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वायु प्रदूषण सिर्फ भारतीय शहरों तक ही सीमित नहीं, अब इससे ग्रामीण भारत भी आहत है

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वायु प्रदूषण सिर्फ भारतीय शहरों तक ही सीमित  नहीं, अब इससे ग्रामीण भारत भी आहत है

चित्र: सुधीरा एचएस

शोध से पता चलता है कि भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र वायु प्रदूषण के कारण उच्च स्वास्थ्य जोखिमों का सामना  समान  रूप से  कर रहे हैं।

वायु प्रदूषण, दुनिया में अकाल मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक के रूप में उभरा है। फिर भी मुख्यधारा के मीडिया में, यह भारत के शहरी क्षेत्रों तक ही गंभीर स्वास्थ्य संकट के रूप में चित्रित किया जाता है। हर साल, दिल्ली और लखनऊ जैसे शहर सबसे प्रदूषित क्षेत्रों के रूप में सुर्खियों में आते हैं और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम जैसी सरकारी पहलों का ध्यान केन्द्रित  करते हैं। हालांकि, एक नए अध्ययन से पता चलता है कि भारत के ग्रामीण हिस्सों में भी, जहाँ देश की आबादी का लगभग 70% हिस्सा रहता है, वहाँ भी वायु प्रदूषण का स्तर शहरी क्षेत्रों के बराबर है। इसलिए ग्रामीण भारत की वायु प्रदूषण समस्या पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी (सीएसयू), यूएसए और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के शोधकर्ताओं ने देश भर में वायु प्रदूषण के स्तर के मूल्यांकन का काम करते हुए पाया कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर इसके प्रभाव का अध्ययन करने की तत्काल आवश्यकता है।  इस अध्ययन को आंशिक रूप से नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) द्वारा वित्त पोषित किया गया था और प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

अब तक के शोध में पाया गया था कि प्रदूषित वायु जिसमें पीएम 2.5 - 2.5 माइक्रोन व्यास से बारीक हजारडस कण - और ओजोन उपस्थित हो, के कारण होने वाली मौतों का आँकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में तीन गुना अधिक था। अध्ययन में उत्तर भारत में वायु प्रदूषण के चार महीनों के आँकड़ों का इस्तेमाल किया गया था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई से इस अध्ययन में शामिल प्राध्यापक चंद्रा वेंकटरमन कहती हैं कि "हम निश्चित रूप से पूरे साल के लिए उच्च स्थिरता रिजोल्यूशन  (~4.5 किमी) पर अखिल भारतीय आंकड़ों के उपयोग से ग्रामीण बनाम शहरी क्षेत्रों पर वायु प्रदूषण के  प्रभावों का मूल्यांकन करना चाहते हैं"। 

भारतीय शहरों की कल्पना उन स्थानों के रूप में की जाती है जहां बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। लेकिन, कई ग्रामीण क्षेत्रों में, विशेष रूप से उत्तरी भारत में, जनसंख्या का घनत्व बहुत अधिक  है। अध्ययन का अनुमान है कि लगभग 40 करोड़ लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या 70 करोड़ के करीब है।

कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी से प्राध्यापक ए.आर.रविशंकर, जो इस अध्ययन  के एक शोधकर्ता हैं, बताते हैं कि “हम शहरी बनाम ग्रामीण के मुद्दे को संबोधित करने के लिए गहराई तक गए क्योंकि दोनों क्षेत्रों के जनसंख्या घनत्व में अधिक अंतर नहीं है , जैसा कि कोई उत्तरी अमेरिका, यूरोप या दक्षिण अमेरिका को देखकर कल्पना करेगा। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच जनसंख्या घनत्व में विशेष अंतर न होना विकासशील दुनिया की विशेषता हो सकती है। हालाँकि, भारत में वायु प्रदूषण का अध्ययन करने वाले अधिकांश शोध शहरों पर इसके प्रभाव पर ही  केन्द्रित  हैं।

शोधकर्ताओं ने उपग्रह द्वारा एयरोसोल के माप से जमीनी सतह पर पूरे भारत में मौजूद PM2.5 की मात्रा की गणना की। इस माप से उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच वायु प्रदूषण के स्तर में ज्यादा अंतर नहीं मिला।

इंडो-गंगेटिक प्लेन, जिसमें पंजाब से पश्चिम बंगाल तक फैले राज्यों का विस्तार शामिल है, में वायु प्रदूषण का स्तर उच्चतम  है। यह भारत में सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र भी है। शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में वायु प्रदूषण, लगभग समान रूप से फैला हुआ है।

जबकि शेष भारत वायु प्रदूषण के निम्न स्तर को दर्शाता है, फिर भी वायु की गुणवत्ता भारत के राष्ट्रीय मानक से बहुत खराब है। 80% से अधिक लोग प्रदूषित वायु में सांस ले रहे हैं। और ये तब जब कि भारत की वायु गुणवत्ता की सीमा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों से चार गुना अधिक है। इस प्रकार, लगभग सभी देश डब्ल्यूएचओ द्वारा सुरक्षित माने जाने वाले स्तरों की तुलना में  बहुत अधिक खराब वायु गुणवत्ता के साथ रहते हैं।

शोधकर्ताओं ने यह भी अनुमान लगाया है  कि हर साल लगभग 10.52 लाख लोगों  की अकाल मृत्यु  पीएम 2.5 के संपर्क में आने से उत्पन्न होने वाली  ह्रदय  और फेफड़ों की बीमारियों के कारण हो जाती है। इसमें से 69% मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं - यानी, ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष 7 लाख से अधिक लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। यध्यपि सामान्य तौर पर, वायु प्रदूषण के स्रोत भिन्न होते हैं तथापि  शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पीएम 2.5 के स्तर के लगभग समान स्तर के साथ, आबादी के दोनों समूह स्वास्थ्य जोखिमों का लगभग समान  रूप से सामना करते हैं।

प्राध्यापक रविशंकर कहते हैं कि "मुझे उम्मीद है कि इस विषय पर कुछ अन्य लोगों के साथ हमारा अध्ययन, नीति निर्माताओं और प्रबंधकों को ग्रामीण क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता की दिशा में ठोस कदम उठाने हेतु  विचार करने में मदद करेगा। किसी भी समस्या को पहचानना एक पहला और आवश्यक कदम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदूषण की गंभीरता को समझने के साथ ही, स्थिति की भयावहता को कम करने और सुधार  के उपायों के बारे में सोचा जा सकता है"।

यद्यपि वायु प्रदूषण के ज्ञात स्रोत जैसे कि वाहनों के उत्सर्जन, उद्योगों और खेतों में जलने वाले पराली आदि, नीतिगत फैसलों में ध्यान में रखे जाते हैं लेकिन इसके साथ अन्य स्रोतों पर भी नजर रखने और उन्हें  नियंत्रित करने की आवश्यकता है। प्राध्यापक वेंकटरामन कहती हैं कि "हम पाते हैं कि बायोमास ईंधन (लकड़ी, फसल अवशेष और गोबर के उपले आदि) के साथ चूल्हों पर घरो में खाना बनाना भारत में बाह्य वायु प्रदूषण को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा स्रोत है।" "इन स्रोतों, साथ ही साथ पारंपरिक ईंट उत्पादन और अपशिष्ट जलाने, को तत्काल वायु प्रदूषण शमन के दायरे में लाया जाना चाहिए।" वह प्रस्ताव करती हैं कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम को अपनी वर्तमान सोच के दायरे को बढ़ाते हुए शहरी क्षेत्र के अलावा  ग्रामीण क्षेत्रों  को भी इसमें शामिल करना चाहिए।

प्राध्यापक रविशंकर कहते हैं कि "जमीन से हवा की गुणवत्ता का आकलन करने में सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त वायु निगरानी स्टेशनों की कमी है। "ग्रामीण भारत, जो स्वास्थ्य समस्याओं और मृत्यु के उच्च जोखिम का सामना करता है, के पास शायद ही कोई निगरानी सेटअप है, जो नीति निर्धारण संस्थाओं को सूचित कर उनसे वांछित निर्णय करा सके। वे आगे कहते हैं, "यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां भारत अपनी क्षमता को बढ़ा सकता है।"

प्राध्यापक वेंकटरामन कहती हैं कि "हम वायु निगरानी संबंधी परियोजनाओं को विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जो कि ग्रामीण या क्षेत्रीय वायु प्रदूषण की समस्या के प्रभावी समाधान प्रदान करने की कुंजी है। “वर्तमान में, बड़े शहरों के असाधारण उच्च प्रदूषण स्तर समाचार में रहते हैं, और समान रूप से प्रभावित ग्रामीण क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं। जबकि, भारत में अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, “प्राध्यापक रविशंकर इसके साथ अपनी बात समाप्त करते हैं।