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वातानुकूलक ​उपकरणों ​में ऊर्जा-दक्षता एक सर्वोपरि​ मानक!

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  • Photo : Arati Halbe / Research Matters
    चित्र: आरती हल्बे

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के नवीन अध्ययन में देखा गया है कि भारतीय उपभोक्ता उच्च ऊर्जा दक्षता वाले वातानुकूलक के लिए अधिक भुगतान करने को तैयार हैं!

पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन से निपटने में ऊर्जा कुशल उपकरणों  के योगदान को ध्यान में रखते हुए वर्ष २००६ में भारत सरकार ने उपभोक्ताओं को उपकरणों की ऊर्जा दक्षता के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए 'स्टार लेबल्स' के कार्यक्रम की शुरुआत की थी। प्रारंभिक रूप से स्वैच्छिक एवं वातानुकूलक और फ्रॉस्ट-फ्री रेफ्रिजरेटर जैसे कुछ ही उपकरणों तक सीमित ‘स्टार लेबल’ अब भारत में सभी ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों के लिए अनिवार्य है। हालाँकि इस प्रकार के उपकरणों को बनाने में नियम और नवविचारों का बहुत महत्व है किंतु उपभोक्ताओं की पसंद भी इनके प्रचलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किंतु प्रश्न यह है कि किसी उपकरण को ख़रीदते समय उसकी ‘स्टार रेटिंग’ का ग्राहक की चयन प्रक्रिया पर कितना प्रभाव पड़ता है? इसका उत्तर देने के लिए, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया जिसके निष्कर्षों से यह पता चला है कि औसतन उपभोक्ता वह वातानुकूलक पसंद करते हैं जिनमें स्टार-लेबल होते हैं, एवं वह इस प्रकार के ऊर्जा कुशल उपकरणों के लिए वह अधिक भुगतान करने के लिए तैयार हैं।

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में २२ प्रतिशत बिजली का उपयोग घरों में होता है। घर में सबसे अधिक ऊर्जा-खपत करने वाले उपकरणों में से एक वातानुकूलक है जिसका प्रयोग तेजी से आम हो रहा है। यह प्रचलन एक बड़े पैमाने पर बिजली की खपत को प्रभावित कर सकता है। इसीलिए ऊर्जा कुशल वातानुकूलक का प्रयोग करने से न केवल ऊर्जा व्यय में कमी होगी किंतु उपभोक्ताओं के ऊर्जा बिल भी कम रहेंगे। ऐसा माना जाता है कि ग्राहकों को उपकरणों की ऊर्जा खपत के बारे में सही जानकारी देने से उन्हें ऊर्जा कुशल उपकरणों को ख़रीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। स्टार लेबल्स, एक स्टार (सबसे कम ऊर्जा कुशल) से लेकर पांच स्टार (सबसे अधिक ऊर्जा कुशल) तक पाँच श्रेणियों में पाए जाते हैं। स्टार रेटिंग के माध्यम से ग्राहक विभिन्न उत्पादों की तुलना कर उचित विकल्प चुन सकते हैं।

इस अध्ययन में, आईआईटी मुंबई स्थित सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी अल्टरनेटिवस फॉर रूरल एरियाज़ एंड इंटरडिसिप्लिनरी प्रोग्राम इन क्लाइमेट स्ट्डीज़ में प्रोफ़ेसर आनंद बी राव के मार्गदर्शन में शोधकर्ताओं ने सांख्यिकीय उपकरणों का प्रयोग कर १.५ टन के वातानुकूलक ख़रीदते समय उपभोक्ताओं की चयन प्रणाली का विश्लेषण किया है। शोधकर्ताओं ने १४८ प्रतिवादियों की ११८४ टिप्पणियों का विश्लेषण किया, जिसमें प्रत्येक प्रतिवादी से एक काल्पनिक स्थिति में वातानुकूलक ख़रीदने की ८ अलग-अलग प्राथमिकताएँ पूछी गयी। अंततः शोधकर्ताओं ने वातानुकूलक की विभिन्न विशेषताओं जैसे कि ब्रांड, एयर फिल्टर, शोर स्तर एवं स्टार रेटिंग के लिए उपभोक्ता वरीयता का अनुमान लगाया।

इस अध्ययन में यह भी देखा गया कि सर्वेक्षण में सम्मिलित ७०% प्रतिवादी स्टार लेबल्स से अवगत थे एवं ४८% का मानना था कि उच्च श्रेणी के रेटेड उपकरण वाक़ई कम बिजली का प्रयोग करते हैं। स्टार रेटिंग स्तरों का ग्राहक वरीयता पर सीधा प्रभाव देखा गया। ६९% प्रतिवादी एक या दो स्टार रेटिंग की तुलना में तीन स्टार रेटिंग वाले वातानुकूलक का चयन करते हैं, जबकि ७८% प्रतिवादी दो-स्टार रेटिंग की अपेक्षा ५ स्टार रेटिंग वाले वातानुकूलक ख़रीदना पसंद करते हैं। अध्ययन में सम्मिलित ८५% प्रतिवादियों ने एसी पर स्टार लेबल की मौजूदगी को पसंद किया।

सांख्यिकीय मॉडल का इस्तेमाल करते हुए, इस अध्ययन में देखा गया है कि आम तौर पर ग्राहक स्टार लेबल वाले वातानुकूलक ख़रीदने के के लिए १२,५०० रुपय तक अतिरिक्त भुगतान करने के लिए तैयार थे जबकि किसी प्रसिद्ध ब्रांड के लिए वह मात्रा ९००० रुपय तक अतिरिक्त  भुगतान करने के लिए तत्पर पाए गए। ६२% उपभोक्ता ३ स्टार रेटिंग स्तर से ५ स्टार रेटिंग तक वृद्धि के लिए अतिरिक्त भुगतान करने के इच्छुक थे। इस अध्ययन से शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यदि बिजली की घरेलू खपत १०० किलोवाट आवर से अधिक है तो इस तरह के निवेश आर्थिक रूप से लाभकारी होंगे।

इस अध्ययन के निष्कर्षों का भविष्य में आने वाली ऊर्जा दक्षता बढ़ाने की योजनाओं में बड़ा महत्व हो सकता है। इसी को सिद्ध करते हुए अध्ययन की सह-लेखिका डॉ मनीशा जैन कहती हैं कि, “यह अध्ययन एयर कंडीशनर मानक एवं स्टार रेटिंग के लिए अनुभविक समर्थन प्रदान करता है। भारत में अभी तक उपभोक्ता विकल्पों पर स्टार रेटिंग कार्यक्रम के प्रभाव को केवल गुणात्मक रूप से समझा जाता था। यह अध्ययन उपभोक्ता विकल्पों पर इस कार्यक्रम के प्रभाव को मात्रात्मक अनुमान प्रदान करता है।”

स्थापित नियमों के अनुकूल अनिवार्य रूप से चलाए गए सूचना कार्यक्रम ,भारतीय उपभोक्ताओं के बीच काफ़ी सफल रहे हैं। शोधकर्ता कहते हैं कि, “यह अध्ययन दर्शाता है कि मानकों और लेबलिंग कार्यक्रम के कारण, ऊर्जा कुशल वातानुकूलक का प्रयोग प्रचलन में आ गया है, अतः अब मानकों को मजबूत करने के अलावा सरकार  की तरफ़ से किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।” भविष्य में इस अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए, शोधकर्ता घरेलू आय एवं शिक्षा जैसी मानकों का रेटिंग वरीयताओं से संबंध देखना चाहते हैं जिससे ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए लक्षित कार्यक्रम की संरचना की जा सके।