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भारतीय मौसम विभाग ने २०१९ के लिए सामान्य मानसून की भविष्यवाणी की है!

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भारतीय मौसम विभाग ने २०१९ के लिए सामान्य मानसून की भविष्यवाणी की है!

दक्षिण भारत, जो अभी चिलचिलाती गर्मी से पीड़ित है और मानसून का इंतजार कर रहा है जिसे जून के महीने में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह प्रतीक्षा अधिक लम्बी और असुखमय होगी। एक प्रेस विज्ञप्ति में, भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने घोषणा की है कि पूरे देश में, दक्षिण-पश्चिम मानसून वर्षा “सामान्य” रूप से होने की संभावना है। यह भविष्यवाणी करता है कि मात्रात्मक रूप से, बारिश जून-सितंबर के दौरान “लंबी अवधि के औसत या एलपीए” (जो ८९ सेंटीमीटर मात्रा है) का लगभग ९६% होने की उम्मीद है। यह मात्रा १९५१-२००० के बीच देश में होने वाली वर्षा की औसत है, और २०१९ में, इस मात्रा के औसत से बहुत अधिक विचलन होने की संभावना नहीं है।

भारतीय मौसम विभाग की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार "कुल मिलाकर, देश में २०१९ मानसून के मौसम के दौरान अच्छी तरह से वितरित वर्षा के परिदृश्य की उम्मीद है, जो आगामी खरीफ के मौसम के दौरान देश में किसानों के लिए फायदेमंद होगी"।

प्रत्येक वर्ष भारतीय मौसम विभाग, दक्षिण-पश्चिमी मानसून के लिए, अप्रैल और जून दो चरणों में पूर्वानुमान जारी करता है। लेकिन, यह मानसून की तीव्रता की भविष्यवाणी कैसे करता है? यह देखना एक रोचक विषय है।

मौसम की घटनाओं जैसे मानसून के दौरान बारिश की गणना, एल्गोरिदम और जलवायु मॉडल के एक सेट का उपयोग करके विश्लेषणात्मक और संख्यात्मक दो तरीकों से की जाती है। इसी से वर्तमान में मौजूद परिस्थितियों के आधार पर भविष्य की स्थितियों का अनुमान लगा सकते हैं। “मानसून मिशन” इस उद्देश्य के लिए पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा शुरू की गई एक पहल है, जिसमें लघु श्रेणी से मध्यम, विस्तारित सीमा और मौसमी पूर्वानुमानों के लिए अत्याधुनिक भविष्यवाणी प्रणाली विकसित की गयी है। इसका शुभारंभ २०१७ में किया गया था और इसकी भविष्यवाणियों का उपयोग कई उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

दुनिया भर में कई तरह के कारक भारत में बारिश को प्रभावित करते हैं। मौसम विज्ञानी, पांच महत्वपूर्ण मापदंडों पर नज़र रखते हैं, जो भारत के मानसून के भाग्य को निर्धारित कर सकते हैं जो इस प्रकार हैं- उत्तरी अटलांटिक और उत्तरी प्रशांत महासागरों के बीच समुद्र की सतह के तापमान में उतार या चढ़ाव, भूमध्यरेखीय हिंद महासागर के ऊपर समुद्र की सतह का तापमान, पूर्वी एशिया में समुद्र के स्तर का दबाव,उत्तर-पश्चिमी यूरोप में भूमि की सतह का वायु तापमान और भूमध्यरेखीय प्रशांत पर ऊष्मा की मात्रा (जो इसकी गर्म पानी की मात्रा से मापी जाती है)।

भारत में वैज्ञानिक, उन्नत जलवायु मॉडल का उपयोग कर रहे हैं जो पहले से ही मानसून में होने वाली  बारिश का अनुमान लगा सकते हैं। अध्ययनों ने विभिन्न संकेतों का उपयोग करने का प्रस्ताव दिया है, जैसे कि अरब सागर पर सतह का दबाव, जिसे पूर्वानुमान मॉडल में शामिल किया जा सकता है, जिससे इन पूर्वानुमानों को अधिक सटीक बनाया जा सकता है।

वर्तमान वर्ष के लिए, वैश्विक जलवायु पूर्वानुमान प्रणाली, आईएमडी द्वारा उपयोग किए जाने वाले पूर्वानुमान प्रणालियों में से एक ने भविष्यवाणी की है कि मानसून वर्षा एलपीए का लगभग ९४% होगी। सांख्यिकीय पूर्वानुमानक नामक दूसरी पूर्वानुमान प्रणाली ने लगभग ९६% की भविष्यवाणी की है। मानसून में होने वाली बारिश को, एलपीए के ९०% से कम मात्रा को 'न्यून' माना जाता है। इसी तरह एलपीए की मात्रा के ९०%-९६% के बीच 'सामान्य से नीचे' और ९६%-१०४% की स्थिति में 'सामान्य' रूप में देखा जाता है। जब सीमा एलपीए के १०४-११०% के ऊपर होती है तो इसे सामान्य से ज्यादा के रूप में देखते है।

भविष्यवाणी अनुमान से पता चलता है कि कमजोर अल-नीनो स्थितियाँ, वर्तमान में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में प्रबल है, और जिसकी तीव्रता बाद में कम हो सकती है। अल नीनो के दौरान, मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रशांत महासागर के ऊपर हवा और वर्षा के स्वरूप में बदलाव होता है। हिंद महासागर में, 'इंडियन ओशन डाईपोल' या 'इंडियन नीनो' नामक घटना होती है। जब यह घटना 'सकारात्मक' होती है, तो समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी हिंद महासागर में ज्यादा बारिश होती है और इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति उत्त्पन हो जाती है। यदि यह घटना 'नकारात्मक' है तो स्थितियाँ इसके ठीक विपरीत हो जाती हैं। इस साल, हालांकि अभी तक, इंडियन ओशन डाईपोल के अब 'तटस्थ' होने की भविष्यवाणी की गई है लेकिन आईएमडी का मानना है कि मानसून के दौरान इंडियन ओशन डाईपोल 'सकारात्मक' हो सकता है, जिससे भारत में अच्छी बारिश हो सकती है।