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हरी रेत की पुनः प्राप्ति:-एक पर्यावरण सहायक उपक्रम

  • कास्टिंग१, द्वारा लुकास स्टेवाक (विकिमिडिया कौमन्स)
    कास्टिंग१, द्वारा लुकास स्टेवाक (विकिमिडिया कौमन्स)

हमारे आस-पास की लगभग 70% धातु से बनी वस्तुएँ ,बाथरूम के नल से ले कर ऑटोमोबाइल गियरबॉक्स तक, 'रेत कास्टिंग' नामक विधि का उपयोग करके ढ़लाईघरों में निर्मित होतीं हैं। पिघला हुआ धातु हरी रेत से बने साँचों में ढाला जाता है। हरी रेत ८० % रेत और १० % मिट्टी को मिश्रित  कर के बनाई जाती है। कास्टिंग के लिए आवश्यक १५०० ℃ के उच्च तापमान पर, मिट्टी रेत के कणों पर एक परत बना लेती है, जिससे कि रेत अगली बार कास्टिंग के लिए उपयोग करने योग्य नहीं रह पाती है। ऐसी रेत के निपटान  में पैसे तथा पर्यावरण का गंभीर रूप से नुक्सान होता है.छोटे ढ़लाईघर इतना खर्च नहीं कर पाते । एक नए अध्ययन में, भारतीय प्रौद्यगिकी संस्थान मुंबई  (आईआईटी बॉम्बे) के शोधकर्ताओं ने इस हरी रेत का पुन: उपयोग करने के लिए एक व्यावहारिक और किफायती तरीका दिखाया है।

यद्यपि हरी रेत को पुनः प्राप्त करने के लिए मौजूदा विधियाँ प्रति घंटे कई टन रेत प्रसंस्करण करने में सक्षम हैं, लेकिन वे महंगी हैं। चूंकि भारत में ४६०० ढ़लाईघरों  में से ८०% छोटे और मध्यम पैमाने पर हैं, इसलिए ये विधियाँ उनकी पहुँच से बाहर हैं क्योंकि ये ढलाईघर प्रति दिन केवल १००० किलोग्राम रेत ही पुनः प्राप्त कर सकते हैं। तब एकमात्र व्यावहारिक समाधान है कि हरी रेत का निपटान पानी में डुबोकर या फिर भूमि में दबा कर किया जाए। चूंकि प्रयुक्त हरी रेत में सीसा और टिन जैसे भारी धातुं होते हैं, जो धुल कर पानी में बह जाते हैं जिससे जल प्रदूषण होता है , पर्यावरण कानून इस तरह की गतिविधियों को प्रतिबंधित करते हैं। दूसरी तरफ, ताजा रेत खरीदना अब महंगा हो गया है क्योंकि ज्यादातर राज्यों में रेत खनन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे छोटे और मध्यम पैमाने पर काम कर रहे ढ़लाईघरों के लिए लागत में वृद्धि हुई है। इसलिए, किफायती तथा बड़े पैमाने पर बनाने  का तरीक़ा, जिससे रेत  को पुनः उपयोगी बना सकें,  एक आकर्षक प्रस्ताव साबित होता है।

इस अध्ययन में, आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर संजय महाजानी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने महंगी ताप उपचार विधि (८०० ℃ पर) के बदले रेत को पुनः प्राप्त करने के लिए यांत्रिक तरीकों का प्रस्ताव रखा है। उनकी टोली ने घर्षण और  छलनी का उपयोग करके मिट्टी को अलग करने के लिए एक बेहतर, किफ़ायती और कुशल तरीक़ा विकसित किया है।

रेत को पुनः प्राप्त करने के लिए रेत कणों पर जमी मिट्टी की परत को हटाना पड़ेगा। शोधकर्ताओं ने मिट्टी की परत को यांत्रिक रूप से हटाने के लिए विभिन्न विधियों की खोज की। पहली विधि में शोधकर्ताओं ने रेत को लंबवत ट्यूब में रखा और एक दूसरे के खिलाफ रेत कणों की रगड़ को सक्षम करने के लिए संपीड़ित हवा का उपयोग किया।दूसरी विधि में लंबवत ट्यूब के बजाय क्षैतिज टयूब का प्रयोग किया जाता है। यह कंटेनर की दीवारों के विरुद्ध रेत रगड़ को अधिक सक्षम बनाता है। एक अन्य विधि में  रगड़ने की क्रिया या घर्षण बढ़ाने के लिए छोटे पत्थरों का  उपयोग और मिट्टी की हटाई गई परत को अलग करने के लिए एक छलनी का उपयोग किया गया है। शोधकर्ताओं ने लागत का मूल्यांकन किया और प्रत्येक विधि के बाद पुनः प्राप्त मिट्टी  की मात्रा को नोट किया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि सबसे अच्छा विकल्प वह था जिसमें घर्षण और छलनी का इस्तेमाल किया गया। प्रो: महाजानी ने द्वि-चरण विधि का सुझाव दिया जहां पहले चरण में रेत के कणों को कंकड़ से रगड़ा जाता है और मिट्टी के कणों को अलग करने के लिए दूसरे चरण में छलनी का प्रयोग किया जाता है। रेत को पुनः प्राप्त करने के लिए रेत को घूर्णन वाले ड्रम में कठोर पत्थर के कंकड़ के साथ रखा जाता है जैसे कि गोमेद का उपयोग रेत कणों से मिट्टी को रगड़ने के लिए किया जाता है। कंकड़ के वजन को ध्यान से चुना जाना चाहिए जिससे कि मिट्टी की परत को हटाया जा सके और रेत के कणों को भी कोई नुक्सान न पहुँचे।इस काम के लिए लगभग ४० ग्राम वजन वाले कंकड़ उपयुक्त पाए गए थे। दूसरे चरण में घूर्णन ड्रम साथ एक ५० माइक्रोन  की जाली का उपयोग किया जाता है जो छलनी का काम करता है । रेत के कण इस चरण में एक-दूसरे के खिलाफ रगड़े जाते हैं। चूंकि मिट्टी के कण रेत के कणों के मुकाबले आकार में छोटे होते हैं, इसलिए वे छलनी से निकल कर निपटाए जाते हैं और दोबारा इस्तेमाल के लायक रेत पीछे  बच  जाता है।

यदि हरी रेत में नमी की मात्रा अधिक होती है, तो इस विधि की दक्षता कम हो जाती है। इसलिए, इस संयंत्र में एक हीटर और ब्लोअर सिस्टम भी लगाया गया है जो कि पूरी प्रक्रिया शुरू होने से पहले रेत को सुखा देता है। अध्ययन में पाया गया कि संयंत्र की घूर्णन गति, गोमेद कंकड़ों के वजन और आकार, रेत में नमी की मात्रा और तापमान आदि कारण यंत्र की कार्य क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

आखिर प्रस्तावित नई विधि कितनी कुशल और किफायती है? शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल २.२% मिट्टी ही प्रस्तावित द्विचरण  विधि के बाद मौजूद रहती है और इसकी लागत लगभग ५५० रु प्रति टन पड़ती  है जबकि लंबवत  ट्यूब विधि के लिए संबंधित संख्या ४.४% थी जिसकी लागत  २७०० रु प्रति टन थी और  क्षैतिज ट्यूब विधि के लिए २.२% जिसकी लागत ५६०० रु प्रति टन थी। हालांकि प्रस्तावित द्विचरण इकाई की स्थापना  लागत अन्य पारंपरिक सेटअप से अधिक है, परन्तु इसकी परिचालन लागत बहुत कम है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ताजा रेत खरीदने पर ८३% की बचत हुई है, जिसकी लागत ३२०० रु प्रति टन है।

शोधकर्ताओं ने प्रस्तावित इकाई का एक कार्यकारी प्रोटोटाइप स्थापित किया है जो प्रति घंटे १०० किलोग्राम हरी रेत को संसाधित करने में सक्षम है। प्रोफेसर महाजनी कहते हैं, "सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज, कोल्हापुर, महाराष्ट्र में यह द्विचरण यन्त्र स्थापित किया गया है", उन्होंने अब तक की सफलता के बारे में भी बताया। "कोल्हापुर एक बड़ा ढ़लाईघर समूह  है, और इस क्षेत्र में कई छोटे ढलाईघर कार्यरत हैं। हम इनसे छोटे पैमाने पर हरी रेत एकत्र कर रहे हैं और इस प्रोटोटाइप का उपयोग कर पुनः कार्य योग्य बना रहे हैं। जहाँ तक क्षेत्र परीक्षण के परिणाम हैं, वे संतोषजनक पाए गए हैं। उन्होंने हमारे काम की सराहना की है और हमारे  यन्त्र द्वारा प्राप्त की गई रेत का उपयोग करना शुरू भी कर दिया है", उन्होंने आगे कहा.

जर्नल ऑफ मैटेरियल्स प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी में प्रकाशित यह अध्ययन, एक ऐसा आविष्कार है जो कि छोटे और मध्यम पैमाने पर चल रहे ढ़लाईघरों के मालिकों की आवश्यकताओं को पूरा करता है, जो अब पर्यावरणीय कानूनों का पालन कर सकते हैं और पर्यावरण को कोई नुक्सान पहुचाये बिना पुन: प्रयोज्य, स्वच्छ रेत भी प्राप्त कर सकते हैं। शोधकर्ता अब इस नई पद्धति में सुधार कर रहे हैं।

"हम संकर यूनिट पर काम कर रहे हैं जो थर्मल और मैकेनिकल रिक्लेमेशन दोनों की सुविधा प्रदान करता है। हम प्रोसेसिंग की लागत को कम करने के लिए जितना संभव हो सके ऊष्मा का क्षय रोकने की कोशिश कर रहे हैं", ऐसा कहकर प्रोफेसर महाजनी ने अपनी बात समाप्त की।