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भारत में हर साल बच्चों में दमा (अस्थमा) के लगभग ३.५ लाख नए मामले सामने आ रहे है

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  • भारत में हर साल बच्चों में दमा (अस्थमा) के लगभग ३.५ लाख नए मामले सामने आ रहे है
    भारत में हर साल बच्चों में दमा (अस्थमा) के लगभग ३.५ लाख नए मामले सामने आ रहे है

वैश्विक अध्ययन कहता है कि वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण दमा दुनिया भर के लाखों बच्चों को प्रभावित करता है।

दमा फेफड़ों से संबंधित बीमारी है जो कि साँस नली की सूजन और संकुचन का कारण बनती है, जिससे साँस लेने में गंभीर कठिनाई होती है। आँकड़े  बताते हैं कि दुनिया भर में लगभग ३४ करोड़ लोग दमे से पीड़ित हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिदिन लगभग ११५० मौतें होती हैं। मुख्यतः प्रदूषित हवा में साँस लेने से होने वाली यह बीमारी दुनिया भर में बच्चों में सबसे आम गैर-संचारी रोग है। एक नए अध्ययन में, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के शोधकर्ताओं ने वाहनों से निकलने वाले धुएँ के एक प्रमुख घटक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से दुनिया भर में बच्चों में दमे की घटनाओं का अनुमान लगाया है।

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड नामक अत्यधिक प्रतिक्रियाशील गैसों के समूह में से एक है। जलने वाले ईंधन के उत्सर्जन में इस गैस की एक बड़ी मात्रा होती है, जिसे दुनिया भर में दमा जैसी दीर्घकालिक बीमारी का कारण माना जाता है। ‘द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ’ नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने वैश्विक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सांद्रता, बच्चों की आबादी, और दमे की दर का विश्लेषण किया और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण के कारण नए अस्थमा के मामलों की संख्या का अनुमान लगाया। उनके अनुमान में १९४ देशों और १२५ प्रमुख शहरों से १-१८ वर्ष के बच्चों को शामिल किया गया है।

शोधकर्ताओं अध्ययन के बारे में कहते हैं, "यह अध्ययन १९४ देशों और १२५ प्रमुख शहरों के लिए, पर्याप्त स्थानिक संकल्प पर परिवेशी नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के कारण बाल्यावस्था के दमे की घटना के बोझ का पहला वैश्विक अनुमान प्रदान करता है, जो आन्तर-नगरीय और सडकों के आसपास निवास जैसे कारकों का विश्लेषण करने में समर्थ है”।

"हर साल नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण के कारण , बच्चों में दमे के ४० लाख नए मामले सामने आते हैं, जो कि  विश्व में  होने वाले कुल दमे के मामलों में १३% के भागीदार हैं", शोधकर्ताओं ने  निष्कर्षों के बारे में कहा। प्रति वर्ष ७६०,००० नए मामलों के साथ, चीन, भारत के बाद उन देशों की सूची में सबसे ऊपर है, जिन्होंने नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के कारण अस्थमा के ३५०,००० मामले दर्ज किए हैं। अन्य प्रभावित देशों में अमेरिका, इंडोनेशिया, और ब्राजील शामिल हैं। नगरों की बात करें तो सबसे अधिक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण से होने वाले दमे के मामलों में पेरू देश के लिमा शहर का सबसे पहला स्थान था (प्रति वर्ष ६९० नए मामले प्रति १००,००० बच्चों में) जिसके बाद चीन में शंघाई और कोलंबिया में बोगोटा  शहरों  का नाम आता है। दुनिया भर में, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में दमे की वारदातें अधिक पाई गईं। शहरी क्षेत्रों से दमे के ६४% मामले दर्ज किए गए। वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक राष्ट्रीय दर कम उम्र के बच्चों में देखी  गयी, जिनकी उम्र एक से चार वर्ष के बीच थी। बढ़ती उम्र के साथ घटना दर में कमी देखी गई। हालांकि भारत में, जहाँ बच्चों की विश्व में सबसे बड़ी आबादी है, दमे की वारदातों की दर अन्य देशों के मुकाबले में सबसे कम थी। भारत के चार शहरों- वाराणसी, कानपुर, लखनऊ और कोलकाता में ओरलू, नाइजीरिया के समान निम्नतम जनसंख्या-मानकीकृत वाले बच्चे दमे से पीड़ित  हैं।

१-१८ वर्ष की आयु वालों की जनसंख्या का राष्ट्रीय अनुमान (ए), जनसंख्या-भारित वार्षिक दमे की घटना दर (बी), और जनसंख्या-भारित वार्षिक औसत नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ 2) सांद्रता (सी) 

कुवैत में सबसे अधिक दमे का स्तर प्रति १००,००० बच्चों में ५५० दमे से पीड़ित बच्चे पाए गए । इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा, ताइवान, और कतर में विश्व में सबसे अधिक दमे  की दर देखी गयी। उच्च आय वाले देशों में कनाडा में सबसे अधिक अस्थमा की घटना दर थी, और दक्षिण कोरिया में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के कारण दमे की घटनाओं का प्रतिशत सबसे अधिक था।

दिलचस्प बात यह है कि इस अध्ययन के अनुसार दमे के ९२% नए मामले डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशों की तुलना में वार्षिक औसत नाइट्रोजन डाइऑक्साइड सांद्रता से कम वाले क्षेत्रों में हुए। "इससे पता चलता है कि डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों की पर्याप्तता को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है", लेखकों का कहना है।

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के प्रदूषण को कम करके, विकसित और विकासशील देशों में  दमे के मामलों की एक बड़ी संख्या को रोका जा सकता है। वे कहते हैं कि ''ट्रैफ़िक के द्वारा उत्सर्जन को कम करने  की रणनीतियों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए'', शोधकर्ता आगे कहते हैं कि वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए नीतिगत पहलों के संरेखण से कई सार्वजनिक स्वास्थ्य लाभ हो सकते हैं।