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दूध और उसका विज्ञान

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भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। पिछले वर्ष भारत में १४० मिलियन टन दूध का उत्पादन हुआ था। हम जानते हैं की मुख्यतः दूध गायों और भैंसों से आता है। लेकिन कभी सोचा है कि स्तनधारियों में दूध किस प्रकार उत्पन्न होता है?

सभी स्तनधारी अपने बच्चों के पोषण और भोजन के लिए दूध का उत्पादन करने में एवं उसे स्रावित करने में सक्षम होते हैं। सभी स्तनधारी मादाओं एवं पुरुषों के डी. एन. ए. में एक विशेष प्रकार के वंशाणु (जीन्स) होते हैं जो दूध के संश्लेषण, उत्पादन एवं उसके विनिमय के लिए अंकित होते हैं। दूध का उत्पादन दुग्ध ग्रंथियां करती हैं। इनमें विशेष रूप से दूध बनाने में सक्षम  कोशिकाओं की एक परत होती है। ये ग्रंथियां विभिन्न स्तनधारी प्रजातियों के बीच अलग दिखती हैं, किंतु सभी एक ही नालिकादार तंत्र से बनी होती हैं। ये ग्रंथियां महिला ग्रंथिरस (हार्मोन) एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन के प्रभाव में बढ़ती हैं, यही कारण है की वे यौवन और गर्भावस्था के दौरान इनके आकार में वृद्धि करते हैं। लेकिन दूध का उत्पादन, जिसे लैक्टोजेनेसिस भी कहा जाता है, प्रोलैक्टिन नामक हार्मोन की जिम्मेदारी है।

अब प्रश्न यह उठता हैं कि दूध का उत्पादन हर समय क्यों नहीं होता है? एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन के सक्रिय होने पर प्रोलैक्टिन काम नहीं कर सकता है, जो कि गर्भावस्था के समय होता है। गर्भावस्था के अंत में, एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्टेरोन का स्तर नीचे गिर जाता है। इस दौरान प्रोलैक्टिन, अमीनो एसिड एवं कुछ अन्य यौगिकों की मदद से लैक्टोजेनेसिस की प्रक्रिया को प्रारम्भ करता है। प्रोलैक्टिन साथ ही दूध में यौगिकों के लिए प्रणेता का कार्य करता है। ये यौगिक रक्तप्रवाह के माध्यम से स्तन प्रणाली तक पहुंचते हैं। दूध के प्रारंभिक एक लीटर के निर्माण के लिए लगभग २००-५०० लीटर रक्त की आवश्यकता होती हैं! स्तन के अग्रिम भाग पे पहुँचने के पूर्व उत्पादित दूध अधिकतर बड़ी नलिकाओं की एक श्रृंखला में एकत्रित होता है। ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन से संकेत प्राप्त करने के पश्चात्  ही यह एकत्रित दूध स्तन के अग्रिम भाग से निकल कर नवजात की भूख को शांत करता है।