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हानिकारक जीवाणुओं की बढ़त को रोकने के लिए विशेष रूप से निर्मित शर्कराएँ

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हानिकारक  जीवाणुओं  की बढ़त को रोकने के लिए विशेष रूप से निर्मित शर्कराएँ

Photo by Volodymyr Hryshchenko

पेन्सिलिन का आविष्कार १९२८ में हुआ था और तब से लेकर अब तक  जीवाण्विक संक्रमण को दूर करने के लिए एंटीबायोटिक औषधियों का उपयोग किया जाता रहा है . लेकिन औषधियों के अंधाधुंध उपयोग के कारण जीवाणु की कुछ प्रजातियों  पर इनका प्रभाव जाता रहा है। बढ़ती हुई एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीवाणुओं का मुकाबला करने के लिए नई तरह की रणनीतियों की आवश्यकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई ( IIT बॉम्बे) और बोडोइन कॉलेज मैन USA के शोधकर्ताओं के एक हालिया अध्ययन में रासायनिक रूप से बदली हुई शर्करा का उपयोग करके रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं  की बढ़त पर रोक लगाने का तरीका सुझाया गया है।

यह अध्ययन केमिकल साइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ USA , जेम्स स्टेसी कोल्स फ़ेलोशिप और  विज्ञान और अभियांत्रिकी अनुसन्धान बोर्ड , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( UGC )  और  डिपार्टमेंट ऑफ़ बायोटेक्नोलॉजी , भारत सरकार, द्वारा वित्त पोषित किया गया।

जीवाणु के कोशिकाओं की दीवार, साधारण शर्करा, जिसे मोनोसेखाराइड कहते हैं और प्रोटीन जिसे एमिनो एसिड कहते हैं,  से बनी जाली की तरह  होती है। जीवाणु की विभिन्न प्रजातियाँ कोशिकाओं की दीवारों की रचना के समय विभिन्न प्रकार की शर्करा का उपयोग , करती हैं जिनमें से कुछ मनुष्य की कोशिकाओं में बहुत कम पाई जाती हैं। कोशिकाओं  की दीवारें जीवाणु को हानि से बचाती हैं और कभी कभी मेज़बान कोशिका को संक्रमित भी करती हैं। कई एंटीबायोटिक, संक्रमण को रोकने के लिए कोशिकाओं की दीवारों की संश्लेषण प्रक्रिया पर वार करती हैं। मगर ये  एंटीबायोटिक रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं के साथ साथ लाभकारी जीवाणु पर  दुष्प्रभाव डालती हैं।

“नए एंटीबायोटिकों को तुरंत बनाने की आवश्यकता है। जीवाणुओं के कोशिकाओं के तल पर कार्बोहायड्रेट की तह, अपने विशिष्ट ढाँचे के कारण पहेलीनुमा टारगेट हैं और रोग के विकास की एक कड़ी हैं”, इस अध्ययन के एक लेखक बोडोइन कॉलेज की प्रोफेसर डेनियल ड्यूब कहती हैं। उदाहरण के लिए, सतह पर मौजूद कार्बोहायड्रेट संक्रमित करनेवाले जीवाणू को मेज़बान कोशिका के साथ जुड़ने में सहायक हो सकते हैं जैसा कि स्ट्रेप्टोकोकस पेरासांगविनिस और नैसेरिया मेनेंजिटाईडिस  में होता है।

इस अध्ययन में  शोधकर्ताओं ने ऐसे विशिष्ट रूप से बनाये गए एंटीबायोटिक का विकास किया है केवल जो रोग पैदा करने वाले जीवाणु को ही अपना निशाना बनाते हैं। उन्होंने तीन दुर्लभ शर्कराओं पर काम किया जो आमाशय की परत को संक्रमित करने वाले जीवाणु की एक प्रजाति हेलिकोबैक्टर पाइलोरी और भारी दस्त पैदा करने वाली एक दूसरी प्रजाति केम्पाइलोबैक्टर जेजुनी काम में लाती हैं। उन्होंने दुर्लभ शर्करा के रासायनिक ढाँचे में बेन्ज़ाइल और फ्लुओरो समूह को जोड़कर उसमें परिवर्तन किया।

“कुलकर्णी प्रयोगशाला में पहले ही इन दुर्लभ शर्कराओं के संश्लेषण का विकास हो चुका था जिससे हमको एक सुविधाजनक शुरुआत मिल सकी”, प्राध्यापक ड्यूब ने शर्करा के चुनाव के बारे में बताते हुए कहा। 

“बेन्ज़ाइल शर्करा का संश्लेषण तो आसान था जिसे हम अपने जाने माने तरीकों से कर सके पर फ्लुओरो शुगर का संश्लेषण चुनोतीपूर्ण था जिसके लिए हमें एक नई विधि की ज़रुरत पड़ी,” अध्ययन के एक लेखक IIT बॉम्बे के प्राध्यापक सुवर्ण कुलकर्णी कहते हैं। शर्करा के एक अणु में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के परमाणु एक हाइड्रॉक्सिल गुट के रूप में कार्बन से जुड़े रहते हैं और एक फ्लुओरो समूह को जोड़ने के लिए इस हाइड्रॉक्सिल गुट को हटाना पड़ेगा। लेकिन यह जोड़ना इतना आसान नहीं होता। शोधकर्ताओं ने एक मोनोसाखाराइड के विभिन्न कार्बन परमाणुओं को लक्ष्य बनानेवाली क्रमबद्ध रासायनिक प्रतिक्रियाओं का विकास किया जिसकी सहायता से वे फ्लोरो समूह  को सही जगह पर बैठा सके। “फ़्लोरिनेटिंग एजेंट से होने वाली प्रतिक्रियाओं के कारण शर्करा के ढाँचे में जबरदस्त बदलाव आते हैं जिससे शर्करा की क्रियाशीलता समाप्त हो जाती है। हमारी विधि की सहायता से पहली बार, फ़्लोरिनेटेड दुर्लभ शर्करा तक पहुँच मिल पाई,” वे आगे समझाते हैं।

संशोधित शर्करा को जीवाणु पोषक तत्त्व के रूप में काम में लाते हैं। बेंजाइल शुगर से जीवाणु कोशिकाओं की दीवार में   साधारण शर्करा की छोटी चेन बनाते हैं, जिससे दीवार की मोटाई कम हो जाती है और जीवाणु की सुरक्षित परत टूट जाती है। परन्तु फ्लोरोशुगर में हाइड्रॉक्सिल गुट नहीं होता जो मोनोसाखाराइड से प्रक्रिया करके कोशिकाओं की दीवारों में  उपस्थित शर्करा की चेन बनाता है। अतः फ्लोरोशुगर जीवाणु के अंदर जमा होते हैं पर कोशिकाओं की दीवारों को बनाने में इनका योगदान नहीं होता।

शोधकर्ताओंने अज़ाइड समूह, जिसमें एक अणु में तीन नाइट्रोजन के परमाणु होते हैं, को शर्करा में जोड़ा, जिससे दुर्लभ  शुगर से होने वाले परिवर्तन को देखा जा सके। अज़ाइड समूह, फोस्फीन नामक रासायनिक समूह के साथ प्रतिक्रिया की  प्रवृत्ति रखता है। इस प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए उन्होंने एक रासायनिक प्रोब बनाया जिसमें फोस्फीन समूह और एमिनो एसिड की एक लघु कड़ी जिसे पेप्टाइड कहते हैं और जो एंटी बॉडीज द्वारा पकड़ में आ सकता है, को डाला। जब इस प्रोब को एक जीवाणुओं के समूह में डाला जाता है तो यह जीवाणुओं की दीवार में विद्यमान अज़ाइड समूह से प्रक्रिया करता है और पेप्टाइड को दीवार पर टैग कर देता है। शोधकर्ता एंटीबॉडी को मिलाकर बदली हुई शर्करा का जीवाणु कोशिकाओं की दीवार पर असर देख सकते हैं और टैग किये हुए पेप्टाइड में हुई बढ़त या कमी का अवलोकन कर सकते हैं।

“हमारी विधि की विशेषता ये है कि हमें पहले से किसी जानकारी की आवश्यकता नहीं है।अगर आप यह जानते हैं कि आप जिस जीवाणु में दिलचस्पी रखते हैं उसमें ऐसी दुर्लभ शर्करा, जिसे पकड़ा जा सकता है, विद्यमान है तो इस जाँच के ज़रिये उस जीवाणु पर संशोधित शर्करा के असर को परख सकते हैं,” प्राध्यापक ड्यूब बताती हैं। इस अध्ययन में  शोधकर्ताओं को अपनी पहले के शोध के कारण मालूम था कि जीवाणु अज़ाइड समूह का चयन करेंगे जो पकड़ में आ सकेंगे .

जब हमने हेलिकोबैक्टर पाइलोरी की जाँच की तो पाया कि बदली हुई  दुर्लभ शर्करा के कारण कोशिकाओं की दीवारों के संश्लेषण में कमी आई। कम जीवाणु बच पाए और उनकी बढ़त और हरकत में कमी पाई गयी। जीवाणु  बायोफिल्म, जो कि संक्रमित जीवाणु समूह के स्त्राव द्वारा बनाए जाने वाला मेज़बान  के  शरीर के  अंदर  बनाए जाने  वाला एक सुरक्षा कवच होता  है  , बना  नहीं पाए।

यहाँ ये दिलचस्प बात है कि संशोधित शर्करा से केम्पाइलोबैक्टर जेजुनि की उत्तरजीविता और गतिविधि पर कोई असर नहीं पड़ा। यही हाल बॅक्टेरॉइड्स फ्रैजैलिस, जो सामान्यतः उदर में पाया जाने वाला, एक रोग न उत्पन्न करने वाला जीवाणु है, का रहा जिन पर इन शर्कराओं का कोई बुरा असर नहीं पड़ा। इस प्रकार अलग अलग जीवाणु और शर्कराओं  की संगत को लेकर शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि जीवाणु की स्ट्रेन और इससे जुडी हुई विशिष्ट शर्करा पर यह निर्भर करता है कि कोशकाओं की दीवार के संश्लेषण को सफलतापूर्वक तोड़ पाएँगे या नहीं।

“हमारी संश्लेषित विधियों की सहायता से  बहुत सी दुर्लभ शर्कराओं तक हमारी अभूतपूर्व पहुँच संभव हो सकी है जिससे कई नैदानिक और उपचारात्मक तरीकों की खोज संभव हो पाएगी,” प्राध्यापक कुलकर्णी कहते हैं। यह अध्ययन सूक्ष्म आणविक तंत्रों पर शोध की नई विधाओं का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक होगा जो कोशिकाओं की दीवारों के बायोसिन्थेसिस पर असर करेगा और इस विषय में भी सहायक होगा कि दुर्लभ शर्करा के आणविक ढाँचे में बदलाव से उनकी कार्यविधि पर क्या असर पड़ता है। “इन शर्कराओं का उपयोग करके जीवाणुओं को मौजूदा एंटीबायोटिकों के लिए संवेदनशील बना सकते हैं या इम्यून अटैक के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं. देखना यह है किये काम हमें कहाँ तक ले जायेगा,” ये कहकर प्राध्यापक ड्यूब ने अपनी बात समाप्त की।