाड़ी से उठने वाले उच्च ज्वार के साथ-साथ तलछट  के भारी जमाव के फलस्वरूप नदी के चढ़े हुये प्रवाह के कारण बाढ़ प्रवण है। चूंकि यह मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र है, अत: इस बाढ़ से उपज और निवासियों की आजीविका की बड़ी संख्या में और भारी हानि होती है। इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने महानदी बेसिन के लिए जलवायु आँकड़ों का उपयोग किया एवं नदी तथा इस क्षेत्र के लगभग 1300 गाँवों में बाढ़ के नमूनों के आकलन के लिए इसकी वितरण जल-धाराओं की गहराई और इसके वेग के बारे में जानकारी प्राप्त की। "प्रत्येक गाँव के स्तर पर इतना विस्तृत और केन्द्रित अध्ययन किसी भी क्षेत्र में कभी भी नहीं किया गया" यह कहना है आईआईटी मुंबई के प्राध्यापक सुबिमल घोष का, जो इस अध्ययन के शोधकर्ताओं में से एक हैं।

यद्यपि यह जलवायु आँकड़े समुद्र-सतह के तापमान और वायु स्वरूप के वैश्विक परिदृश्य को ग्रहण करते हैं, तथापि ये क्षेत्रीय मौसम के स्वरूप की भविष्यवाणी करने में भी उपयोगी हैं, जैसे वर्षा, जो एक विशेष क्षेत्र में नदी एवं सतही जल प्रवाह को निर्धारित करती है। "जगतसिंहपुर जिला सन 1999 के महा चक्रवात से बहुत प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ था। तब से,  इसके जिला वेब-पोर्टल का रख-रखाव अच्छी तरह से किया जा रहा है, जिससे हम इन आँकड़ों को ध्यान से देख सकते हैं।" प्राध्यापक करमाकर बताते हैं।

शोधकर्ताओं ने आँकड़ों का उपयोग जिले के पृथक-पृथक गाँवों में बाढ़ की संभावनाओं के पूर्वानुमान के लिए किया। उन्होंने बाढ़ संकट के जोखिम के आधार पर गाँवों को पाँच वर्गों में श्रेणीबद्ध किया: निम्नतम, निम्न, मध्यम, उच्च एवं उच्चतम। तब उन्होंने 1979–2005 से लेकर निकट भविष्य में उनके पूर्वानुमान, 2026–55 तक गाँवों के वर्गीकरण की तुलना की। जहाँ लगभग 300 गाँव उच्च से निम्न जोखिम वर्ग में बदले गए, वहीं करीब 450 गाँव निम्न से उच्च जोखिम वर्ग में बदले गए। यद्यपि 519 गाँव पूर्व के समान जोखिम वर्ग में रहे, किन्तु इनमें पूर्व की तुलना में भविष्य में बाढ़ संकट की संभावना अधिक पाई गई।

जगतसिंहपुर के उच्चतम जोखिम के अंतर्गत स्थित 122 गाँवों में, शोधकर्ताओं ने एरसामा, तिरतोल तथा रघुनाथपुर उप जिलों की पहचान की जो बाढ़ जोखिम के लिए सर्वाधिक प्रवण  थे। अध्ययन प्रकाश डालता है कि यह जलवायु परिवर्तन ही है जो समय के साथ स्थितियों को और खराब कर सकता है। राज्य प्राधिकरण पहले ही दीर्घकालिक आपदा योजना उपायों पर कार्य कर रहे हैं, जैसे महानदी पर हीराकुंड बांध का उपयोग करके बाढ़ के पानी को नियंत्रित करना, नदियों के किनारे पर तटबंधों का निर्माण, बंगाल की खाड़ी के किनारे मैंग्रोव का रोपण एवं बाढ़-प्रवण क्षेत्रों से ऊँचाई वाले क्षेत्रों की ओर निवासियों का पुनर्वास। यद्यपि इस तरह की गतिविधियाँ अत्यंत आवश्यक हैं, तथापि अध्ययन बताता है कि ये जीवन और संपत्ति के संभावित नुकसान को कम करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

महानदी का डेल्टा क्षेत्र अधिकांशत: कृषि भूमि है, जहाँ के निवासी वहाँ पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं। बाढ़ के जोखिमों से अवगत होने के बावजूद, न तो वे बाहर निकलना चाहते हैं और न ही उनके पास इसके लिए पर्याप्त संसाधन ही हैं, शोधकर्ता बताते हैं। उन्हें विश्वास है कि क्षेत्र को जलवायु-रोधी बनाने के लिए जिलास्तर के नीतिकार उनके अध्ययन को ध्यान में रखते हुये कार्य करेंगे।

इस दल ने एक अनूठा शुद्ध विभेदन अर्थात फाइन रेसोल्यूशन वाला मानचित्र निर्मित किया है, जो गाँवों को उनकी प्राथमिकता के आधार पर वर्गीकृत करता है। यह नीतिकारों को, उनके आपदा नियोजन प्रयासों को उन गाँवों की ओर दिशा देने में सहायक होगा, जिन पर तत्काल ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। ये मानचित्र जनता के द्वारा परामर्श किए जाने के लिए जिला वेब पोर्टल पर उपलब्ध होंगे।

"हम निम्न आपदा संभाव्य गाँवों की पहचान करके निकासी योजनाओं को अधिक तर्कसंगत बना सकते हैं," प्राध्यापक करमाकर का कहना है। "खतरनाक जोखिमों जानकारी हमें वर्तमान परिवहन नेटवर्क का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करने में सहायता करेगी," वे आगे कहते हैं। भारत के अन्य बाढ़ प्रवण तटीय जिलों में भविष्य के आपदा प्रबंधन की सुविधा के लिए शोधकर्ताओं की इन मानचित्रों को राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र  (एनआरएससी) के साथ साझा करने की भी योजना है।