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शहरीकरण कैसे बढ़ता है यह समझने की दिशा में शोध कार्य

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शहरीकरण कैसे बढ़ता है यह समझने की दिशा में शोध कार्य

शोध कार्य, मुंबई महानगर क्षेत्र में विकास ढाँचे का अध्ययन करने के लिए संग्रहीत उपग्रह छवियों के डिजिटल प्रसंस्करण का उपयोग करता है।

बढ़ते शहरीकरण के कारण उसके आसपास की जलवायु, जल संसाधनों और जैव विविधता को अपरिवर्तनीय क्षति हो रही है। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी आज शहरों में रहती है और यह संख्या अगले दशक तक और बढ़ने का अनुमान है। जैसे-जैसे शहर प्रमुख आर्थिक चालक के रूप में दुनिया भर में उभर रहे हैं, यह समझना और सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हमारे शहर प्रगति कैसे करते हैं और यह प्रगति कितनी सतत है।

ऐसे ही एक प्रयास में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई से डॉ. प्रिया मेंदीरत्ता और प्राध्यापक शिरीष गेडाम ने उपग्रह चित्रों का उपयोग करके मुंबई शहर की संरचना और रूप में हुए बदलाव का अध्ययन किया है।

शहरो के नियोजन के लिए योजनाकारों को नए संसाधनों की उपलब्धता का पूर्वावलोकन करने की आवश्यकता है ताकि शहरों के विकास को सुविधाजनक बनाया जा सके। साथ ही साथ उपयोगी भूमि में होने वाले परिवर्तनों को समझकर और शहरीकरण के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए उनके भविष्य के विकास का अनुमान लगाया जा सकता है। रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकियों ने इस दिशा में नए दरवाजे खोले हैं, जिसने उपग्रह की मदद से भूमि उपयोग में होने वाले परिवर्तनों के बारे में डेटा एकत्र करना आसान बना दिया है। समय के साथ इन परिवर्तनों का अवलोकन करना महत्वपूर्ण है जो की जमीन के प्रबंधन और संसाधनों पर निर्णय लेने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

कुशल बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों के साथ सुगठित शहरों का विकास, उनकी स्थिरता को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। डॉ. प्रिया मेंदीरत्ता कहती हैं कि "ऊर्जा के उपयोग और भूमि के संरक्षण के साथ-साथ, ऊर्जा, भोजन और पानी और प्रदूषण के अल्पीकरण के उपायों की इष्टतम खपत पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।"

जैसे-जैसे तटीय शहरों का विस्तार होता है, वे बंदरगाहों की उपस्थिति के कारण व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्रों में बदल जाते हैं। हालांकि, मुंबई में जमीन की सीमित उपलब्धता, अपने विशिष्ट भूखंड के कारण, इस विस्तार को बाधित करती है। इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने दिखाया कि कैसे एक महानगरीय क्षेत्र में विकास की दिशाओं की भविष्यवाणी करने के लिए संग्रहीत छवियों और उपग्रह डेटा, एक आधार योजना प्रदान कर सकती है। यह अध्ययन एप्लाइड जियोग्राफी नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं ने 1972-2011 के दौरान, चार दशकों की संग्रहीत लैंडसैट छवियों का उपयोग करते हुए, इमारतों द्वारा घेरे गए घने क्षेत्र के प्रसार का अध्ययन किया। इस डेटा का उपयोग तब मुंबई महानगर क्षेत्र के विकास की दिशा और दर की पहचान करने के लिए किया गया था, जिसमें ग्रेटर मुंबई, मुंबई उपनगरीय जिले, ठाणे और रायगढ़ जिले के कुछ हिस्से शामिल थे। यह क्षेत्र दुनिया में सबसे घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में से एक है। अध्ययन क्षेत्र में इस क्षेत्र की सीमा से दो किलोमीटर की दूरी पर बफर (एक विशिष्ट संरक्षित क्षेत्र) भी शामिल है ताकि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील अंतर-संबंधी क्षेत्र का अध्ययन किया जा सके।

शोधकर्ताओं ने "ऑब्जेक्ट-बेस्ड इमेज एनालिसिस" नामक तकनीक का इस्तेमाल किया, जो पिक्सल्स को अपने स्पेक्ट्रा, आकार और रूप के आधार पर वस्तु के समान बनाती है। उन्होंने इस तकनीक को अन्य तकनीकों के आगे इसलिए चुना क्योंकि यह "काले और सफेद बिन्दुओ में छवि का पिक्सेलकरण" - जो आमतौर पर पारंपरिक पिक्सेल-आधारित छवि विश्लेषण में देखा जाता है, जैसी कमियों को हटा देती है। छवियों से विकृतियों को खत्म करने के बाद पूर्वनिर्धारित बंजर भूमि, इमारतों, वनस्पति, जल निकायों और आर्द्रभूमि के साथ उनकी समानता के आधार पर वर्गीकृत किया गया। अध्ययन के परिणाम समय के परिवर्तन के साथ भूमि उपयोग में परिवर्तन को प्रदर्शित करने वाले मैट्रिक्स के रूप में प्रदर्शित किए गए। इस तरह के अध्ययनों से प्राप्त परिणामों का उपयोग वस्तुनिष्ठ तरीके से शहरी विकास की मॉडलिंग के लिए किया जा सकता है।

अध्ययन की परिकल्पना यह थी कि शहरी क्षेत्रों के जनसंख्या घनत्व में गिरावट, खेती योग्य भूमि, जंगलों और जल निकायों की कीमत पर है। अध्ययन में पाया गया कि चार दशकों के दौरान, इस क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र में 4.5 गुना वृद्धि हुई जो 234 वर्ग किमी से 1056 वर्ग किमी तक बढ़ गयी, जबकि जनसंख्या केवल तीन गुना बढ़ी है। इस प्रकार शहरीकरण आबादी की तुलना में अधिक तेजी से फैल रहा था। शहरी फैलाव शहर की सघनता को विघटित करता है और बुनियादी ढांचे की लागत बढ़ाता है साथ ही साथ ये परिवहन तंत्र पर असर ड़ालता है और जंगलों और आर्द्रभूमि को नष्ट करता है।

मुंबई के मामले में, शहरी क्षेत्र का विस्तार उत्तर में वसई विरार और पूर्व में मध्य रेलवे लाइन के साथ भिवंडी और दूसरी तरफ नवी मुंबई में ठाणे के खाड़ी तक था। ये तीन विकास दिशाएँ क्रमशः दक्षिण-पूर्व में गोवा और दक्षिण-पश्चिम में पुणे की ओर जाने वाले एक्सप्रेसवे से जुड़ती हैं, जिसमें क्रमशः संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान, माथेरान इको-सेंसिटिव ज़ोन और कर्नाला पक्षी अभयारण्य शामिल हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह विस्तार राज्य सरकार की नीतियों से प्रभावित हो सकता है, जिनका उद्देश्य शहर के केंद्र में विकास को रोकना है। वैकल्पिक रोजगार केंद्र और औद्योगिक क्षेत्र बनाए गए, और सब्जी और इस्पात बाजार स्थानांतरित हो गए है। उद्योगों की स्थापना से ठाणे के पास घना शहरीकरण हुआ है, जहाँ तलहटी कट गई थी और निचले इलाकों में दलदली भूमि भर गई थी। मुंबई के कई हिस्सों में निर्मित क्षेत्रों में आर्द्रभूमि के इस रूपांतरण ने तटीय पारिस्थितिकी को प्रभावित किया है, जिसकी गंभीरता का अध्ययन करने की आवश्यकता है।

पश्चिमी घाटों के इको-सेंसिटिव ज़ोन के समीपवर्ती सह्याद्री पहाड़ी श्रृंखला में संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिए विस्तारित संरक्षण रणनीतियों को लागू करने की आवश्यकता है। इस अध्ययन का प्रयोग कर, जो शहरी विकास की गतिशीलता की निगरानी के लिए संग्रहीत छवियों को डिजिटल करने के उपयोग को प्रदर्शित करता है, इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को बचाया जा सकता है।

डॉ. मेंदीरत्ता कहती हैं, कि '' हम क्षेत्र में संभावित विकास केंद्रों की पहचान करने के लिए विकास दिशाओं का निरीक्षण कर सकते हैं और क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं, साथ ही साथ बेहतर तरीके से संवेदनशील पारिस्थितिकी का संरक्षण कर सकते हैं।''

“एक विशेष दिशा में विकास को बढ़ावा देने के दौरान, यह संभव है कि निर्णयकर्ता पर्यावरण संरक्षण या सार्वजनिक धन या प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की अनदेखी कर सकते हैं। हालाँकि, जब समय के साथ होने वाले विकास, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के भौगोलिक परिव्यय की पृष्ठभूमि में हुए परिवर्तन देखे जा सकते हो तो पूंजी निवेश, पर्यावरणीय क्षति या भविष्य के विकास की दिशा का अनुमान लगाने के लिए इस एल्गोरिदम को प्रयोग में लाया जा सकता है। यह एक विशिष्ट गणितीय समस्या है, जो अवसरों और बाधाओं के एक सेट के अनुरूप समाधान देगी, डॉ मेंदीरत्ता बताती हैं। इन परिवर्तनों के सामाजिक और पारिस्थितिक प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए एल्गोरिदम को और विकसित किया जा सकता है ताकि हमारे शहरों की कुशलता से योजना बनाई जा सके।

हमें संवेदनशील पारिस्थितिकी के विकास और संरक्षण के बीच संतुलन को कैसे बनाए रखना चाहिए, इस पर नजर रखने की जरूरत है। महानगरीय क्षेत्र अपेक्षाकृत कम है लेकिन ये राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए और आवश्यक हैं। ये दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहर हैं, जो पैमाने को प्रभावित कर सकते है, इसलिए इन शोध कार्य की आवश्यकता है " डॉ. मेंदीरत्ता निष्कर्ष निकलती है।