Sorry, you need to enable JavaScript to visit this website.

सुन्दरबन पर किसका अधिकार है?

Read time: एक मिनट
सुन्दरबन पर किसका अधिकार है?

अध्ययन से पता चलता है कि नौकरशाही और राजनैतिक हित, वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन में बाधा डालते हैं।

सदियों से भारत की एक चौथाई आबादी, जिसमें स्वदेशी जनजातियाँ और आदिवासी शामिल हैं, जंगलों और उसके आसपास के क्षेत्रों में रहते आए हैं और अपनी आजीविका के लिए इसी पर निर्भर हैं। जब ब्रिटिश सरकार ने जंगलों को राज्य के स्वामित्व में लाने के लिए कानून बनाए, तो इन समुदायों ने अपने घरों और अपनी आजीविका  को खो दिया। 2006 में, ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारम्परिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम’, जिसे ‘वन अधिकार अधिनियम’ (एफआरए) भी कहा जाता है, को इन समुदायों का इन जंगलों पर अधिकारों का दावा करने के लिए पारित किया गया था जिस पर वे हमेशा निर्भर रहे थे। आखिर एक दशक से अधिक के बाद, क्या इन समुदायों का अपने जंगलों पर अधिकार बचा है? भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई, मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग की प्राध्यापक सर्मिष्ठा पटनायक और डॉ. अमृता सेन के अध्ययन में पाया गया है कि नौकरशाही के कारण इस कानून  को लागू नहीं होने दिया गया है।

‘वन अधिकार अधिनियम’, पारंपरिक रूप से वन निवासी समुदायों को जंगलों में रहने, कृषि के लिए उपयोग करने और शहद जैसे गैर-लकड़ी वन्य उत्पादों को इकट्ठा करने की अनुमति देता है। वन और जैव विविधता संरक्षण पर आदिवासी समुदायों को निर्णय लेने का भी अधिकार है। इस अधिनियम में ग्राम सभाओं को वन प्रबंधन की देखरेख की ज़िम्मेदारी, आदिवासियों द्वारा वन भूमि पर सामुदायिक और व्यक्तिगत दावों को स्वीकार करने, सत्यापन और निर्णय लेने के लिए का भी अधिकार दिया गया है।

हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सुन्दरबन बायोस्फीयर रिजर्व में इस कानून के क्रियान्वयन पर ध्यान दिया है जो भारत और बांग्लादेश के बीच साझा किए जाने वाले दुनिया के सबसे बड़े एस्टुरीन मैन्ग्रोव वन हैं। ये निष्कर्ष ‘एनवायरनमेंट, डेवल्पमेंट एंड सस्टेनेबलिटी’ नामक  पत्रिका में प्रकाशित भी हुए हैं।

“फिलहाल एफआरए पूरे भारत में, विशेष रूप से जहाँ आदिवासियों का बाहुल्य है, विवाद का विषय बना हुआ है। हमारे अध्ययन की प्रमुख चिंताएँ अनोखी हैं और इनका पहले दस्तावेज़ीकरण नहीं किया गया था जबकि उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड में भी इसी तरह की समस्याएँ हैं,” यह कहना है अमृता सेन का, जो आईआईटी मुंबई की पीएचडी छात्रा रही हैं और इस अध्ययन की प्रमुख लेखक हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि इस क्षेत्र में नौकरशाही, वन श्रमिक, मछली पालक, कृषक और स्थानीय राजनैतिक नेता, सभी मिलकर अपने निहित स्वार्थों के चलते आदिवासी समुदायों को वन अधिकारों से वंचित कर रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल के सतजेलिया ग्राम पंचायत के तहत आने वाले गाँवों के 75 घरों का साक्षात्कार किया। इनमें से लगभग 51 अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर थे जबकि अन्य अपनी आय के लिए मज़दूरी करते थे या मछली पकड़ने के लिए प्रतिकूल समय के दौरान शहर चले जाते थे। इनमें से ज़्यादातर अनुसूचित जाति के लोग थे, जिनमें बांग्लादेश के प्रवासी भी शामिल थे; मुंडा और भूमिज नामक अनुसूचित जनजाति के और अन्य पिछड़े वर्ग से थे।

अध्ययन में पाया गया कि वनों से सम्बन्धित मामलों के निर्णय राज्य सरकार कर रही थी, जो एफआरए का उल्लंघन है। नौकरशाहों ने आदिवासियों को इन वनों तक पहुँचने से रोकने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए थे। गरीब और ज़रूरतमंद अपने अधिकारों को पहचानने में असमर्थ हैं और स्थानीय राजनीति में सक्रिय भी नहीं है, इसका फायदा स्थानीय संभ्रांत लोगों ने उठाया हैं। लेखक का कहना है कि समाज के पाँच गाँव-स्तरीय प्रमुख हैं जो मुख्यतया कृषिविद्, मत्स्य पालक या सेवादार हैं जिनका सीधे-तौर पर इन वनों से कोई लेना-देना नहीं है।

इससे सम्बन्धित एक मामला इमलीबारी गाँव का है, जहाँ जंगलों के प्रबन्धन के लिए ज़िम्मेदार जेएफएम समिति का गठन इस क्षेत्र के उच्च वर्ग के राजनैतिक लोगों द्वारा किया गया है। जो वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी के साथ गठबंधन कर सत्ता में हैं। अध्ययन में बताया गया है कि जनजातीय समुदायों के ज्ञान, साक्षरता, धन और सत्ता में कमी होने के कारण असमान प्रतिनिधित्व होता है जिसकी वजह से इन मामलों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

लेखक बताते हैं कि यदि एफआरए के ज़रिए वन आश्रितों के अधिकारों को मान्यता दे दी जाती है तो यह गाँव में स्थापित वोट बैंक के साथ-साथ प्रोत्साहनों के लिए एक बड़ा झटका होगा, जिससे वर्तमान में राजनैतिक दलों के विभिन्न कैडर गाँवों से लाभ उठाते हैं। वे कहते हैं कि स्थानीय पंचायतों के कार्यकर्ताओं ने एफआरए के क्रियान्वयन का बार-बार तिरस्कार किया है और पुलिस ने जागरूकता अभियान को बाधित किया है।

स्थानीय संभ्रांतों के इस असंतोष के पीछे कई कारण हैं। एक नमूने के रूप में, शक्तिशाली राजनेता अपने राजस्व हितों को बनाए रखने के लिए वन विभाग के साथ-साथ पर्यटन राजस्व और पार्टी कार्यकर्ताओं को इको-होटल स्थापित करने के लिए क्षेत्रीय कार्यालयों में फिरौती देते हैं। मगर यदि एफआरए लागू होता है तो इको-होटल और मत्स्य पालन के मालिकों को अपने उद्यमों को चलाने के लिए स्थानीय लोगों से अनुमति लेनी पड़ेगी। इसलिए स्थानीय लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी देने के लिए कई संगठनों द्वारा आयोजित जागरूकता अभियानों को राजनैतिक पार्टी के नेताओं द्वारा विफल करने के प्रयास किए गए हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया है कि पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग (बीसीडब्ल्यूडी), जो राज्य में एफआरए लागू करवाने के लिए ज़िम्मेदार है, ने इस अधिनियम को लागू करवाने के लिए सुंदरबन के दो ज़िलों की पहचान ही गुम कर दी है। लेखकों का कहना है कि सुन्दबन की वैश्विक प्रसिद्धि को एक विश्व धरोहर के रूप में देखते हुए, अधिकारियों के अनुसार उत्तर और दक्षिण 24 परगना में एफआरए को लागू करने के लिए प्रतिनियुक्तों को ज़िला मजिस्ट्रेट और वन विभाग द्वारा बार-बार खारिज किया गया है।

संरक्षण के नाम पर अदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित भी किया जाता है। अधिकारियों द्वारा अक्सर यह कहा जाता है कि मानवीय गतिविधियों के कारण सुंदरबन को नुकसान पहुँच रहा है और एफआरए लागू करने से इन जंगलों को और ज़्यादा नुकसान होगा। जबकि अध्ययन में पाया गया है कि स्थानीय संभ्रांतों द्वारा अवैध गतिविधियों के चलते इन जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र को काफी नुकसान पहुँचा है। उदाहरण के लिए मैन्ग्रोव वनों जैसे नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्र को पर्यटन के लिए प्रोत्साहित करना, इन जंगलों में प्रदूषण को तो बढ़ाता ही है साथ ही इन जंगलों की सेहत को भी बिगाड़ता है।

लेखकों का कहना है कि मत्स्य पालन में टाइगर झींगों और केकड़ों की बढ़ती मांग के चलते स्थानीय लोगों की आजीविका को बर्बाद किया जाता है। ज़्यादातर आदिवासियों से संबद्ध कृषिभूमि को जानबूझकर मत्स्य पालन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि खारा पानी पास के खेतों में घुसकर फसलों को नष्ट कर देता है। इस तरह, ये मत्स्य पालक जो ज़्यादातर राजनैतिक उच्च वर्ग से होते हैं उन्हें एफआरए के गैर-क्रियान्वयन से फायदा पहुँचता है। इसके अलावा झींगा बीजों का संग्रह मछलियों की युवा आबादी को कम करता है जिससे आदिवासी मछुआरे प्रभावित होते हैं।

अध्ययन के निष्कर्ष वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन और राजनीतिकरण के बीच की खाई को उजागर करते हैं, यह विषय शैक्षणिक हलकों में व्यापक रूप से बहस का विषय है। वे बताते हैं कि कैसे नौकरशाही के हस्तक्षेप, संभ्रांत वर्ग के निहित स्वार्थ वन-निर्भर आदिवासियों के कानूनी अधिकारों में बाधा डालते हैं। अध्ययन से यह भी पता चलता है कि संभ्रांत वर्ग और नौकरशाही के बीच स्थापित समझौते कैसे लड़खड़ाते हैं। लेखकों का निष्कर्ष है कि एफआरए को लागू करने के लिए स्थानीय संभ्रांत वर्ग और राजनैतिक पार्टियों द्वारा प्रस्तुत अवरोधों पर और अधिक शोध करने की आवश्यकता है।