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भारतीय गाँवों को आत्मनिर्भर बनाएँ !

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  • शोधकर्ताओं ने ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने, स्थायी आजीविका पैदा करने और गरीबी से निपटने के लिए एक मॉडल तैयार किया है
    सॅम संतोष, आयडीसी, आयआयटी मुंबई

शोधकर्ताओं ने ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने, स्थायी आजीविका पैदा करने और गरीबी से निपटने के लिए एक मॉडल तैयार किया है

यद्यपि भारत का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, लेकिन अभी भी लगभग ६६.४% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इसलिए, इस बहुमत आबादी के लिए बुनियादी जरूरतें और आजीविका के अवसर प्रदान करना बहुत ज़रूरी हो जाता है। बुनियादी ढाँचे को विकसित करने और रोज़गार के अवसर पैदा करने और ग्रामीण आबादी को कुशल बनाने के लिए तैयार की गई कई सरकारी योजनाओं ने २००५-०६ में ग्रामीण प्रदेश की गरीबी को ५५% से घटाकर २०१५-१६ में २८% तक लाने में मदद की है। इन योजनाओं के बावजूद, रोजगार और आजीविका उत्पादन के उद्देश्य केवल आंशिक रूप से ही सफल रहे हैं। हाल ही के एक अध्ययन में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई से प्राध्यापिका रोनिता बर्धन और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के रामित देबनाथ ने एक भारतीय गाँव में उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने, क़ायम आजीविका पैदा करने और ग्रामीण विकास हासिल करने के लिए एक मॉडल का प्रस्ताव रखा है।

सरकार के पास आज लगभग अठारह योजनाएँ हैं - जिनमें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम शामिल हैं। इन योजनाओं का  उद्देश्य आजीविका के साधन पैदा करना, गरीबी उन्मूलन और कमाई की न्यूनतम गारंटी के साथ रोजगार प्रदान करना है। हालाँकि, धन कुप्रबंधन, राज्यों में असमान बजट आवंटन, योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी और प्रशासनिक लापरवाही जैसे कारकों ने इन योजनाओं के सफल कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न की है।

एक विकल्प के रूप में, ग्रामीण रोजगार की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार किए गए महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित, स्वयं सहायता समूहों के द्वारा सरकार द्वारा संचालित योजनाओं में होने वाली कमी को संबोधित करने का प्रस्ताव दिया गया है। हालाँकि, वे भी ग्रामीण विकास के मुद्दों को संबोधित करने में असफल रहे हैं।

"स्व-सहायता समूह मुख्य रूप से अप्रभावी समूह बैठकों, सदस्यों के बीच जागरूकता और सहयोग की कमी, आयोत्पादक गतिविधियों का अभाव और बचत की एक छोटी राशि के कारण सामुदायिक-स्तरीय समावेशी विकास को प्राप्त करने में विफल रहे हैं," वर्तमान अध्ययन के लेखकों का कहना है।

जर्नल ऑफ रूरल स्टडीज’ में प्रकाशित अपने अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने भारत के एक गाँव का अध्ययन किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि सामाजिक उद्यमिता और मौजूदा संसाधनों के उपयोग के माध्यम से कैसे स्थायी आजीविका उत्पन्न की जा सकती है। वे रिसोर्स सिम्बायोसिस  नामक एक मॉडल का प्रस्ताव करते हैं, जो कि मौजूदा संसाधनों के संयोजन का उपयोग करके कुछ नया बनाने या विकसित करने की अवधारणा - जिसे ‘ब्रिकोलाज’ कहते हैं -  का उपयोग करके बनाया गया है। मॉडल के अनुसार, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग इस तरह किया जाता है कि ग्रामीणों और स्थानीय सरकार दोनों को आजीविका उत्पादन और ग्राम विकास का लाभ मिले।

शोधकर्ताओं ने एक गाँव में उपलब्ध संसाधनों पर डेटा को समझने लिए एक वैचारिक रूपरेखा विकसित करके उसमें ब्रिकोलाज लागू किया। यह ढाँचा एक अन्य अध्ययन पर आधारित है, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे उपलब्ध जानकारी से निर्माण माध्यम से सामाजिक उद्यमिता ने मानव विकास सूचकांक (जीवन प्रत्याशा, शिक्षा, आय और अन्य कारकों का एक सांख्यिकीय) में सुधार किया गया। वर्तमान अध्ययन का उद्देश्य उपलब्ध जानकारी के माध्यम से गाँव का विकास करना है।

शोधकर्ताओं ने महाराष्ट्र के शिंगणापुर नामक एक गाँव पर अपना मॉडल लागू किया, जिसमें लगभग  ९२० घर हैं, जिनका प्रमुख व्यवसाय कृषि है। उन्होंने आबादी के जनसांख्यिकीय डेटा, गाँव में मौजूदा आवास, पानी और स्वच्छता की सुविधाओं, लोगों की आय और आजीविका, भूमि के उपयोग के प्रकार और गाँव में उद्यमशीलता की गतिविधियों को इकट्ठा करने के लिए सर्वेक्षण किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि गाँव में उद्यमशीलता के व्यवसाय मौजूद हैं, जैसे कि खुदरा दुकानें, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, दूध प्रसंस्करण इकाई, आँवला प्रसंस्करण इकाई और यंत्रीकृत खेती आदि। हालाँकि, ग्रामीणों को, जलाने की लकड़ी के उपयोग के कारण घर के अंदर प्रदूषण, बिजली की चोरी, अनियमित बिलिंग अवधि, खुले में शौच और कृषि के लिए पानी की माँग जैसी महत्त्वपूर्ण समस्याओं का सामना करना पड़ा।

अगले कदम के तहत, शोधकर्ताओं ने गाँव में उपलब्ध संसाधनों और आजीविका के विकल्पों को सूचीबद्ध किया, जिससे ब्रिकोलाज के ढाँचे को चालू करने के बाद होने वाली  समस्याओं का पता लगाया जा सके। उत्पादक से आवश्यक संसाधन प्राप्त करना, ग्राम विकास के लिए ब्रिकोलाज का उपयोग और एक दूसरे के साथ तालमेल बिठाने वाली सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन, जैसे तीन चरणों में इस अवधारणा की परिकल्पना की गई।

सतत आजीविका विश्लेषण से पता चला है कि गाँवो में आजीविका उत्पादन चार महत्त्वपूर्ण तरीकों से संचालित किया जा सकता है। जिसमे पानी और आमदनी की कमी के कारण महिलाओं और पुरुषों के कठिन श्रम पूरित काम को कम करने की पहल, अतिरिक्त उत्पादन की खपत के लिए बाज़ार से संबंध बनाना, संसाधनों के उपयोग को सक्षम करना (जैसे कोल्ड स्टोरेज स्थापित करना), और वर्तमान ग्राम उद्यमों को बढ़ावा देना जैसे तरीके शामिल है। स्व-सहायता समूह बीज अनुदान के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) या महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) जैसी योजनाओं का उपयोग कर सकते हैं, जिसके बाद खेती से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल कर्ज उतारने के लिए किया जा सकेगा। साथ ही साथ पानी की बर्बादी को दूर करने के लिए गांव में वर्षा जल संचयन स्थापित करने में मदद हो सकती है। 

इस ढाँचे के परिणामों से पता चला है कि गाँव अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग सोयाबीन तेल चक्की और एक बायोगैस संयंत्र की स्थापना के लिए कर सकता है जो मौजूदा दूध प्रसंस्करण इकाई के साथ कार्य कर सकता है। यह बाजार पर आधारित धनोत्पादन प्रणाली बनाकर भी लाभ उठा सकता है, जहाँ स्थानीय उद्यमी, स्थानीय हाट में आँवला और दूध प्रसंस्करण इकाइयों से अपनी उपज बेचता हैं, मौजूदा सोयाबीन कृषि के माध्यम से सोयाबीन तेल का उत्पादन करके इससे बचे हुए पदार्थों का उपयोग करके बायोगैस का उत्पादन कर सकते हैं जिससे आत्मनिर्भरता आ सकती है और स्थानीय सशक्तीकरण हो सकता है।

लेखकों का कहना है की उनके रिसोर्स सिम्बायोसिस  मॉडल को अन्य ग्रामों के लिए उनकी सामाजिक और संस्कृति के अनुरूप ढाला और दोहराया जा सकता है। ब्रिकोलाज की अवधारणा मौजूदा स्कीम, जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम, में सहायक हो सकती है जिसकी मदद से नीति बनाने वाले  ग्रामीण विकास कार्य में तेज़ी लाने में सक्षम हो पाएँगे।