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भू-भरण स्थल से ऊर्जा संचार

  • Photo : Vignesh Kamath & Purabi Deshpande / Research Matters
    छायाचित्र: विघ्नेश कामत, पुरबी देशपांडे

भू-भरण स्थलों में रिसने वाले प्रदूषणकारी द्रव्य से विद्युत उत्पादन करने का एक वैकल्पिक सकारात्मक प्रयास!

अधिकतर भारतीय शहर कचरा प्रबंधन एवं जीवाश्मी-ईंधन से होने वाले उत्सर्जन की समस्या से ग्रस्त हैं, जो कि न केवल पर्यावरण किन्तु हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए हम एक तरफ नगरपालिका द्वारा एकत्रित कचरे के पुनः यथाचित प्रयोग पर काम कर रहे हैं, वहीँ दूसरी तरफ, जीवाश्मी-ईंधन से होने वाली प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए सौर और वायु जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दे रहे हैं। किंतु क्या एक ऐसा समाधान संभव है जो इन दोनों समस्याओं को एक साथ सुलझाने में सक्षम हो? भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान, मुंबई के प्रोफेसर प्रकाश घोष एवं उनके सह-वैज्ञानिकों ने इस जटिल समस्या का समाधान करने का प्रयत्न करते हुए एक ऐसे माइक्रोबियल ईंधन सेल (एम. एफ. सी.) की  रचना की है, जो भू-भरण स्थलों से कचरे से रिसने वाले द्रव्य का उपयोग कर ऊर्जा उत्पादन करने में सक्षम है।

भू-भरण स्थलों की भूमि में एक गहरे रंग का तरल प्रदूषणकारी द्रव्य रिसता रहता है जिसे आम भाषा में ‘लीचेट’ कहा जाता है। लीचेट असल में वह पानी है जो ठोस कचरे में मौजूद कुछ प्रदूषणकारी तत्वों को स्वयं में अवशोषित करते हुए ज़मीन में रिसता है। आमतौर पर लीचेट तीन तरीकों से बनता है: पहला, जब बारिश का पानी भू-भरण स्थल को पार करते हुए भूतल तक पहुँच जाए, दूसरा जब कचरे में मौजूद नमी एकत्रिक होकर बाहर निकले, एवं तीसरा जब भू-भरण क्षेत्र में भूजल का रिसाव हो। आम तौर पर भू-भरण स्थलों में उपस्थित जहरीले पदार्थों के कारण वहाँ से रिसने वाला लीचेट अत्यधिक प्रदूषित होता है और यदि उपचार न किया जाए, तो आसपास के भूजल को प्रदूषित भी कर सकता है। किन्तु, विषाक्त पदार्थों के अतिरिक्त, लीचेट में कई जैविक और अकार्बनिक पोषक तत्वों भी होते है, जो ऊर्जा उत्पादन में सहायक हो सकते हैं। इस अध्ययन में वैज्ञानिक गण माइक्रोबियल ईंधन सेल (एम.एफ.सी.) में इसी सम्भावित ऊर्जा स्त्रोत का प्रयोग करने का प्रयास करते हैं।

अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता श्री जयेश सोनावणे कहते हैं कि, "कचरे से मूल्यवर्धित उत्पाद प्राप्त करने एवं अपशिष्ट जल उपचार में लगने वाली लागत को कम करने में न केवल औद्योगिक किन्तु अनुसंधान वर्ग की भी भारी रुचि देखी जा रही है। सम्भवतः जीवाश्मी-ईंधन से चलने वाले सेल इन सभी समस्याओं का समाधान प्रदान करते हैं, क्योंकि वे जैविक अपशिष्टों और अक्षय जैवभार से ऊर्जा उत्पादन करने में सहायता कर सकते हैं।” इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने विश्लेषण किया है कि क्या भू-भरण स्थलों में रिसने वाले द्रव्य को एम.एफ.सी में सूक्ष्मजीवों से जुड़े रासायनिक प्रतिक्रियाओं के लिए क्रियाधार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है?

माइक्रोबियल ईंधन सेल सूक्ष्मजीवों द्वारा जैविक पदार्थों के ऑक्सीकरण के सिद्धांत पर काम करता है। इस सेल में धनात्मक और ऋणात्मक अंत एक झिल्ली से विभाजित होते हैं जो केवल धनात्मक आवेशों को विध्युत चक्र के एक अंत से दूसरे अंत तक जाने देती है। इस पूरे ढाँचे को जैविक और सूक्ष्मजीव युक्त क्रियाधार में डुबो कर रखा जाता है। जब सूक्ष्मजीव कार्बनिक यौगिकों को तोड़ते हैं, तो वे ऋणात्मक और धनात्मक कण उत्पन्न करते हैं जो अपने से विपरीत आवेश वाले अंत की ओर बढ़ते हैं। इस प्रकार, धनात्मक और ऋणात्मक कणों के प्रवाह से ऊर्जा उत्पन्न होती है।

एम.एफ.सी. के साथ ऊर्जा उत्पादन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह एक स्वयंधारी प्रक्रिया है; जब तक क्रियाधार उपलब्ध हो तब तक उसमें मौजूद सूक्ष्मजीव लगातार कार्बनिक यौगिकों को तोड़ कर, अपना पुनरुत्पादन करते रहते हैं।

इस अद्ययन में शोधकर्ताओं ने तीन समान माइक्रोबियल ईंधन सेल में एक साथ प्रयोग किए। एम.एफ.सी. के निर्माण में, प्लैटिनम-लिप्त कार्बन चूर्ण के साथ लचीले कार्बन काग़ज़ का उपयोग किया गया और धनात्मक टर्मिनल के लिए ऐक्रेलिक और ग्रेफाइट का उपयोग किया। प्रत्येक एम.एफ.सी. का ऋणात्मक अंत एक अलग हिस्से में था। लीचेट को एक के बाद एक कर क्रियाधार के रूप में इन तीन एम.एफ.सी. में डाला गया। १७ दिनों में, इन तीन एम.एफ.सी. में शोधकर्ताओं ने १.२३ वोल्ट, १.२ वोल्ट और १.२९ वोल्ट की अधिकतम वोल्टेज दर्ज की, जो की भू-भरण स्थलों में रिसने वाले द्रव्य का प्रयोग करने वाले एम.एफ.सी. में आजतक की उच्चतम वोल्टेज है। इससे पहले हुए अन्य अध्ययनों में अधिकतम वोल्टिज मात्र ५३४ मिलीवोल्ट देखी गयी है जिसकी तुलना में १.२९ वोल्ट कहीं ज़्यादा है। इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने देखा कि सेल के विद्युदग्र का क्षेत्र बढ़ने पर उनका प्रति आयतन ऊर्जा प्रवाह भी बढ़ जाता है। इस अध्ययन के उपरांत शोधकर्ता उच्च वोल्टेज उत्पादन के कारकों का पता लगाने के इच्छुक है।

श्री सोनावणे बताते हैं कि, "इस अध्ययन का लक्ष्य भू-भरण स्थलों में रिसने वाले लीचेट का उपयोग करके उच्च विद्युत उत्पादन करना था। इस तरह के एम.एफ.सी. को व्यापक श्रेणी के क्रियाधार के साथ संचालित किया जा सकता है। इस शोध में हमने एम.एफ.सी से अब तक की उच्चतम वोल्टेज हासिल की है।" चूंकि एम.एफ.सी. ऊर्जा बनाने के लिए - विभिन्न प्रकार के व्यापक क्रियाधार का उपयोग करने में सक्षम हैं, जैसे कि- घरेलू अपशिष्ट जल, खेत की खाद, आसवनी अपशिष्ट जल, औद्योगिक अपशिष्ट जल, एवं भू-भरण स्थलों में रिसने वाले लीचेट, अतः अपशिष्ट जल उपचार और भूमि प्रदूषण निवारण में एम.एफ.सी. का उपयोग सम्भव है। यहाँ तक कि एम.एफ.सी. को दूरस्थ ऊर्जा स्त्रोत की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है। वे विश्वसनीय, स्वच्छ और कुशल भी हैं। आने वाले समय में इलेक्ट्रोड बनाने के क्षेत्र में उन्नति और नए जीवाणु समुदायों की खोज के साथ, शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि एम.एफ.सी. प्रयोगशालाओं से निकल कर व्यावसायिक-स्तर की ऊर्जा उत्पादन के लिए वास्तविक प्रणालियों में पहुंच जाएगा।

अंत में श्री सोनावणे कहते हैं कि, "सम्पूर्ण विश्व में, भौतिक अभियांत्रिकी, विद्युत्-रसायन विज्ञान, सूक्ष्म जीव विज्ञान, और ऊर्जा अभियांत्रिकी के क्षेत्रों में, एम.एफ.सी. पर अनुसंधान निरंतर चल रहा है। यह प्रयास एम.एफ.सी. के विकास और अन्वेषण को और भी सुदृढ़ बना सकते हैं, जिससे इस तकनीक को वास्तविक अनुप्रयोगों में इस्तेमाल किया जा सकता है!”

कौन सोच सकता था कि भू-भराव क्षेत्र में फेंका गया कचरा एक दिन ऊर्जा उत्पादन के लिए सोने की खान साबित होगा!