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Science News

Dehradun Monday, 14 January, 2019 - 08:58

As soon as we enter a zoo or a forested area, the most common animal we encounter is a deer or its close relative, giving us an impression that deer populations are plentiful in the world. However, with increasing deforestation and poaching, they are declining too. The Indian hog deer is one endangered species protected under the Indian Wildlife (Protection) Act, 1972. These small deer, scientifically named Axis porcinus, are found in many parts of Asia. In a recent study, researchers from the Wildlife Institute of India, Dehradun, have discovered a new subspecies of hog deer in Northeast India, which was earlier thought to have been found only in southeast Asia.

There are two previously known subspecies of hog deer. Axis porcinus porcinus, or the ‘western race’, is found in parts of Pakistan and along the Terai grasslands along the Himalayan foothills stretching up to Nepal and Myanmar. The other subspecies, A. p. annamiticus, or the ‘eastern race’, is found in parts of Thailand, Indo-China, Laos, Cambodia, and Vietnam. As the eastern race has a bleak distribution, its range in India is not well-known.

In the current study, the researchers report the discovery of the eastern race subspecies, A. p. annamiticus, from the Keibul Lamjao National Park (KLNP) in Manipur. The study was published in the journal Scientific Reports and was funded by the Department of Science and Technology, Wildlife Institute of India and the Ministry of Environment, Forest and Climate Change. This discovery shows that the western range of the hog deer, belonging to the eastern race, stretches until Manipur and not central Thailand as previously thought.

The researchers collected shedded antlers, faeces and dead remains of hog deer samples from different locations in India, including Uttarakhand, Punjab, Uttar Pradesh, Assam and Manipur. They then isolated the DNA from these samples and analysed the genome. Based on the genetic data, the researchers divided the populations of hog deer into two groups; those samples collected from Manipur belonged to the first group while the rest formed the other group. By comparing the genetic features between the two, the researchers concluded that the small population from Manipur is A. p. annamiticus, the eastern hog deer.

The findings of the study show that the small hog deer population in Manipur, of about a hundred individuals, has a low genetic diversity and is prone to extinction.

“The eastern hog deer of Manipur requires a dedicated management intervention for the maintenance of this subspecies”, says Dr S.K. Gupta, Scientist at WII and lead author of the study, who cautions that unless there is a timely intervention, the population could be wiped out owing to destruction of its habitat.

The researchers also believe that the eastern subspecies, which has already lost its habitat in other countries, needs to be conserved for its evolutionary and ecological significance.

“We need to establish a captive breeding centre for hog deer population in India where selected (genetically distant individuals) adult hog deer can be used for producing genetically diverse offspring”, remarks Dr Gupta, discussing on how we could conserve these newfound deer in India.

Section: General, Science, Ecology, Deep-dive Source: Link
Bengaluru Monday, 14 January, 2019 - 08:39

वैज्ञानिकों द्वारा ऐसा साधन का विकास जो अल्ट्रासाउंड से संचालित होने पर दवाओं का कहीं अधिक प्रभावी रूप से परिदान कर सकता है

हालाँकि कैंसर के बारे में पहला चिकित्सीय विवरण सन १६०० इसा पूर्व के आसपास मिस्त्र में लिख दिया गया था, पर फिर भी वैज्ञानिक आज तक इस घातक रोग का पुख्ता इलाज ढूंढ रहे हैं| यहाँ एक बड़ी मुश्किल यह है की कीमोथेरेपी में उपयोग की जाने वाली दवाएँ स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुँचा देती हैं| ऐसा इसलिए क्योंकि यह दवाएँ  केवल  कैंसर-ग्रस्त कोशिकाओं पर ही हमला कर पाने में अभी कारगर नहीं हुई हैं, और कुछ दवाएँ तो कैंसर के ट्यूमर की सारी कोशिकाओं तक भी नहीं पहुँच पाती हैं |

हाल ही में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बम्बई के शोधकर्ताओं ने कैंसर की सयोंजित चिकित्सा-पद्धति के अंतर्गत एक नयी विधि प्रस्तावित की है| इस विधि के द्वारा वे एक साथ ही अल्ट्रासाउंड तस्वीरों के माध्यम से ठोस ट्यूमर को निशाना बना सकते हैं, व दवाओं को ट्यूमर की गहराई तक भेज सकते हैं, और प्राकृतिक रूप से उपजे वसा-युक्त अणुओं का उपयोग कर ट्यूमर की कोशिकाओं को और अधिक नष्ट  सकते हैं|

कैंसर एक गूढ़ रोग है, जो हर रोगी में कुछ बदलाव लिए उपजता है| इसलिए कोई एक कैंसर-निवारण प्रणाली सभी पर लागू नहीं हो सकती| सयोंजित पद्धति आपस में सहायक कई प्रणालियों का मेल बना कर रोग का उपचार करती हैं| इस तरह से पूरे रोगी समूह के स्तर पर कैंसर से बेहतर लड़ा जा सकता है|

प्रोफेसर रिणती बनर्जी के नेतृत्व में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बम्बई के बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग के इन शोधकर्ताओं ने ऐसी ही संयोजित चिकित्सा पद्धति का प्रस्ताव दिया है | अन्य शब्दों में इस संयोजन को इस तरह समझें- जैसे दो गेंद- एक छोटी और एक बड़ी- आपस में जुड़ीं हुई हों | छोटी गेंद दवा से भरी कैप्सूल है, और दोगुने आकर की बड़ी गेंद एक गैस का बुलबुला| ५०० नैनोमीटर आयाम के इस बुलबुले को 'नैनोबबल' कहते हैं, और दवा-वाहक को 'नैनो कैप्सूल' कहा जाता है| यह दोनों अवयव परस्पर सम्मिलित कृत्य द्वारा कैंसर का उपचार करते हैं|

नैनोबबल के दो उद्देश्य हैं| इसे अल्ट्रासाउंड तस्वीरें खोज सकती हैं| इस कारण जब यह बुलबुला रक्त-धमनियों में बहता है, तब तस्वीरों से मार्गदर्शित कैंसर पद्धिति इसके तत्स्थान को भांप सकती हैं| दूसरा उद्देश्य दवा को अधिक प्राभाविक रूप से ट्यूमर में वितरित करना है| अल्ट्रासाउंड को ट्यूमर के नज़दीक प्रयुक्त करने पर ये बुलबुले फूलते और सिकुड़ते हैं, फिर फूट जाते हैं| यह क्रिया ट्यूमर के तंतुओं में ढिलाव ले आती है| तब कैप्सूल आसानी से ट्यूमर की गहराई तक दवा को वितरित कर सकती है; अर्थात नैनोबबल खुद का नाश कर नैनो कैप्सूल के लिए जगह बना देता है|

कैप्सूल दो तरह से कैंसर पर प्रहार करती है| कैप्सूल का खोल उन वसायुक्त अणुओं से बनाया गया है जो प्राकृतिक रूप से जैव-कोशिकाओं की झिल्लियों में पायी जाती हैं| 'लिपोसोम' (liposomes) कहलाने वाले यह कैप्सूल जैवनुकूल होते हैं| इन कैप्सूल का आकार अत्यधिक छोटा (लगभग २०० नैनोमीटर) होना आवश्यक है ताकि ये कोशिकाओं के  बीच की जगह से अंदर जा पाये| कैप्सूल कैंसर-मारक दवाओं से भरी रहती हैं| प्रोफेसर बनर्जी के शोध समूह ने 'पाक्लीटैक्सेल' (Paclitaxel)) नाम की दवा का उपयोग किया है जो कैंसर के कई स्वरूपों में दी जानी वाली कीमोथेरेपी में प्रयुक्त आम दवा है| इसके साथ उन्होंने कोशिकाओं को मारने हेतु प्राकृतिक रूप से उपजित वसायुक्त अणु (फोस्फटिडइलसरीन) (phosphatidylserine) भी उपयोग किया है|

हालाँकि उपर्युक्त सिद्धांत और विधियां पहले से ही ज्ञात हैं, पर इनको संयोजित कर, एक ऐसा सार्विक पायदान उपलब्ध कराना जो विभिन्न प्रकार की चिकित्सा-पद्धितियों में लागू हो सके- यह प्रोफेसर बनर्जी के शोधसमूह की एक नवरचना व नवाचार है|

इस नयी पद्धिति की ट्यूमर-मारक क्षमता जाँचने हेतु, शोधसमूह ने प्रयोगशाला में जीवित कोशिकाओं (इन-विट्रो) और जंतुओं (इन-वीवो) पर प्रयोग किये| परिणाम दिखाते हैं की अल्ट्रासाउंड के संग इस संयोजित पद्धति का असर ऐसी किसी और पद्धति से बेहतर है जिसके उपसंयोजन में किसी एक या अधिक अवयव को छोड़ दिया गया हो| प्रयोग में ये देखा गया की कैंसर-युक्त कोशिकाओं ने तेज़ी से दवा को अवशोषित किया, ट्यूमर में दवा की ज्यादा मात्रा संचित हुई, और उसकी कैंसर-युक्त कोशिकाओं को मारने, या ट्यूमर को घटाने की क्षमता कहीं अधिक असरकारक रही| अन्य प्रयोगों के विपरीत, इस संयोजन में सम्मिलित सभी  जंतु भी जीवित रहे | यहाँ तक कि ट्यूमर कि झिल्ली के इर्द-गिर्द ली गयी अल्ट्रासाउंड तस्वीरें भी प्रचलित विधियों (सोनोव्यू) (SonoVue) की तुलना में  कहीं अधिक साफ़ पायी गयीं|

यह नवरचना एक अनुबंधित कैंसर-मारक पद्धति प्रमाणित होने कि क्षमता रखती है और अल्ट्रासाउंड तस्वीर से मार्गदर्शित चिकित्साविधान के विकास के नए मार्ग खोलती है| इस पद्धति की प्रभाविकता में समग्र वृद्धि, और नैनोबब्बल्स द्वारा प्रदान की गई बेहतर प्रत्योक्षकरण उपचार को और अनुकूलित करने में मदद कर सकता है।

Section: General, Science, Technology, Health, Deep-dive Source:
Bengaluru Friday, 11 January, 2019 - 09:16

দীপাৱলী আৰু অন্যান্য উৎসৱত ব্যৱহাৰ হোৱা ফটকা- আটচবাজীয়ে যথেষ্ট পৰিমাণে বিষাক্ত পদাৰ্থ আৰু ক্ষতিকৰ গেছ নিৰ্গত কৰে। ইয়াৰ ফলত বায়ু প্ৰদূষিত হয় আৰু ই আমাৰ স্বাস্থ্যৰ যথেষ্ট ক্ষতি কৰে। ভাৰতীয় প্ৰযুক্তিবিদ্যা প্ৰতিষ্ঠান গুৱাহাটী আৰু ভাৰতীয় প্ৰযুক্তিবিদ্যা প্ৰতিষ্ঠান দিল্লীৰ গৱেষক সকলে শেহতীয়াকৈ প্ৰকাশ কৰা এক অধ্যয়নত ফটকা-আটচবাজীৰ ফলত হোৱা অত্যাধিক বায়ু আৰু শব্দ প্ৰদূষণ আৰু আমাৰ স্বাস্থ্যৰ ওপৰত ইয়াৰ প্ৰভাৱৰ বিষয়ে বিশ্লেষণ কৰিছিল। এই অধ্যয়নটো জাৰ্নেল অফ হেল্থ এণ্ড পলিউচন  নামৰ পত্ৰিকা এখনত প্ৰকাশিত হৈছে।

গৱেষক সকলে ২০১৫ চনত আই আই টি গুৱাহাটীৰ পৰিসৰত হোৱা দীপাৱলী উদযাপনৰ সময়ত হোৱা শব্দ আৰু বায়ু প্ৰদূষণৰ মাত্ৰাৰ বিষয়ে অধ্যয়ন কৰিছিল। তেওঁলোকে বতাহত উৰি ফুৰা ১০ মাইক্ৰ’মিটাৰতকৈ সৰু ক্ষুদ্ৰ বস্তুকনা (পিএম১০) আৰু শব্দ প্ৰদূষণৰ মাত্ৰা নিৰূপন কৰিছিল। তেওঁলোকে দীপাৱালীৰ সময়ত ১০ দিনলৈকে পিএম১০ ত থকা কেডমিয়াম, কোবাল্ট, আইৰন, জিংক, আৰু নিকেল আদি ধাতু আৰু কেলচিয়াম, এম’নিয়াম, চডিয়াম, পটাচিয়াম, ক্ল’ৰাইড, নাইট্ৰেট, চালফেট আদি আয়নৰ মাত্ৰাৰো বিশ্লেষণ কৰিছিল। স্বাস্থ্যৰ ওপৰত এই প্ৰদূষণৰ প্ৰভাৱৰ বিষয়ে জানিবলৈ তেওঁলোকে প্ৰতিষ্ঠানটোৰ চিকিৎসাকেন্দ্ৰত এক স্বাস্থ্য জৰীপো চলাইছিল।

যদিও ফটকা-আটচবাজী আদিৰ বায়ু আৰু স্বাস্থ্যৰ ওপৰত থকা প্ৰভাৱৰ বিষয়ে যথেষ্ট অধ্যয়ন হৈছে, গৱেষক সকলৰ মতে উত্তৰ পূৰ্বাঞ্চলত এনেকুৱা দুটা মাত্ৰ অধ্যয়নহে সম্পন্ন হৈছে। পূৰ্বৰ অধ্যয়ন সমূহৰ দৰেই এই অধ্যয়নটো দীপাৱলীৰ সময়ত প্ৰদূষণৰ মাত্ৰা যথেষ্ট পৰিমাণে বৃদ্ধি হোৱা দেখা গৈছিল। পিএম১০ৰ মাত্ৰা এই সময়ত ৮১% বৃদ্ধি হোৱাৰ লগতে ধাতু আৰু আয়নৰ মাত্ৰাও ব্যাপক ভাৱে বৃদ্ধি পাইছিল। ৬৫ % বৃদ্ধিৰ সৈতে,শব্দ প্ৰদূষণৰ পৰিমানো অতি বেছি হোৱা পৰিলক্ষিত হৈছিল।

আশ্বৰ্যপূৰ্ণ ভাৱে, গৱেষক সকলে লক্ষ্য কৰিছিল যে দীপাৱলীৰ সময়ত পিএম১০ ত থকা বেক্টেৰিয়াৰ পৰিমাণ ৩৯ % হ্ৰাস পাইছিল।

“সীহ, আইৰন আৰু জিংক আদি ফটকাত ব্যৱহৃত হোৱা গধুৰ ধাতুৰ বিষাক্ততাৰ বাবে ইহঁতৰ অণুজীৱ ধংশ কৰাৰ ক্ষমতা থাকে। দীপাৱলীৰ সময়ত পিএম১০ ত থকা বেক্টেৰিয়াৰ পৰিমাণ হ্ৰাস পোৱাৰ ইয়েই কাৰণ হব পাৰে”, তেওঁলোকে কয়।

দীপাৱলীৰ প্ৰদূষণৰ মানুহৰ স্বাস্থ্যৰ ওপৰতো যথেষ্ট প্ৰভাৱ পৰা দেখা গৈছিল। “ক্ষুদ্ৰ বস্তুকণাৰ (পিএম১০) অতিমাত্ৰা পৰিমাণৰ ফলত চিকিৎসালয়লৈ অহা ৰোগীৰ হাৰ ৬৭% বৃদ্ধি পাইছিল”, গৱেষক সকলে জনায়। তেওঁলোকে আৰু জনায় যে সেই সময়ত মূৰৰ বিষ, ভাগৰ, চকুত জলা পোৰা কৰা আৰু কাহ আদিৰ সমস্যাত ভোগা ৰোগীৰ মাত্ৰা বৃদ্ধি পাইছিল।

গৱেষক সকলে কয় যে দীপাৱলীৰ সময়ত ফটকা-আটচবাজী পৰিহাৰ কৰা বা ইয়াৰ ব্যৱহাৰ সীমিত কৰাৰ জৰিয়তে প্ৰদূষণৰ মাত্ৰা কম কৰিব পৰা যাব। এই অধ্যয়নে ঘন জনবসতি পূৰ্ণ ঠাই সমূহত আটচবাজীৰ মাত্ৰা নিয়ন্ত্ৰণ কৰাৰ ওপৰত গুৰুত্ব আৰোপ কৰে।

“ভৱিষ্যতে, আটচবাজী ব্যৱহাৰ কৰা স্থানত পিএম১০ৰ মাত্ৰা আৰু স্বাস্থ্যৰ প্ৰতি ইয়াৰ ভাবুকিৰ বিষয়ে অধিক অধ্যয়নৰ প্ৰয়োজন আছে”, গৱেষক সকলে কয়।

Section: General, Science, Health, Society, News Source:
Bengaluru Friday, 11 January, 2019 - 00:02

Sperman helped himself to a short break. He had tirelessly divided and divided for the last couple of days, that he had lost sight of where he was! Feeling thoroughly drained, he looked around hoping to find someone to ask for help. But, no one seemed to be bothered!

“Hmmm, looks like my luck has drained out together with my energy! How am I supposed to reach the great ridge now? Or, am I already there? Or, did I already pass it? Wait, was it the one with the board ‘GUTTIN’ RESEARCH’? Wait, it can’t be. Gut is for the Endoderma folks. So, where is the ridge that I’m supposed to be in?,” he wrung his hands in angst hitting a nearby guy in the lipids.

“Watch out man! I want my lipids to be in their place when I finally reach! Aren’t you supposed to be going somewhere too?,” he asked, looking annoyed at Sperman.

“I’m so sorry, Sir. I didn’t mean to hit you in your lipids. I’m afraid I had lost my way. Could you tell me what exactly this place is? And might I add, if you know anything about a great ridge of sorts?,” Sperman asked, hoping the stranger would help in spite of his sweat trickling down his forehead.

The stranger looked curiously at Sperman, rubbing his temple hard. “Are you by any chance one of the PGCs?”

“If you mean Primordial Germ Cell, yes, sir, I am one of those candidates.”

“Ha! Of course, you are! I’m assuming you are looking for this huge, big…what do they say? Um.. oh yeah, colossal, one giant of a building in the great ridge?”

“Yes, yes,“ replied Sperman, taking in the synonyms one by one, of his supposed destination. “Assuming you are also heading there, mind if I tag along with you, Sir?” he quipped.

“Why, sure, provided you don’t give me any more black eyes! And yes, I’m Sperm-Adler,” the stranger introduced himself, shaking Sperman’s hand, and they both took off 90o to the direction that Sperman was walking in earlier.

Their path was still filled with people bustling along minding their own destinations. Here and there, some stopped and appeared to wait for some signal. After getting the cue, they continued as if in response it. It was like a well-orchestrated theatre. Everyone played their parts according to their respective cues they perceived, but neither was aware of their common goal. No one told them why. No one told them when. The result was a beautifully timed synchrony, both in space and time. All they did was to follow their respective scripts and harmony followed faithfully.

After a couple of hours, both PGCs appeared in front of a building which could be described by all of Spermadler’s previous words and more.

“Wow! Just like I imagined albeit a little big, but nonetheless - grand,” Sperman stood entranced with a dropped jaw.

“Hello, you two out there! What do you want? Another set of PGCs?,” the security guard called out. Both of them nodded.

“Go straight to the front desk. You’ll be allotted respective quarters. And pick up your dropped jaw, young man, you might be in need of it.”

They entered the building into a sprawling campus of various different levels with labelled doors in each. They were shortly joined by many more blank-awestruck faces. A couple of uniformed personnel greeted them with a wide welcoming smile.

“Welcome everyone! I know everyone here has had a long tiring journey and so I’ll try to keep this short. For the next couple of months, you will be housed here to undergo an intense training period. The procedure, per say, is not intense physically. However, it might involve taking some very important decisions thus requiring a healthy mental state to do so. I would advise you all, therefore, to maintain perfect shape till you are matured enough to exit and proceed with your journey.” he paused to checked his watch and ended, “So, that will be it. Further instructions will follow later. You will be escorted to your respective quarters now.”

Sperman and Sperm-Adler said their goodbyes and followed their individual volunteers who guided them up the stairs. Once they reached the topmost floor, they were showed to their individual rooms. Individual, but only partially. Each room had the essential furniture in a corner but with a central narrow strip of space that ran common, through all rooms. It was like a narrow hallway right in the centre connecting them. Sperman crashed into his bed and closed his eyes. But, could not sleep for his stomach grumbled loudly in protest.

“Food! Food! I want food!,” he shouted forgetting that his floormates could hear him too.

“Shut up Sperman! Everyone is hungry! But, haven’t we restricted our grumblings to our stomachs?,” came the reply from the next room.

“Ah, it’s you Adler!,” cried Sperman, as he went to his neighbouring cell to see the occupant.

“Don’t worry pal! They told they will be sending someone called Sertoli-s to see to our needs. Infact, these Sertolis - as they call them - stay close to our rooms to protect and nourish us 24*7!,” Spermadler said with a knowing grin.

There came a knock from Sperman’s door.

“Oooh! That must be them. I better go before I drain out of energy!,” said Sperman and bolted out of Adler’s room. He opened the door to find a tall well-dressed man.

“Well, hello Sir! Welcome to the great ridge! I will be your Sertoli all through your stay here. I’ll be staying near and will be tending to all your needs - right from your safety to your poor empty stomach!,” the man said which seemed strikingly like a recital of his job description.

“Safety? From wha--,” What followed made Sperman forget everything momentarily. Plates and plates of food were being brought in to his room. Every kind of cuisine he could possibly imagine was laid out in front of him. Aroma from the next room told the same saga of cuisinal grandeur.

“I’ll leave you to your satiation sir,”. And the Sertoli disappeared behind the door.

Sperman helped himself to everything that he could get his hands on. A nibble of pizza. A spoon of Biryani. A piece of Roti. A drop of pickle. A bite of the juicy grilled chicken with a hint of mayo.

Sleep came to him as gently as the rise of a cup of dark coffee’s aroma. Unmindful of the still unfinished food, he succumbed finally to a deep and peaceful slumber.

“Mmm… just one more stair of pizza. Here I’m! Fully matured! Ready to take on the wor--”

A loud knock interrupted his dream-self from swimming in a lemonade sea.

“Sir! Excuse me, Sir Sperman! Are you awake? If not, should I knock louder still?”

“No no! Please no. I’m awake. Give me a minute!,” Sperman woke up in a daze.

How long has it been since he had slept? He looked around to find his room all neat. Where are all the plates? Right, connected rooms. Creepy as it was, he was happy someone had come to his room and had taken time to clean up his mess. He helped his sleepy-self into pyjamas and opened the door to find the same Sertoli standing.

“Hey man! What’s up? Other than me, I mean,“ he asked visibly annoyed at being disturbed from his euphoric sleep.

“Sorry sir. But I’ve been assigned to give you the necessary instructions. Are you willing to listen to it now, or should I come later?” the Sertoli asked.

“Well, I’m fully awake, thanks to you. So, shoot ‘em at me,”

“Okay, here you go. You’ll be given a paper with the required protocols to follow separately for each floor that you are going to stay. Every floor has its own name and the one you are staying right now is called A1, while the next is A2 and so on. At the end of your stay in each floor, you will be asked to divide yourself into two as you had done before. I’m assuming you know how to use a protein translator - if not, there is a book telling you how to, “ he pointed to a compact little machine in the corner.

He continued, “Also, at the end of each of your floor-stay, you should make a decision as to which two paths you would be taking. This choice will be given only to initial floor-shifts, later becoming more of a pre-planned translocation,” he paused. The Sertoli closed his eyes and went through the instructions once again to make sure he had delivered them all right.

“That will be it, Sir. Do you have any questions?”

“Um, okay. Tell me if I got this right. So, I’ve to change floors every now and then. And at the end of each floor stay, I should make some sort of decision. But, er, I do get to eat and sleep as always, right?” Sperman arched his eyebrows.

The Sertoli gave a laugh. “Yes sir. Definitely. You can continue with your Kreb’s cycles and the rest just like before. Here is the protocol sheet for A1 floor,” he said and left, leaving Sperman trying to comprehend with the load of information and a thin piece of paper.

He freshened quickly and settled in his bed to take a glance at the ‘protocols’.

“Hmmm… okay. That seems doable.”

“Wait, what should I do, again?”

“Oh, I hope that one is a typo.”

Amid all head nodding and self-appraisal, he reached the end of the sheet. He jumped up from his bed, seeming pleased with himself and rushed to the nearby, Adler’s room.

“My man!,” greeted Adler with a friendly shoulder punch at Sperman and continued, “Heard that you slept through for a couple of days! How are you feeling now?” He noticed the paper in Sperman’s hand. “Oh, you got the information late, huh? Pretty neat, right?”

“Right? And, here I was thinking we have to toil hard through this process. Though, the decision phase is going to be a tough call for me. But still, as things stand, I think the journey is going to be just wonderful,” Sperman declared stifling a big yawn.

“I think my Fanta-sea dreams beckons me. See you around later Adler,” said Sperman and left for the comfort of his bed.

So, Sperman finally found his way to the great genital ridge. Now, he has his own Sertoli to guide him through his stay and help.

But, it's not a vacation and Sperman does follow all his ‘instructions’ to the T! What would he do? Why would he have to follow them? What adventures hold in the future? Would he have to make life-changing decisions? Hold on to your seats till the next #FictionFriday!

Section: General, Science, Deep-dive, Friday Features, Fiction Friday Source:
Bengaluru Thursday, 10 January, 2019 - 16:55

Green leafy vegetables like lettuce, kale and spinach brim with the goodness of healthy nutrients. However, sometimes, there is someone unwanted lurking—the pathogenic bacteria Salmonella that causes food poisoning. Salmonella is found in a range of food products like meat, egg, vegetables and processed foods. While it was thought that unhygienic practices followed during shipping and handling these food products could contaminate them, we now know that vegetables could carry the pathogen even before harvesting! In a recent study, researchers from the Indian Institute of Science (IISc) and the University of Agricultural Sciences (UAS), Bengaluru, have explained how Salmonella enters a growing plant from the soil.

Most plant pathogens enter the plant by breaking the cell walls of plant cells with some enzymes. Instead, Salmonella looks for existing openings in the plant body to creep in. Aerial openings, like stomata in the leaves or cracks on the fruits, can make it easier. But, for Salmonella found in the soil, these opening are of little help and entering through the roots is not as easy since there are no such openings. In the current study, published in the journal BMC Plant Biology, the researchers detail how the pathogenic bacteria enter through roots. The study was partially funded by the Department of Atomic Energy, Department of Biotechnology, Department of Science and Technology, University Grant Commission, and  Indian Council of Medical Research.

Previous studies have indicated that the areas in the roots, from where lateral roots emerge, could pave the way for the entry of Salmonella. Lateral roots are horizontal extensions of the primary tap root, which grows vertically. The exact mechanism of this entry was not clear until now. In this study, the researchers show how lateral roots help in their entry and also explore how additional factors, like salt concentration in the soil, affect this process. They used tomato and thale cress (Arabidopsis thaliana) to understand these processes.

“When given an equal opportunity to colonize the plants with high or low lateral roots, Salmonella internalization was found higher in the plants with more lateral roots”, say the authors about their observation. The bacteria make use of the cavity created when the epidermis, or the outer layer of the primary root, remodels when the lateral roots emerge. The bacteria enters the plant through these cavities. Once they are inside, they risk reaching edible parts like the leaves or fruits. “Our results suggest that plant roots not only become susceptible to Salmonella invasion but also enhance its transmission to the aerial edible organs”, add the authors.

The researchers showed that various other factors might influence this entry process. When they artificially increased salt concentration in the soil, the number of lateral roots increased, leading to a higher number of bacteria in the plants. The researchers point out such soil stress factors could play a significant role in this process, and they plan to study the interaction between Salmonella, plant, and soil stress factors in the future. They are also interested in exploring the role of soil-dwelling beneficial organisms in the colonisation process of Salmonella.

The study highlights the potential risks of consuming contaminated vegetables, particularly in its raw form. Finding ways to prevent the contamination of agricultural land might help to address this emerging problem.

Section: General, Science, Health, News Source: Link
Bengaluru Thursday, 10 January, 2019 - 10:23

In India, monkeys have a special place—although they run amok in our neighbourhoods, much to the annoyance of people, they are worshipped as gods by a few. Sometimes, these monkeys carry deadly diseases, like the 'monkey fever' or the Kyasanur forest disease. In a first, a study by researchers from the Indian Institute of Science, Bengaluru, and the Kerala Forest Department, has reported the presence of the human malaria parasite, Plasmodium falciparum, in two species of Indian monkeys.

Malaria is a disease caused by the parasite Plasmodium. It uses mosquitoes and humans as hosts and is known to switch hosts from non-human primates to humans. So far, the Plasmodium species found in monkeys were not found in humans, but there have been cases in the past where humans were infected with malaria parasites found in monkeys, called simian malaria parasites. In this study, the researchers have analysed the genetic information of the Indian simian malaria parasites. The study was published in the journal PLOS Neglected Tropical Diseases and was funded by the Indian Council of Medical Research, Delhi, and the Department of Biotechnology.

“This is the first study to report on the presence of human malaria parasite in Indian monkeys and to explore the genetics of Indian simian malaria parasite. However, we still do not know whether the parasite was able to infect monkeys or was just trying its luck in getting entry into the monkey’s system”, says Dr Jyotsana Dixit, a researcher at IISc and the lead author of the study.

The researchers extracted genetic material from 349 faecal samples of Indian wild monkeys collected from different locations throughout the country. These samples were then screened for the malaria parasite using molecular techniques. It was found that faecal samples from the two common Indian monkey species—rhesus macaque (Macaca mulatta) and bonnet macaque (Macaca radiata)—contained human malaria parasite.

“The presence of the human malaria parasite, P. falciparum, in Indian macaques was an unexpected finding as it had never been reported earlier. However, it is not surprising given such observations have been made before in other primate species”, says Prof. Praveen Karanth, Associate Professor at the Centre for Ecological Sciences, IISc, and an author of the study.

To confirm their surprising findings of the human malaria parasites, the researchers then analysed 94 blood and tissue samples from bonnet macaques in southern India. They found that apart from the known simian malaria parasites, two samples of liver tissues contained the human malaria parasite, Plasmodium falciparum.

When the researchers analysed the population distribution of the monkeys using their genetic data, they found that the populations were genetically mixed up. This finding is interesting because monkeys are known to live in matrilineal troops, where the females remain in their natal territory, and the males disperse when they grow up. “It indicates that human-mediated translocations have played a role in dispersing monkeys all around the country, which has a strong influence on the dispersal of their parasites too. Thus, we need to be cautious before shifting troublesome monkeys from one place to another as it may lead to an easy spread of parasites into new regions”, warns Dr Dixit.

Malaria parasites are known to switch hosts and studies in the past have shown evidence of Plasmodium species turning from apes to humans as hosts. Thus the current study raises few concerns about the proper screening of Indian monkey populations for the presence of malaria parasites as it might be important not only for diseases management but also for evolutionary studies to trace back the history of human malaria parasites.

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मुंबई Wednesday, 9 January, 2019 - 21:52

भारतीय तंत्रज्ञान संस्था मुंबई येथील संशोधक अनुशीतन वापरुन टायटेनियमला आकार देण्याची प्रक्रिया सोपी करायचा प्रयत्न करत आहेत

टायटेनियम पासून बनवलेले संमिश्र धातू विमानाच्या इंजिन पासून मानवी शरीरातील विविध इंप्लांटपर्यन्त अनेक ठिकाणी वापरले जातात. हे संमिश्र धातू कठीण, टिकाऊ, मजबूत व हलके असतात, झिजत नाहीत आणि बायोकंपॅटिबल असतात, म्हणजे शरीरासाठी विषारी नसतात. यामुळे ते अत्यंत लोकप्रिय आहेत. मात्र, याच वैशिष्ट्यांचा तोटा असा की हे धातू हव्या त्या आकारात कापणे अत्यंत अवघड असते. जर या संमिश्र धातूंची भौतिक वैशिष्ट्ये बदलली तर त्यांना कापणे सोपे होईल का?

भारतीय तंत्रज्ञान संस्था मुंबई येथील नॅशनल सेंटर फॉर एरोस्पेस इनोवेशन अँड रिसर्च मधील यंत्र अभियांत्रिकी विभागाचे प्रा. सुशील मिश्रा यांच्या नेतृत्वात संशोधकांचा एक गट या प्रश्नाचे उत्तर शोधण्यात व्यस्त आहे. मागील तीन वर्षात रेणूंच्या पातळीवर संमिश्र धातूंची रचना बदलण्यासाठी त्यांनी अनेक पद्धती शोधून त्या अंमलात आणून बघितल्या, उदाहरणार्थ ज्यात धातू गरम करून मग हळूहळू थंड करतात ते अनुशीतन, किंवा लेझर वापरुन तापवणे. टायटेनियम संमिश्र धातूंचे यंत्रण किंवा मशीनिंग सोपे जावे हा या वापरण्यास सोप्या पद्धती शोधण्याचा उद्देश आहे. यंत्रण म्हणजे अतिरिक्त धातू तासून त्याला हवा तसा आकार देणे.

विविध उत्पादने निर्माण करण्यासाठी धातूला आकार देण्याची एक लोकप्रिय पद्धत म्हणजे कातन किंवा टर्निंग. या पद्धतीत धातूचा दंडगोल गोल फिरत राहतो व त्याचा  पृष्ठभाग तासून त्याला आकार देण्यासाठी एक अवजार वापरले जाते. टायटेनियमला आकार देण्यासाठी टर्निंग वापरणे अवघड असते कारण धातू कठिण असल्यामुळे कापणारे अवजार समतल पातळीवर हलत नाही. यामुळे वैद्यकीय उपयोगाच्या वस्तू बनवताना त्यांचे पृष्ठभाग गुळगुळीत करता येत नाहीत. टर्निंग करताना जेव्हा तासणारे साधन धातूच्या पृष्ठभागावरील थर तासते तेव्हा त्याखालील थराचा आकार बदलल्यामुळे (सबसर्फेस डिफॉर्मेशन) निर्माण होणार्‍या वस्तूची संरचनात्म्क वैशिष्ट्ये कमकुवत होतात आणि पुढे त्यांची झीज लवकर होते. या व्यतिरिक्त, टायटेनियम उष्णतेचे चांगले वाहक नसल्यामुळे तासताना होणार्‍या घर्षणामुळे निर्माण झालेली उष्णता पटकन अपाकृत (धातू लवकर थंड होत नाही) होत नाही आणि परिणामतः पृष्ठभाग असमतल आणि खडबडीत होतो.

अत्यधिक उष्णतेमुळे तासणार्‍या अवजाराचे नुकसान होते, त्याची धार बोथट होते, आणि त्याच्या देखरेखीचा खर्च वाढतो. या उणीवा कमी करण्यासाठी अवजाराच्या साहित्यात, त्याच्या भूमितीत, प्रक्रियेच्या घटकात बदल केले, किंवा उष्णता अपाकृत करण्यासाठी शीतक (कूलंट) वापरले तरी पण या सगळ्याचा खर्च कधीकधी संमिश्र धातूच्या किंमती एवढा होतो!

टायटेनियम संमिश्र धातूला आकार देण्याची प्रक्रिया किती सोपी किंवा कठीण आहे हे संमिश्र धातूचे काठिन्य, आकार, त्यातील स्फटिकांचा आकार आणि त्यातील घटक यावर अवलंबून असते, असे या पूर्वी केलेल्या संशोधनात असे आढळून आले आहे. म्हणून जर टायटेनियम धातूच्या सूक्ष्म-संरचनेत बदल केला तर त्याला आकार देणे सोपे होऊ शकते. अनुशीतन आणि लेसर वापरुन तापवणे या पद्धती वापरुन वरील घटक बदलता येतील का यावर नॅशनल सेंटर फॉर एरोस्पेस इनोवेशन अँड रिसर्च, भारतीय तंत्रज्ञान संस्था मुंबई येथील संशोधक संशोधन करत आहेत.

आकार देणे सोपे करण्यासाठी नवीन दृष्टिकोन

टायटेनियम संमिश्र धातू 'पुनर्स्फटिकीकरण' तापमानापर्यंत, म्हणजेच द्रवणांकापेक्षा थोडे कमी असलेल्या तापमानापर्यंत तापवून हळूहळू थंड केला (म्हणजे अनुशीतन केले) तर धातूची स्फटिकी संरचना बदलते. संशोधकांनी ७००से आणि ९००से या दोन तापमानावर अनुशीतनाची चाचणी केली. त्यांना असे लक्षात आले की ७००से तापमानाला अंशतः स्फटिकीकरण झाले आणि ९००से तापमानाला संपूर्ण स्फटिकीकरण झाले आणि मोठ्या कणांची संरचना तयार झाली. अनुशीतनाचे तापमान वाढवल्यावर धातूचे काठिन्य कमी झाले असेही त्यांच्या लक्षात आले.

संशोधक माहिती देताना म्हणाले, "अनुशीतन न केलेल्या संमिश्र धातूचे काठिन्य हे ९२५से तापमानाला अनुशीतन केलेल्या धातुपेक्षा सुमारे १८% अधिक असते." संशोधकांनी असेही निष्कर्ष काढले की पुनर्स्फटिकीकरणामुळे धातू तासताना तासणार्‍या अवजारावर काम करणारे बल कमी होते आणि त्यामुळे धातूच्या पृष्ठभागाखालील थराचा आकारही कमी बदलतो. अनुशीतन केल्यामुळे आकार देणे सोपे झाले तरीही धातूची कणखरता कमी झाल्यामुळे अनुशीतन हा सर्वोत्तम पर्याय नाही. ही समस्या सोडवण्यासाठी संशोधकांनी लेसर वापरुन धातू तापवण्याचा विचार केला.

धातूला आकार देताना साधारणपणे फक्त पृष्ठभाग तासला जातो आणि म्हणून फक्त तेवढ्या थराचे काठिन्य कमी असले तरी ते पर्याप्त ठरेल. म्हणून संमिश्र धातूच्या फक्त पृष्ठभागातील सूक्ष्म संरचना बदलण्यासाठी संशोधकांनी लेसर बीम वापरुन ते तापवले. त्यांनी एक केन्द्रित लेसर बीम धातूच्या एका टोकापासून दुसर्‍या टोकापर्यंत हलवून धातूचे पृष्ठभाग पुनर्स्फटिकीकरण तापमानापेक्षा अधिक, म्हणजे सुमारे १२००से पर्यन्त तापवला. धातू वितळू नये म्हणून त्यांनी लेसरच्या तीव्रतेवर नियंत्रण ठेवले.  नंतर  तापवलेला धातूचा नमुना हळूहळू थंड होऊ दिला. या प्रक्रियेनंतर त्यांना आढळले की पृष्ठभाग आणि त्याखालील थरात सुईच्या आकाराची स्फटिके निर्माण झाली. त्याहून खाली असलेल्या थरात स्फटिकांचा आकार अधिक रुंद होता जो मूळ स्फटिकांच्या आकारासारखाच होता.

संशोधकांनी १०, १५, २० आणि २५ मिलीमिटर प्रति मिनिट अशा विविध गतीने लेसर हलवून प्रयोग केले. त्यांना २० मिलीमिटर/मिनिट वेगापर्यन्त सूक्ष्म संरचनेत लक्षणीय बदल दिसले, पण त्यापेक्षा अधिक गती वाढवल्यावर विशेष फरक दिसला नाही. संशोधक समजावून सांगताना म्हणाले, "संमिश्र धातू उष्णतेचे चांगला वाहक नसल्यामुळे लेसर हलवण्याची गती वाढवल्यावर उष्णता खालच्या थरापर्यंत पोहचायला वेळ मिळत नाही. म्हणून अशा परिस्थितीत लेसरमुळे प्रभावित झालेल्या भागाची खोली अगदी कमी असते, आणि सूक्ष्म संरचनेत अत्यंत कमी बदल होतो."

एकूणच लेसरमुळे प्रभावित झालेल्या क्षेत्राचे काठिन्य मूळ धातूपेक्षा अधिक होते. काठिन्य वाढल्यामुळे आणि सूक्ष्म संरचनेत बदल झाल्यामुळे टायटेनियम संमिश्र धातूंना आकार देताना तासणार्‍या आवजाराचीची कंपन कमी व्हायला मदत होते. म्हणून अवजार दीर्घकाळ टिकते. त्या व्यतिरिक्त आकार देताना लेसरमुळे प्रभावित क्षेत्र तासले गेले तरीही अधिक काठिन्य असलेला व बदललेली सूक्ष्म संरचना असलेला काही भाग मागे उरतो. यामुळे भविष्यात नुकसान आणि भंग होण्यापासून संरक्षण मिळते.

लेसर वापरल्यानंतर संमिश्र धातूचे यंत्रण सोपे झाले व तासणार्‍या अवजारावर काम करणारे बल कमी झाले ज्यामुळे पृष्ठभाग गुळगुळीत होण्यास मदत झाली. संशोधकांनी हे लेसरमुळे बदललेले धातू कसे तासले जाते याचा पण अभ्यास केला. त्यांच्या लक्षात आले की तासल्यावर निघणारे तास पूर्वीपेक्षा अधिक लांबीचे होते, म्हणजेच लक्षणीय कंपन न होता तासणारे अवजार समानरूपाने आकार देऊ शकले. यामुळे अवजाराचे नुकसान होत नाही आणि त्याचे आयुष्यही वाढते. संशोधकांनी लेसर अनुशीतन प्रक्रियेसाठी एक सांख्यिक प्रतिरूप पण निर्माण केले ज्याचे निष्कर्ष आणि प्रयोगातील निरीक्षणे समान होती.

लेसर स्कॅन करताना लेसर पुढे सरकेल तसे संमिश्र धातूमध्ये उष्णता संचयित होत गेल्यामुळे उष्णता अधिक खोलवर पोहचते हे लेसर वापरण्याचे एक मोठे आव्हान होते. संशोधक म्हणाले, "स्कॅनच्या सुरूवातीला उष्णता लक्षणीय प्रमाणात खोलवर पोहचली. स्कॅन सुमारे २५-३० मिलीमिटर पुढे गेल्यानंतर उष्णता पोहचण्याची पातळी एका विशिष्ट खोलीवर स्थिरावली.  "या असमान उष्णतेमुळे धातूचा काही भाग वाया जाऊ शकतो कारण फक्त समान खोलीवर उष्णता पोहचलेले साहित्यच पुढे वापरता येते. संशोधक यावर उपाय सांगताना म्हणाले, "सांख्यिकी प्रतिरूप वापरुन असे दिसले की धातूवर लेसर फिरवताना लेसरची तीव्रता बदलली तर उष्णता पूर्ण धातूच्या लांबीत समान खोलीपर्यंत पोहचेल आणि वरील समस्या दूर होईल."

प्रा. मिश्रा या अभ्यासाबाबत बोलताना म्हणाले, "उद्योगात अनुशीतन आणि लेसर प्रक्रिया सर्वसामान्यपणे वापरली जाते. आमच्या संशोधनात वापरलेले पर्याय अंमलात आणण्यासाठी कोणतेही विशेष किंवा नवीन बदल करावे लागणार नाही." भविष्यात त्यांच्या कामाच्या दिशेबद्दल प्रा. मिश्रा म्हणतात, "लेसर प्रक्रिया केल्यानंतर धातू तासणार्‍या अवजाराचे आयुष्य आणि प्रक्रिया न केलेल्या धातूवर वापरल्या जाणार्‍या अवजाराचे आयुष्य यांची तुलना करायला पाहिजे. मिलिंग (पेषण) सारख्या इतर आकार देण्याच्या पद्धतींसाठी पण आमची प्रक्रिया वापरता येईल."


हा लेख खालील प्रकाशनांवर आधारित आहे:

A new approach to control and optimize the laser surface heat treatment of materials

Microstructural Development Due to Laser Treatment and Its Effect on Machinability of Ti6Al4V Alloy

Effect of microstructure and cutting speed on machining behavior of Ti6Al4V alloy

Influence of Laser Heat Treatment on Machinability of Ti6Al4V Alloy

Section: General, Science, Technology, Deep-dive Source:
Delhi Wednesday, 9 January, 2019 - 15:22

Researchers from IIT and IIIT Delhi design an algorithm to find rare cells 

Our body is made up of trillions of cells—comprising of all shapes, sizes and kinds. Among this vibrant diversity lie a few outliers, like the circulating tumour cells, cancer stem cells, and some belonging to our immune system, which are rare. Identifying these cells that are few and far between, is a Herculean task. In a recent study, researchers from the Indian Institute of Technology Delhi, and the Indraprastha Institute of Information Technology, Delhi, have developed an algorithm to locate such rare cells based on their genes.

The fact that some cells are few and rare doesn't mean they are unimportant. In fact, many of these play critical roles in our immune responses, replace damaged cells and some are associated with cancer. Hence, identifying them becomes important to detect and treat such conditions. In this study, published in the journal Nature Communications, the researchers propose an algorithm called Finder of Rare Entities (FiRE), that identifies such rare cells by looking at their genes. The study was partially funded by the Department of Science and Technology.

Remember those days when you were asked to ‘spot the difference’ between two almost-identical images, or pick an ‘odd one out’ from a set of similar images? Well, FiRE does something similar among thousands of identical things. It looks for the gene expression profile, or the list of all the genes expressed, of all the cells and identifies the rare one based on the differences in their profile. Each type of cells expresses different genes and hence has a unique gene expression profile. The algorithm assigns a ‘rareness score’ for each of the gene expression profile it looks up. The rarer the type of the cell, the higher is this score. It then shortlists the ‘rare’ ones based on their score.

The researchers evaluated the performance of their algorithm using various datasets. The algorithm successfully identified rare cells from a test dataset containing the expression profile of 68,000 cells. Interestingly, the researchers also identified a rare cell subtype that was previously unknown, using this algorithm during an experiment with a big dataset of mouse brain cells.  These rare cells play an essential role in the development of the pituitary gland in the brain of mammals.

The new algorithm bears great potential in detecting rare cells and diseases. Although a few such algorithms exist, they are very slow. “FiRE took around 31 seconds to analyse a single cell mRNA sequencing dataset containing about 68000 expression profiles. Such unrivaled speed, combined with the ability to pinpoint the truly rare expression profiles, makes the algorithm future proof”, say the researchers.

With the growth in technologies to generate a massive amount of biological data, like the expression profile of genes from individual cells, there is a growing need for the development of tools to analyse those to retrieve the information in the datasets. Algorithms like FiRE, which are fast and efficient would greatly benefit the research community.

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मुंबई Wednesday, 9 January, 2019 - 08:12

जिला स्तरीय अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की बारिश में होने वाले बदलाव मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। 

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स के अनुसार, भारत जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित देशों में छठे स्थान पर है, जो कि देश में बाढ़, चक्रवात, और सूखे जैसी प्रकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति से  स्पष्ट हो जाता है। जलवायु परिवर्तन मानसून को प्रभावित करता है और भारतीय कृषि मानसून पर ही निर्भर है। हालाँकि कई अध्ययनों ने क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन करने का प्रयास किया है किंतु  ऐसे अध्ययनों के आधार पर बनाई गई नीतियाँ जिला-स्तर पर कृषि की समस्या को हल करने में विफल रही हैं। एक अध्ययन में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के शोधकर्ताओं ने महाराष्ट्र के जिलों में कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की जाँच की है।

दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व दिशाओं से बहने वाली नमीपूरित मौसमी मॉनसून हवाएँ सालाना मानसून की बारिश में आती हैं। ये बारिश भारत की वर्षा पोषित कृषि के लगभग ६०% के लिए महत्वपूर्ण हैं और मानसून की हवाओं का समय पर आगमन और पर्याप्तता हमारे कृषि प्रथाओं में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हवाओं की आवृत्ति प्रत्येक मौसम, वर्ष और दशक में भिन्न होती है, और इस बदलाव को मानसून परिवर्तनशीलता कहा जाता है।

सायन्स ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ने बदलती जलवायु के संदर्भ में मानसून परिवर्तनशीलता को समझने की कोशिश की है। अध्ययन ने १९५१ और २०१३ के बीच ६२ वर्ष की अवधि का महाराष्ट्र के ३४ जिलों से एकत्रित दैनिक वर्षा के आँकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन ने बिना किसी वर्षा (सूखा) के लगातार दिनों की संख्या में वृद्धि और जहाँ इस अवधि के दौरान बारिश न्यूनतम आवश्यक मात्रा से अधिक हुई (भारी वर्षा) की लगातार अवधि में कमी को ध्यान में रखा गया। इसने दैनिक वर्षा में  उतार चढ़ाव पर भी ध्यान दिया और साथ में अत्यधिक वर्ष (जिसमे भारी  और बहुत-भारी वर्षा शामिल है) पर भी ध्यान दिया।

इन आँकड़ों के आधार पर, शोधकर्ताओं ने अध्ययन किए गए प्रत्येक जिलों के लिए 'मॉनसून परिवर्तनीयता सूचकांक' की गणना की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के इस अध्ययन के प्रमुख प्राध्यापक  देवनाथन पार्थसारथी ने कहा, "अध्ययन यह समझने की कोशिश करता है कि कैसे मानसून परिवर्तनशीलता सूचकांक जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित महाराष्ट्र के जिलों में प्रमुख फसलों की उत्पादकता को प्रभावित कर रहे हैं।इस अध्ययन में उपयोग की जाने वाली विधियों को दुनिया भर में प्रशासनिक इकाइयों द्वारा अपनाया जा सकता है।"

शोधकर्ताओं ने पाया कि उपरोक्त सभी जिलों में पिछले कुछ वर्षों में सूखे की संख्या में वृद्धि हुई है। हालाँकि, उन्होंने अन्य मानसून परिवर्तनशीलता संकेतकों जैसे कड़ी वर्षा का होना, बारिश की संख्या और बारिश के पैटर्न के उतार-चढ़ाव में महत्त्वपूर्ण मतभेदों को पाया. शोधकर्ताओं ने मानसून परिवर्तशीलता सूचकांक के आधार पर जिलों को क्रम दिया और यह पाया कि विदर्भ और मराठवाड़ा के क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित थे. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इन दो क्षेत्रों में किसानों के आत्महत्या की संख्या अधिकतम है. शोधकर्ताओं ने बताया कि मानसून परिवर्तनशीलता फसल की विफलता और उनकी औसत उपज में कमी का कारण बनती है।

अध्ययन की एक लेखिका सुश्री दीपिका स्वामी बताती हैं कि, "सिंचाई सुविधाओं की कमी, जलवायु परिवर्तन, अक्षम कृषि बाज़ार और सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी इन क्षेत्रों में कम उत्पादकता के अन्य प्रमुख कारण हैं।"

शोधकर्ता विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु परिवर्तनशीलता में अंतर का आकलन करने और इन स्थितियों के आधार पर कृषि प्रथाओं का पालन करने की आवश्यकता पर भी बल देते हैं. फिलहाल जलवायु परिवर्तन पर ‘क्लाइमेट चेंज पर राज्य कार्य योजना’ (एसएपीसीसी) राज्य स्तर पर कृषि-आधारित नीतियों को तैयार करती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्रीय स्तर पर बहुत विविधता है, इसलिए जलवायु परिवर्तन के लिए व्यापक कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है.

कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने के तरीके के बारे में बोलते हुए डॉ. पार्थसारथी कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन की बदलती प्रवृत्ति से सामंजस्य बिठाने के लिए, हमें पहले स्वतंत्र रूप से प्रत्येक क्षेत्र की स्थिति को देखने की आवश्यकता है। हमें पूरे राज्य या बड़े क्षेत्र पर लागू अनुकूली उपायों का प्रस्ताव नहीं करना चाहिए।"

अध्ययन के परिणामों ने उन फसलों की भी पेहचान की है जो बदलते मौसम से सबसे अधिक प्रभावित हैं। मानसून परिवर्तनशीलता गन्ना, ज्वार, मूंगफली जैसी अधिकांश पारंपरिक फसलों को प्रभावित करती है। दूसरी ओर, कपास और अरहर की उत्पादकता पर प्रभाव काफी कम पाया गया।

शोधकर्ताओं ने राज्य में किसानों के हितों की रक्षा के लिए कुछ उपायों का सुझाव दिया है। “वर्तमान कृषि प्रथाओं से हट कर वैकल्पिक प्रथाओं का उपयोग, बुवाई / कटाई की तारीखों में बदलाव, बीज की विविधता का विस्तार, सिंचाई के वैकल्पिक साधन, वैकल्पिक आजीविका का चुनाव, और फसल बाजारों का विनियमन कुछ प्रावधान हैं जिनका पालन जलवायु परिवर्तनशीलता में बदलते रुझानों को अनुकूलित करने के लिए  किया जा सकता है”, ऐसा कहकर डॉ. पार्थसारथी ने अपनी बात समाप्त की।

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Bengaluru Tuesday, 8 January, 2019 - 10:00

Researchers propose a set of recommended actions for hospitals to arm them against superbugs.

Antimicrobial resistance, or the resistance developed by pathogens against many drugs, is an emerging global challenge. Imagine being infected by a bug that is not killed by any available drugs! Well, it is now a reality with tuberculosis and pneumonia as some strains of the causative bacteria are becoming resistant to a wide range of antibiotics, thanks to our reckless use of antibiotics. 

Incidentally, hospitals, which are supposed to heal such patients, are instead turning safe havens for these superbugs. Hence, many hospitals across the globe have adopted a set of strategies, under the antimicrobial stewardship (AMS) programme, to fight these superbugs. The programme promotes the appropriate use of antimicrobial agents, ensures a better clinical outcome, and helps to reduce microbial resistance. In a recent international collaborative study, researchers have proposed some ‘core elements’ and checklist items to strengthen this programme. The study was published in the journal Clinical Microbiology and Infection.

The ‘core elements’ of the AMS programme is a document that complements the existing guidelines on fighting antimicrobial resistance from different organisations. These core elements help hospitals to implement the programme effectively. However, the core elements are not well-defined in many countries, and there is a need to define them based on effectiveness and affordability. “Efforts to identify such core elements have been limited to Europe, Australia, and North America. The aim of this study was to develop a set of core elements and their related checklist items for antimicrobial stewardship programmes that should be present in all hospitals worldwide, regardless of resource availability”, say the authors, talking about the motivation behind this study.

After extensive literature survey and evaluations, the researchers of this study came up with a list of seven core elements that are globally relevant. These core elements are centred around how senior hospital management supports the antimicrobial stewardship programme, the accountability and responsibilities of the hospital team towards the program, availability of experts on infection management, education and practical training for antimicrobial prescribing and stewardship, other actions aiming at responsible antimicrobial use, monitoring and surveillance of antimicrobial use, and reporting and feedback on antimicrobial use on a continuous basis.

The researchers also suggest 29 checklist items related to the core elements. These are a set of questions to cross-check the availability or functioning of the core elements. The Centers for Disease Control and Prevention (CDC) had prepared a similar list before, and the authors found that their core elements are very similar to the ones suggested by CDC. The authors claim that hospitals can adopt the proposed core elements and checklist items based on their clinical setting and resource availability.

“We developed minimum core elements and checklist items that could be relevant to hospital antimicrobial stewardship programmes worldwide. Even though most of these checklist items may not currently exist in most hospitals in low-income countries, we included all of them on the list because our main objective was to identify universally relevant, essential elements and items based on the best available evidence”, say the authors.

The suggested approach provides the necessary guidelines to manage the antimicrobial stewardship program to address the global emergence of drug-resistant microbes. “The next step should be to evaluate its value and then its feasibility and measurability in a range of geographic and resource settings, with a broader stakeholder group”, conclude the authors.

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