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प्रोफेसर बेल्लारे को आयुष पुरस्कार से सम्मानित किया गया

  • Photo from World Homeopathy Day report website

हाल ही में, आयुष मंत्रालय (आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, एवं होम्योपैथी) भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्तशासी निकाय केन्द्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद् (सीसीआरएएस) द्वारा प्रस्तुत आयुष पुरस्कारों में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के एक शोध समूह ने दो शीर्ष प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

भारत के उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू ने विश्व होम्योपैथी दिवस को चिह्नित करने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई में रासायनिक अभियांत्रिकी  विभाग के प्राध्यापक  जयेश बेल्लारे को ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ पुरस्कार प्रदान किया। इसी कार्यक्रम में, प्राध्यापक  बेल्लारे के छात्रों  में से एक, प्रशांत चिकरामने को होम्योपैथिक दवाओं को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने के अपने काम के लिए आयुष युवा  वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दोनों पुरस्कारों में प्रमाणपत्र, एक स्मृति चिन्ह, और नकद पुरस्कार शामिल है।

पुरस्कारों ने नैनो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में होम्योपैथिक उपचार की संरचना और नैनोकणों के हॉर्मेटिक जैविक प्रभावों पर व्यापक अध्ययनों पर उनके इस अग्रणी अनुसंधान को मान्यता दी। दो पुरस्कार विजेताओं के अतिरिक्त  अनुसंधान समूह में प्राध्यापक ए के सुरेश, डॉ. एस जी केन, डॉ. मयूर टेम्गीर, अभिरुप बसु, नेहा, नीलाक्षी, ध्रुव और अन्य शामिल हैं।

पुरस्कार विजेताओं द्वारा योगदान

पिछले दशक में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई में इस समूह के शोध से पता चला है कि नैनोकणों के माध्यम से कुशल दवा वितरण किया जा सकता है जो कि एलोपैथी के साथ आयुर्वेद और होम्योपैथी में भी महत्वपूर्ण है। एलोपैथी में नैनो-जीवविज्ञान के अनुप्रयोग पर ऐसे एक शोध में, डॉ. बेल्लारे और उनके सहयोगियों (कलिता, शोम, मानवार और अन्य) ने यह दिखाने के लिए कि वे मनुष्यों में आंखों की रेटिना तक कितनी जल्दी पहुंच सकते हैं, कार्बोप्लाटिन (आमतौर पर गर्भाशय के कैंसर के इलाज के लिए प्रयोग की जाने वाली एक दवा) के नैनोकणों का उपयोग किया है। यह कार्य रेटिना ट्यूमर (रेटिनोब्लास्टोमा) के इलाज के लिए नई दवाओं को प्रेरित कर सकता है।

वैकल्पिक औषधीय प्रणालियों में अपनी रूचि बढ़ाकर, प्राध्यापक बेल्लारे  के नेतृत्व में शोध समूह ने एक अन्य अध्ययन में आयुर्वेदिक भस्म के लिए नैनो टेक्नोलॉजी आधार दिखाया है और प्रमाणित किया है कि भस्म (राख की तरह एक आयुर्वेदिक दवा) में  मौजूद नैनो-कण जैविक रूप से अधिक सक्रिय हैं।होम्योपैथी के क्षेत्र में अपने निष्कर्षों को लागू करने के लिए उत्सुक, प्राध्यापक बेल्लारे के शोध समूह ने होम्योपैथिक दवाओं में नैनोकणों की उपस्थिति दिखाने के लिए इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का उपयोग किया- एक प्रमाण जो दवा के इस विवादास्पद क्षेत्र में कुछ वाद-विवाद को विराम दे सकता है।

उनके निष्कर्ष इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी के चिकित्सकीय उपयोग  को प्रमाणित करते हैं । पांच अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रों की एक  प्रकाशित श्रृंखला में, उन्होंने दिखाया है कि तनुकरण के बाद भी होम्योपैथिक दवाओं में मूल दवाएँ  नैनोकणों के रूप में मौजूद हैं। उन्होंने यह भी दिखाया है कि इन दवाओं का संकेंद्रण , हालांकि कम है किंतु मापनीय है।

प्राध्यापक बेल्लारे का समूह यह प्रदर्शित करने में भी सफल रहा है कि होम्योपैथिक दवाओं में इस्तेमाल सिलिका की कोटिंग एक नियंत्रित-विमोचन प्रक्रिया (दवा वितरण के नए रूपों में व्यापक रूप से उपयोगी एक प्रक्रिया) प्रदान कर सकती है। शोधकर्ताओं ने निर्माण की प्रक्रिया का भी अध्ययन किया है और नैनोकणों को उत्पन्न करने, स्थिर करने और बनाए रखने के तरीके पर एक अभियांत्रिक  दृष्टिकोण प्रदान किया है। दिलचस्प बात यह है कि, इन नैनोकणों, जब सेल लाइनों में डाला जाता है, ये जैविक रूप से उत्तेजक प्रभाव डालते हैं जिन्हें एक हार्मेटिक या द्विचरण प्रतिक्रिया के रूप में समझाया जा सकता है जिसमें छोटी मात्रा  उत्तेजित करती  है जबकि बड़ी मात्रा  प्रावरोध करती है।

प्राध्यापक बेल्लारे की प्रयोगशाला में  किए गए शोध ने वैश्विक स्तर पर व्यापक प्रभाव डाला है और स्वतंत्र चिकित्सकों को शोध करने के लिए प्रोत्साहित किया है  जिसमें भविष्य में दवाओं के निर्माण और विनियमन पर  प्रभाव मापा जा सकता है।