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Science News

Bengaluru Friday, 18 January, 2019 - 11:46

Study investigates the abnormalities in the brain of a patient with a neurodegenerative disorder

When the ancient Egyptians embalmed the dead, they took most organs out of the body, including the brain, and left only the heart in place, as they believed that it was the centre of a person's being and intelligence. However, today we know this is not true. In fact, it is the brain that is the seat of all our rational thoughts, and it controls most of our body's functions. Hence, when neurodegenerative disorders, like Parkinson's, strike, we become almost dysfunctional. In a recent study, researchers from the National Institute of Mental Health & Neurosciences (NIMHANS), Bengaluru, and Symbiosis International University, Pune, have investigated the abnormalities that are caused by multiple system atrophy in the grey and white matter of the brain.

Multiple system atrophy, or MSA for short, is a neurodegenerative disorder caused by to the progressive degeneration of the neurons in several parts of the brain. Those affected have tremors, slow movement of the limbs, the rigidity of the muscles, and imbalance. These symptoms are collectively known as the Parkinson’s disease or MSA-P.  There is also MSA-C, caused when the brain's cerebellum does not function properly. The affected individual cannot coordinate voluntary muscular movements of the arms, his/her gait is affected, and he/she has difficulty in articulating words.

In this study, published in the journal European Radiology, the researchers analysed 26 MSA patients for about two years to study their symptoms and assess how this disorder was affecting their brain. They performed voxel-based morphometry, a technique used to measure the differences in local concentrations of brain tissue. They also compared the Magnetic Resonance Imaging scans of these patients, done to map the white matter in the brain, with 25 healthy individuals in the same age group and gender.

The brain is made up of the grey matter and white matter. While the grey matter is made up of neurons or nerve cells, the white matter is a of bundle of nerve fibres that form a fine meshwork and connects various grey matter areas.

The study found that the white matter was more affected than the grey matter in the early stages of MSA. These changes were observed to be greater in patients with MSA-C than with MSA-P. The initial structural changes with MSA included the loss of grey matter in certain parts of the brain, like the cerebellum, that is responsible for voluntary movements, and the subcallosal gyrus, which is part of the limbic system. There were also some changes in the white matter of the cerebrum and cerebellum.

In patients with MSA-C, some grey matter was lost from the cerebellum, and the observed changes in the white matter affected the cerebellum and the association tracts that connect areas of the brain. In contrast, there was no loss of grey matter in the brains of patients suffering from MSA-P, and the changes to the white matter were seen mainly in the cerebrum region.

The findings of the study could help researchers better understand what happens to the brain of a person suffering from neurodegenerative disorders like MSA. Such an understanding can help devise better forms of preventive treatments that can slow down the progression of the condition. 

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मुंबई Friday, 18 January, 2019 - 09:58

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के शोधकर्ता, एनीलिंग के माध्यम से टाइटेनियम की मशीनिंग को आसान करने के तरीकों पर काम कर रहे हैं

चमकदार टाइटेनियम से बने टाइटेनियम मिश्र धातु, विमान इंजन से लेकर मानव शरीर के अंदर यांत्रिक प्रत्यारोपण तक अनेक उत्पादों में उपयोग किए जाते हैं। उनका व्यापक उपयोग टिकाऊ, कठोर, हल्के वजन, संक्षारण और जैव-संगत प्रतिरोधी होने की उनकी अनूठे गुणों के कारण होता है। साथ ही साथ ये हमारे शरीर के लिए भी विषैले नहीं होते हैं। हालांकि, इन गुणों का एक दूसरा पहलु भी है; ये वांछित आकार में लाने के लिए टाइटेनियम मिश्र धातु को मुश्किल बनाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या इन मिश्र धातुओं के भौतिक गुणों को बदलकर इन्हे मशीनिंग करना आसान होगा?

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई, नेशनल सेंटर फॉर एयरोस्पेस इनोवेशन एंड रिसर्च में यांत्रिक अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक सुशील मिश्रा की अगुवाई में शोधकर्ताओं के समूह के सामने यही सवाल है। पिछले तीन वर्षों में, शोधकर्ताओं ने आणविक स्तर पर मिश्र धातुओं की संरचना को बदलने के लिए विभिन्न तरीकों को तैयार और कार्यान्वित किया है, जैसे एनीलिंग जिसमें हीटिंग एवं क्रमिक शीतलन और लेजर हीटिंग शामिल है। इन तरीकों को कार्यान्वित करने के बाद इन मिश्र धातुओं से अतिरिक्त सामग्री को हटाकर वांछित आकार में  लाना आसान है।

टर्निंग, अवयव बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक लोकप्रिय मशीनिंग विधि है। वांछित आकार प्राप्त होने तक, एक घूर्णन बेलनाकार पट्टी की सतह से अवयव को हटाने के लिए एक उपकरण का उपयोग किया जाता है। टाइटेनियम के मामले में, टर्निंग आसान नहीं है क्योंकि धातु की कठोरता के कारण काटने (मशीनिंग) के उपकरण की गति में असमान प्रभाव होता है। इस कमी से बायोमेडिकल अनुप्रयोगों में उपयोग किए जाने वाले और चिकनी सतह की जरूरत होने वाले भागों के निर्माण में समस्या होती है। टर्निंग के दौरान, जब उपकरण सामग्री को खुरेदता है, तो धातु सतह  के नीचे विकृत हो जाती (उपसतह विरूपण) है जो अंतिम घटक के संरचनात्मक गुणों को दुर्बल करता है और इसे संक्षारण के लिए अतिसंवेदनशील बनाता है। इसके अलावा, मशीनिंग के दौरान घर्षण के कारण उत्पन्न ताप का जल्दी से क्षय नहीं होता है क्योंकि टाइटेनियम ताप का खराब चालक होता है, जिससे सतह ऊबड़-खाबड़ और अनियमित हो जाती है।

अत्यधिक ताप मशीनिंग के टूल उपकरण को नुकसान पहुंचाती है जिससे इसकी रखरखाव लागत में वृद्धि और इसके किनारों को भी खराब करती है। हालांकि उपकरण टूल अवयव, ज्यामिति और मशीनिंग मापदंडों, में बदलाव किए गए हैं साथ ही साथ शीतलक का प्रयोग इन दोषों को दूर करने और ताप कम करने के लिए उपयोग होता है। इन तरीकों से लागत में वृद्धि होती है जिसके कारण कभी-कभी टाइटेनियम मिश्र धातु खरीदना बहुत महंगा हो जाता है।

पिछले शोधों से पता चला है कि टाइटेनियम मिश्र धातु की मशीनीयता विभिन्न कारकों द्वारा निर्धारित की जाती है जिनमें उनकी कठोरता, आकार एवं  क्रिस्टल की बनावट, और उनकी रचना शामिल है। इसलिए, टाइटेनियम मिश्र धातु के सूक्ष्म संरचना को बदलने से इसकी मशीन क्षमता में वृद्धि हो सकती है। एयरोस्पेस इनोवेशन एंड रिसर्च, आईआईटी मुंबई के नेशनल सेंटर के शोधकर्ता, एनीलिंग और लेजर हीटिंग का उपयोग करके इन कारकों को बदलने की संभावना पर विचार कर रहे हैं।

मशीनीयता में सुधार करने के लिए नए दृष्टिकोण

टाइटेनियम मिश्र धातु की क्रिस्टल संरचना को बदलने का एक तरीका यह है कि इसे 'पुनरावृत्ति (रेक्रिस्टॉलिजेशन) तापमान' तक गर्म करें। यह एक ऐसा तापमान है जो पर्याप्त रूप से उच्च है लेकिन धातु के पिघलने वाले तापमान से कम है। और फिर इसे धीरे-धीरे इसे ठंडा करें (एनीलिंग)। आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने दो तापमान, लगभग ७०० डिग्री सेल्सियस और ९०० डिग्री सेल्सियस पर एनीलिंग का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि जब मिश्र धातु को लगभग ७०० डिग्री सेल्सियस तक गरम किया जाता है, तो इसका आंशिक रूप से इसका रेक्रिस्टॉलिजेशन होता है जबकि ९०० डिग्री सेल्सियस तक गरम करने पर इसका पूर्ण रेक्रिस्टॉलिजेशन हो जाता है, जिससे बड़ी ग्रेन संरचना बनती है। यह भी देखा गया है कि नमूनों की कठोरता एनीलिंग तापमान में वृद्धि के साथ घट जाती है।

इस शोध में शामिल शोधकर्ताओं का कहना है, "विक्रेताओं से प्राप्त सीधे नमूने, ९२५ डिग्री सेल्सियस पर एनीलिंग किये गए नमूनों की तुलना में लगभग १८% कठोर हैं"। उन्होंने यह भी देखा कि रेक्रिस्टॉलिजेशन, उपकरण पर मशीनिंग के दौरान अनुभव किया जानेवाले प्रतिक्रियाशील बल, और इसके परिणामस्वरूप उपसतह विकृति को कम करता है। जबकि एनीलिंग से मशीनीयता आसान हो गयी फिर भी टाइटेनियम मिश्र धातु के कुछ वांछनीय गुणों, जैसे की मजबूती को बनाए रखने का सबसे अच्छा विकल्प नहीं था। इसलिए इसके बाद शोधकर्ताओं ने लेजर हीटिंग का प्रयोग किया।

अक्सर धातु की सतह, जहाँ  पर मशीनिंग होनी है, का कम कठोरता होना पर्याप्त होता है इसलिए, शोधकर्ताओं ने लेजर बीम का उपयोग करके चुनिंदा हीटिंग द्वारा केवल सतह पर मिश्र धातु के सूक्ष्म संरचना को बदलने का प्रयास किया। उन्होंने सतह के तापमान को रेक्रिस्टॉलिजेशन तापमान से अधिक  मतलब १२०० डिग्री सेल्सियस तक गर्म करने के लिए मिश्र धातु नमूने के एक छोर से दूसरी तरफ एक केंद्रित लेजर बीम को स्थानांतरित किया। धातु को पिघलने से रोकने के लिए लेजर बीम की तीव्रता को नियंत्रित किया और इसे धीरे-धीरे ठंडा किया। इस प्रक्रिया के बाद उन्होंने देखा कि सुई के आकार के क्रिस्टल, सतह और उप-सतह के पास बने। सतह से अंदर की ओर के भाग में मूल धातु के समान आकार के क्रिस्टल मौजूद थे।

शोधकर्ताओं ने लेजर को १०, १५, २० और २५ मिलीमीटर प्रति मिनट की विभिन्न गति से नमूने को स्कैन करने का प्रयोग किया। २० मिलीमीटर प्रति मिनट की गति तक स्कैन गति के बढ़ने के साथ कठिनाई में बदलाव देखा, लेकिन इस गति से परे कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं दिखाई दिया।

शोधकर्ता समझाते हैं कि, "उच्च स्कैनिंग गति पर, मिश्र धातु की कम थर्मल चालकता के कारण नमूने में ताप के प्रवेश का समय कम था। इसलिए, इस स्थिति में लेजर प्रभावित क्षेत्र की गहराई कम और सूक्ष्म संरचना में बहुत कम परिवर्तन पाया गया।” कुल मिलाकर, लेजर प्रभावित क्षेत्र में कठोरता मूल धातु की तुलना में अधिक है।

कठोरता में वृद्धि और सूक्ष्म संरचना में परिवर्तन टाइटेनियम मशीनिंग से जुड़े उपकरण काटने पर अस्थिरता को कम करने में सहायक होता है। इससे उपकरण के जीवनकाल में वृद्धि होती है। इसके अलावा, लेजर प्रभावित क्षेत्र के अंदर अवयवों को मशीनिंग के माध्यम से हटाने के बाद, उच्च कठोरता (मूल सामग्री से अधिक) के साथ संशोधित सूक्ष्म संरचना की कुछ परत बन जाती है, जो फ्रैक्चर के प्रतिकूल इसे मजबूत करता है।

लेजर किये हुए नमूनों की मशीनिंग आसान थी और काटने के दौरान विरोधी बल में भिन्नता कम थी, जिसके परिणामस्वरूप सतह की चिकनाई बेहतर थी। इन नमूनों के लिए, शोधकर्ताओं ने धातु काटने के दौरान निकलने वाले चिप्स (छीलनों) का भी अध्ययन। लेजर किये हुए नमूनों की मशीनिंग के वक्त निकलने वाले चिप्स मूल तरीके से निकलने वाले धातु चिप्स से अधिक लंबे थे, जो यह इंगित करता है कि उपकरण धातु को लक्षणीय कंपन के बिना समान रूप से काट सकता है। ये कारक उपकरण क्षति को रोक देंगे और लंबे उपकरण जीवनकाल की ओर ले जाएंगे। शोधकर्ताओं ने लेजर एनीलिंग की प्रक्रिया को अनुकरण करने के लिए एक संख्यात्मक मॉडल भी विकसित किया और पाया कि परिणाम प्रयोगात्मक अवलोकनों से मेल खाते हैं।

लेजर का उपयोग करने में एक महत्वपूर्ण चुनौती यह थी कि ताप जमा होने के कारण नमूने की लंबाई के साथ, ऊष्मा जिस गहराई तक पहुँचती है उस गहराई में वृद्धि हो जाती है। शोधकर्ताओं का कहना है, "लेजर हीटिंग के शुरुआती बिंदु से अंत तक, गहराई में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और लगभग २५-३० मिलीमीटर के बाद, लगभग स्थिर हो गयी।" असमान तापन धातु का अपव्यय होता है क्यूँकि धातु के केवल उस हिस्से का उपयोग किया जा सजता है जहाँ ऊष्मा प्रवेश की गहराई समान हो। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि, "संख्यात्मक मॉडल का उपयोग करके, समान तापमान प्रवेश गहराई को बनाए रखने के लिए लंबाई के साथ लेजर पावर को बदलके इस समस्या को हल किया जा सकता है।”

प्राध्यापक मिश्रा कहते हैं कि, "एनीलिंग और लेजर उपचार, दोनों ही उद्योगों में नियमित रूप से संचलित होते हैं। इस शोध में सुझाए गए दृष्टिकोणों को विशेष उपकरणों की आवश्यकता नहीं है और उन्हें तुरंत लागू किया जा सकता है। हमें लेजर प्रयोग न किए गए नमूने की तुलना में लेजर प्रयोग नमूनों के साथ उपकरण की आयु का अध्ययन करने की आवश्यकता है। इस शोध पद्धति उपयोग अन्य मशीनिंग परिचालनों जैसे मिलिंग के किये भी किया जा सकता है।”


यह लेख निम्नलिखित संदर्भों पर आधारित है :

A new approach to control and optimize the laser surface heat treatment of materials

Microstructural Development Due to Laser Treatment and Its Effect on Machinability of Ti6Al4V Alloy

Effect of microstructure and cutting speed on machining behavior of Ti6Al4V alloy

Influence of Laser Heat Treatment on Machinability of Ti6Al4V Alloy

Section: General, Science, Technology, Deep-dive Source:
Thiruvananthapuram Friday, 18 January, 2019 - 08:21

A new study suggests that stripes and colourful tails of some lizards may help them ward off predators

The black and white stripes of a zebra may be attractive to us, but did you know they evolved so to confuse predators?  Called ‘motion dazzle’, the lines make it hard for the predator, to judge the speed and direction of the moving prey. This strategy was also used during World War I where navy ships were painted with black and white patterns to avoid being attacked by torpedo missiles from submarines. In a recent study, researchers from the Indian Institute of Science Education and Research Thiruvananthapuram (IISER-TVM) and the University of Turku, Finland, have studied the motion dazzle effect in lizards. The study, published in the Journal of Evolutionary Biology, is one of the first to use data from real animals to understand this phenomenon and its evolutionary significance.

Some lizards, like Eutropis bibronii—a species of skink from India—have longitudinal body stripes, and Lygosoma punctata—a common species of skink found in parts of South and Southeast Asia—have both longitudinal stripes and a colourful tail. Previous studies have shown that body stripes and striking colouration on the tail deflect predators to attack the tail instead of the body, giving a chance for the lizard to escape.

“In some lizards, the tail can be lost and regrown, the stripes on the body might create an illusion in such a way that the predator ends up catching the tail instead of the main body during motion”, says Gopal Murali from IISER-TVM, who is the lead author of the study. The study was funded by the Department of Science and Technology and IISER-TVM.

The researchers of the current study started with several hypotheses of correlations between the colour patterns and ecological traits of lizards based on the principle of motion dazzle (for stripes) and attack deflection (for colorful tail). They tested these hypotheses by analysing nearly 8000 lizard photos from over 1600 different species.

The researchers found that striped species of lizards, like Eutropis bibronii, had a higher body temperature than those without stripes. The mobility of ectothermic animals—animals that cannot regulate their body temperature—depends on their body temperature. Thus, lizards with longitudinal stripes and higher body temperature have higher mobility and can rapidly escape from predators.

“This correlation is expected because motion dazzle patterns work only when the animal is in motion”, adds Murali.

Interestingly, the study also found that both body stripes and colourful tails are associated with diurnal behaviour, where the lizards are active during the daytime. This association could be because the colourations may be ineffective in the dark against predators that rely on sight. The researchers suggest that body stripes and colourful tails likely evolved in lizards that are active during the day.

Besides, the researchers hypothesized that this evolution is also driven by the lizard’s ability to lose its tail. This defence mechanism, known as caudal autotomy, first evolved over 280 million years ago in reptiles. Without it, there would be no benefits for the lizards from deflecting the attacks on their body to their tail! The researchers tested this hypothesis and found evidence to support that these colourations may have evolved with caudal autotomy. Additionally, there was a strong correlation between stripes and tail colouration.

“We speculate one of the reasons to be that the deflective effect of one of the colourations alone can be enhanced by the other”, says Murali.

The findings of the study appear to be supported by observations in real animals and apply to almost all lizard species worldwide. Lygosoma punctata, for example, has longitudinal stripes on its body and a bright red-coloured tail when it is a juvenile. It is known to have many predators including birds, snakes and mammals. It is also diurnal and can lose its tail when attacked, giving it a significant chance of survival. It can thus direct an attack from its body towards its tail. Other lizards, like the Bengal monitor (Varanus bengalensis), have neither any striking colouration nor the ability to lose their tail. Since these large lizards have few natural predators, they did not evolve to develop such defence mechanisms.

The next time you see a lizard with a bright tail or zebra-like stripes on its body, think of the long tale behind the tail!

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Dhanbad Thursday, 17 January, 2019 - 12:44

In a recent study, researchers from the Indian Institute of Technology (ISM) Dhanbad have developed a blood glucose sensor to monitor blood sugar using light. It can measure a wide range of values of blood glucose, between 10 to 200 mg/dl, say the researchers. The average blood sugar level in healthy adults when fasting is between 70 to 120 mg/dl.

Light-based sensors to analyse biological samples is gaining popularity as they are easy to use and do not destroy the test sample. These sensors can just be dipped in the sample to detect the compound of interest. The sensor, proposed by the researchers of this study, can track small variations in the blood sugar levels and is based on the working of an optical ring resonator.

Think of an optical ring resonator as a ‘whispering gallery’. In a whispering gallery, sound waves that start off as small whispers magnify soon to become a loud noise. Similarly, in an optical resonator, light waves of specific wavelengths that pass through the resonator intensify due to repeated internal reflection and interference. Optical ring resonators are very sensitive and provide accurate readings as there are little distortions due to the presence of other impurities. A wide variety of molecules and chemicals, including those in the gaseous phase, could be measured using these devices.

Optical ring resonators are used to study specific biomolecules, like proteins, bacteria, cells or DNA samples, by looking at how they interact with light and deviate it. Presence of such bioparticles changes the refractive index of the medium in which they are present, resulting in the deviation of resonance conditions of the resonator when it is dipped in the medium. The change in the resonance wavelength is related to the number for bioparticles in the medium.

In this study, the researchers used an optical resonator to measure glucose levels in blood samples. The presence of glucose molecules modify the light output of the resonator, and the magnitude of this modification depends on the number of glucose molecules, thus letting one measure it indirectly by measuring the light output.

The researchers used two types of waveguides—devices that confine waves in a particular direction. A slot waveguide has slots made in a rectangular tube through which waves are passed, and a ridge waveguide has a ridge on the two opposite faces of a rectangular tube. They observed that slot-based resonator is six times more sensitive than the ridge-based resonator. Sensors with both these configurations were able to detect minimal variations in the glucose concentration in the samples.

With India being the ‘diabetic capital of the world’, such innovations that help easy and accurate measurements of blood glucose levels could help us keep a check. 

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मुंबई Thursday, 17 January, 2019 - 07:27

शहरीकरण आणि वाढत्या शेतीमुळे पाणी झिरपण्याच्या  संरचनेत आणि मृदेच्या हालचालीत बदल झाल्याचे आयआयटी मुंबई येथील अभ्यासातून निदर्शनास आले आहे. 

नैऋत्य मौसमी पावसामुळे दक्षिण कर्नाटकातील नेत्रावती किंवा बंटवाल या ऐतिहासिक नावाने ओळखल्या  जाणाऱ्या नदीला येणारा पूर ही आता नित्याचीच बाब झाली आहे. अजूनही पाण्याची पातळी वाढली की बंटवाल गावातल्या लोकांना १९७४ साली आलेल्या महाभयंकर पुराची आठवण होते. २०१३, २०१५ आणि आत्ता २०१८ मध्ये देखील असेच झाले. नदीच्या पाण्याच्या पातळीत होणारे हे बदल पावसातील बदलामुळेच आहेत की काय? भारतीय तंत्रज्ञान संस्था मुंबई यांनी केलेल्या अभ्यासानुसार तसे नसून नेत्रावतीच्या खोऱ्यातील जमिनीचा ठराविक पद्धतीने होणारा वापर हे त्याचे एक महत्त्वाचे कारण आहे.

नेत्रावतीच्या खोऱ्यात पावसाचे पाणी वाहून जाऊन जमिनीची धूप होण्याचे प्रमाण वाढले आहे. त्यामागे शहरीकरण हे प्रमुख कारण असल्याचे एन्व्हायर्नमेंटल हेल्थ सायन्सेस या नियतकालिकात प्रसिद्ध झालेल्या या अभ्यासातून दिसते. अभ्यासकांनी १९७२ पासूनचे  भूतकाळातील पाच कालखंड आणि २०३० मधील एका परिस्थितीचा अंदाज बांधून त्याचे विश्लेषण केले. त्यासाठी त्यांनी मृदा आणि पाणी मूल्यमापन साधन (सॉईल अँड वॉटर असेसमेंट टूल - SWAT) वापरले. या संशोधनाला विज्ञान आणि तंत्रज्ञान विभाग, भारत सरकार यांचे आर्थिक सहाय्य लाभले.

पश्चिम घाटात उगम पावणारी नेत्रावती नदी ही मंगळूर आणि बंटवाल शहरांच्या पिण्याच्या पाण्याचा प्रमुख स्रोत आहे. “नेत्रावतीच्या खोऱ्यात सुमारे १.२ दशलक्ष लोक राहतात. २०३० सालापर्यंत हा आकडा दुपटीहून अधिक होईल असा अंदाज आहे. शेतीचे व्यवस्थापन चांगल्या प्रकारे करता यावे आणि पाण्याचे स्रोत व्यवस्थित सांभाळता यावेत यासाठी भविष्यातील बदलांचा अभ्यास आवश्यक आहे.” असे आयआयटी मुंबई येथील स्थापत्य अभियांत्रिकी विभागातील प्राध्यापक एल्डो टी. आय. सांगतात. ते वरील शोधनिबंधाचे लेखक आहेत.

पाण्याच्या आजूबाजूच्या जमिनीचा वापर कशासाठी होतो आणि त्या जमिनीवर काय आहे (जमिनीवरचे आच्छादन) या दोन गोष्टींवर पाण्याची उपलब्धता ठरते. जमिनीच्या वापरात किंवा जमिनीवरच्या आच्छादनात कोणताही बदल झाला तर त्या प्रदेशातील झाडांचे आवरण, काँक्रीटचा भाग, उंचसखल भाग या गोष्टींवर परिणाम होतो. त्याचा परिणाम पावसाच्या पाण्याचा निचरा होणे आणि पाण्याचा प्रवाह यावर होतो. उदाहरणार्थ, वाढत्या शहरीकरणामुळे पाण्याला प्रतिबंध करणाऱ्या काँक्रीटच्या आवरणात वाढ होते. त्यामुळे पाणी चटकन वाहून जाते आणि जमिनीत पावसाचे पाणी मुरण्याचे प्रमाण कमी होते. अशारितीने पिण्यासाठी, शेतीसाठी आणि इतर कामांसाठी जमिनीत झिरपलेल्या पाण्यावर अवलंबून असलेल्या त्या भागातील लोकांना पाण्याची टंचाई जाणवते.

वरील अभ्यासानुसार, १९७२ साली ६० चौरस किमी असलेला शहरी भाग २०१२ साली २४० चौरस किमीपर्यंत म्हणजेच चौपटीने  वाढला आहे. २०३० पर्यंत हीच वाढ ३४० चौरस किमीपर्यंत जाईल असा अंदाज आहे. भरघोस वेगाने वाढणाऱ्या शहरीकरणामुळे पूर येण्याचा धोका वाढतो, जमिनीत झिरपलेल्या पाण्याची उपलब्धता कमी होते आणि जमिनीची धूप झाल्याने शेतीची उत्पादकता कमी होते.

वरील अभ्यासातून असेही निरीक्षण मांडण्यात आले आहे की, नदीच्या खोऱ्याच्या गुणधर्मात झालेल्या बदलांचे दुसरे महत्त्वाचे कारण म्हणजे शेतीतील वाढ हे आहे. १९७२ पासून २०१२ पर्यंत शेतीचा प्रदेश सुमारे १५% वाढला आहे. २०३० पर्यंत त्यात २४% वाढ झालेली असेल असा अंदाज आहे. याउलट, जंगले कमी होत चाललेली असून वर सांगितलेल्या काळात १८% जंगलतोड झालेली आहे. २०३० पर्यंत जंगले आणखी २६% ने कमी होतील असे अनुमान या अभ्यासातून काढण्यात आले आहे.

“नदीच्या खोऱ्याच्या खालच्या बाजूला, मंगळूर शहराच्या आसपास शहरीकरण अधिक आहे. पूर्व भागात आणि खोऱ्याच्या खालच्या बाजूला नदीच्या काठाने असणाऱ्या प्रदेशातील शेतीत सर्वाधिक बदल झालेले दिसून येतात. शहरी भागात झालेल्या बदलांचे परिणाम २०३० पर्यंत दिसत राहतील असा अंदाज आहे.” वरील अभ्यासातून काढलेल्या निष्कर्षांबद्द्ल बोलताना प्राध्यापक एल्डो सांगतात.

पाण्याच्या टंचाईचा धोका उंबरठ्यावर येऊन ठेपला आहे. अशावेळेस, वरील शोधाच्या निष्कर्षांचा उपयोग नदीखोऱ्यातील पाण्याचे व्यवस्थापन चांगल्या रीतीने करण्यासाठी होईल असे संशोधकांना वाटते. त्यांनी त्या दृष्टीने काही उपाय सुचवले आहेत. त्यात जमिनीचा वापर व जमिनीचे आच्छादन यातील बदलांमुळे होणारे दुष्परिणाम कमी करण्यासाठी वनीकरण करण्यावर भर दिला आहे.

प्राध्यापक एल्डो म्हणतात, “मंगळूर, बंटवाल आणि पुत्तूर भागात येत्या काळात शेतीत आणि शहरीकरणात जास्तीत जास्त वाढ होणे अपेक्षित आहे. तसेच नेत्रावती खोऱ्यातील कमी लोकसंख्येच्या प्रदेशातील पाणीटंचाई आणि गुणवत्तेच्या प्रश्नांचा सामना करणे आवश्यक आहे.”

वरील शोधनिबंधात सांगितलेल्या पद्धती वापरून इतर नद्यांच्या खोऱ्यातील पाण्याचे व्यवस्थापन करणे देखील शक्य आहे असे लेखकांचे म्हणणे आहे. ‘पश्चिम घाटातील नद्यांच्या खोऱ्यावर सध्या आणि भविष्यातदेखील कशाचा परिणाम सर्वात जास्त होतो? जमिनीच्या वापरातील बदलाचा का हवामानातील बदलाचा?’ या महत्त्वाच्या प्रश्नाचे उत्तर शोधायचा प्रयत्न ते यानंतर करणार आहेत. या भागातील पाण्याच्या स्रोतांच्या व्यवस्थापनाची योग्य अशी योजना तयार करण्याचाही संशोधकांचा प्रयत्न आहे.

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पुणे Wednesday, 16 January, 2019 - 13:53

सरपटणाऱ्या प्राण्यांचा व बेडकांचा अभ्यास करणाऱ्यांना म्हणजेच उभयसृपशास्त्रज्ञांना २०१८ चे वर्ष प्रोत्साहित करणारे होते कारण मंडूक व पालीच्या २० नवीन जाति इथे सापडल्या. २०१९ सुरू होत असताना हेच सत्र चालू ठेवत सावित्रीबाई फुले पुणे विद्यापीठ आणि झुऑलॉजिकल सर्व्हे ऑफ इंडिया, कोलकाता येथील शास्त्रज्ञांनी महाराष्ट्रात असलेल्या उत्तरेकडील पश्चिम घाटांत किरकिऱ्या बेडकाची (क्रिकेट फ्रॉग) एक नवीन जाति शोधली आहे. झूटॅक्सा या जर्नल मध्ये त्यांनी या शोधाबद्दल सविस्तर लिहिले आहे.

महाराष्ट्रात सापडलेल्या या बेडकाला राज्याच्या अधिकृत भाषेवरून ‘फेजेरवार्या मराठी’ किंवा ‘मराठी फेजेरवार्या बेडूक’ असे नाव दिले आहे. सध्या ‘फेजेरवार्या मराठी’ पुणे जिल्ह्यातील लोणावळा व मुळशी येथील काही ठिकाणीच दिसून आला आहे,

“(परंतु) ‘फेजेरवार्या मराठी’ बेडकाची राहण्याच्या जागेची नैसर्गिक पसंती  पश्चिम घाटाच्या उत्तरेतील भागासदृश असल्याने अहमदनगर आणि रायगड या शेजारील जिल्ह्यातही काही ठिकाणी हे बेडूक सापडू शकतील” असे या संशोधनाचे प्रमुख असलेल्या सावित्रीबाई फुले पुणे विद्यापीठाच्या डॉ. समाधान फुगे यांनी सांगितले.

संशोधकांनी एकात्मिक वर्गीकरण पद्धत वापरून नवीन शोधलेल्या बेडकांच्या डीएनए, भौगोलिक व्याप्ती, ओरडण्याचे स्वरूप आणि आकार यांची तुलना सारख्या असलेल्या, एकाच प्रजातीच्या आणि एकच अधिवास असलेल्या ‘फेजेरवार्या सेपफी’, ‘फेजेरवार्या सह्याद्रेनेसिस’ आणि ‘फेजेरवार्या ग्रॅनोसा’ या बेडकांशी केली.

‘फेजेरवार्या मराठी’ जाति असलेले बेडूक डबकी, तलाव, भातशेती आणि माळरानं असलेल्या ठिकाणी आढळतात. बहुतांश बेडकांप्रमाणे त्यांचाही प्रजननकाळ पावसाळ्यात असतो असे दिसून आले. यांचे ओरडण्याचे स्वरूप, २४ स्वरांची एक सलग माला, असे असते.

“नर पाण्याच्या डबक्यांजवळ बसून बराच वेळ एकाच स्वरात सुमारे ४० सेकंद ओरडतात. असे ओरडणे या भागात सापडणाऱ्या यासारख्याच असलेल्या फेजेरवार्या बेडकांचे वैशिष्ट्य आहे. या विशिष्ट पद्धतीच्या ओरडण्यामुळे नवीन जाति ओळखणे सोपे जाते” असे संशोधक म्हणतात. मादी डबक्याच्या किंवा तलावाच्या उथळ भागात अंडी घालते. ही अंडी खेकड्यांचे भक्ष्य झाल्याचे संशोधकांनी नमूद केले आहे.

‘फेजेरवार्या मराठी’ चा शोध आणखी एका कारणासाठी वेधक आहे. तब्बल एका शतकानंतर, म्हणजे   १९१५ मध्ये ‘फेजेरवार्या सह्याद्रीनेसिस’ सापडल्यानंतर प्रथमच, पुण्यात किरकिऱ्या बेडकाची नवीन जाति सापडली आहे. उभयसृपशास्त्रातील शास्त्रज्ञांची वाढती रुची लक्षात घेता नक्कीच येत्या काळात अजूनही काही शोध लागू शकतील!

Section: General, Science, Ecology, Deep-dive Source:
Pune Wednesday, 16 January, 2019 - 09:46

“When will the monsoon arrive?” is a million dollar question in India as a sizeable population, practising agriculture, depends on the rains for its livelihood. In spite of the recent advances in monsoon prediction, accurately forecasting the monsoon rains and their intensity is still a challenge considering the complexity of the weather system. In a recent study, researchers at the University of Aizu, Japan, and Indian Institute of Tropical Meteorology, Pune, have proposed some improvements to existing monsoon-predicting models that could help precise prediction. An accurate monsoon forecast can help farmers plan agricultural activities and have early warning systems in place to prevent the loss of life and property by floods.

Studies have suggested that Coupled General Circulation Models (CGCM)—mathematical models that take into account the circulation of currents in atmospheric and oceanic systems—could help best predict the Indian Summer Monsoon (ISM). However, since the ISM is dependent on a vast number of regional and global factors, these models can be severely biased and consistently predict a higher or lower rainfall over a region. In this study, published in the journal Scientific Reports, the researchers have addressed one such bias with an improved model.

The researchers studied the bias in the rainfall predictions made by the National Centre for Environmental Prediction’s (NCEP) Climate Forecast System version-2 CGCM. This climate forecast system has been operational in India since 2011. In many climatic models over the years, there has been an underestimation of rainfall, also called a dry bias, over parts of central India, the northern Bay of Bengal and the Western Ghats, which hinders accurate predictions. This dry bias over central India results in the underestimation of rainfall by about 2–8 mm per day.

Through observations and models that focus on smaller regions, the researchers have analysed the effects of the warm coastal sea surface temperatures in the Bay of Bengal on this bias. In one of their experiments, the system in the ocean for June to September was studied using Mixed Layer Depth (MLD). Mixed layers in oceanic systems, are caused due to turbulence and lead to the mixing of water at different depths in the ocean. This mixing results in homogenisation of factors like salinity and temperature at different depths in the ocean, which otherwise would be different. It is essential to study these phenomena as they play a significant role in the climate.

The realistic representation of mixed layer structures, present in the study, has produced a clearer picture of the sea surface temperatures in the Bay of Bengal over a large area. By including this understanding in the climate prediction models, the researchers showed that the model captures the Indian Summer Monsoon rainfall well, particularly in central India, addressing the existing bias. The study provides a fresh perspective to improve the prediction system of the Indian Summer Monsoon. 

Section: General, Science, Ecology, News Source: Link
मुंबई Wednesday, 16 January, 2019 - 09:06

आईआईटी बॉम्बे के शोधकर्ताओं द्वारा निम्न-आय वर्ग के रहवासियों पर खराब रहवासों से होने वाले प्रभाव का अध्ययन 

जिस तेज़ी से दिन प्रतिदिन शहरों का विकास होता जा रहा है उसी तेज़ी के साथ शहरों में घर छोटे और महंगे होते जा रहे हैं। विशेषतौर पर निम्न आय वर्ग वाले परिवार के लिए, आर्थिक स्थिति के अनुसार जिन घरों में वे रह सकते हैं उन घरों का वातावरण उच्च तापमान और आर्द्रता वाला होता है। ऐसे वातावरण में रहने से श्वसन संबंधी समस्याएँ, हृदय रोग, लगातार दर्द बने रहना और सिर दर्द की समस्याएँ होती हैं। लेकिन डैटा की कमी के अभाव के चलते इस कमी को पूरा नहीं किया जा सका है। अपनी तरह का यह पहला अध्ययन है जिसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है कि चॉल जैसी हवा की आवाजाही न होने वाले आवासों में रहने से वहाँ के रहवासियों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है। और साथ ही इन घरों के पुनर्निर्माण के लिए भी कुछ उद्देशात्मक सुझाव दिए गए हैं।

यह अध्ययन हेबिटेट इंटरनेशल पत्रिका में प्रकाशित हुआ है इसमें शोधकर्ताओं ने मुंबई के चार इलाकों में पूर्ववर्ती बॉम्बे विकास विभाग द्वारा निर्मित १२० घरों में रहने की स्थिति की जांच की। मूलरूप से ये चॉलें एक व्यक्ति के रहने की जगह के तौर पर बनाई गईं थी जो केवल २०० वर्ग फीट का क्षेत्र है। इस इमारत में रहने के एक कमरे में ही किचन और इमारत के किनारे पर साझा  शौचालय की व्यवस्था है। घुटन भरी रहने की जगह, रखरखाव और स्वच्छता की कमी, पास की सड़कों का प्रदूषण और खाना पकाने के लिए केरोसीन का इस्तेमाल साथ ही हवा की आवाजाही न होने के कारण यहाँ रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य प्रभावित होता है।

हालाँकि स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने स्वास्थ्य केन्द्रों में इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की संख्या में   लगातार वृद्धि  देखी है और उनका कहना कि इसका कारण खराब हवा की गुणवत्ता हो सकती है लेकिन वे बिना डैटा के यह दावा नहीं कर सकते। चॉल के रहवासी स्वास्थ्य-सम्बंधी जानकारी नहीं देना चाहते थे। स्थानीय स्वास्थ केन्द्रों पर अपनी आवाजाही को सभी रहवासी साझा करने को तैयार थे, शोधकर्ताओं ने इस डैटा बिन्दुओं का उपयोग रहवासियों के स्वास्थ्य को बतलाने के लिए इस्तेमाल किया।

शोधकर्ताओं ने हवा की गुणवत्ता को मापने के लिए हवा का ‘स्थानीय माध्य आयु’ (LMA) मात्रक चुना। प्राध्यापक रोनीता बर्धन जो इस अध्ययन का नेतृत्व कर रही हैं बताती हैं कि, “हवा की औसत उम्र को औसत समय जो इमारत के एक क्षेत्र में संग्रहित खराब हवा के द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है।” 

वेंटिलेशन की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारक है। सरल शब्दों में, यह वह समय है कि ताज़ी हवा के प्रतिस्थापित करने से पहले कमरे में बासी हवा कितने समय तक बनी रही। इस प्रकार एक उचित हवादार कमरे में एलएमए कम पाया जाता है क्योंकि ताज़ी हवा का संचार लगातार होता रहता है। प्रायोगिक अध्ययन से पता चलता है कि यदि एक इमारत क्षेत्र के दरवाज़े और खिड़कियाँ बन्द हैं तो एलएमए मान ४६ मिनिट के करीब होता है जबकि वही दरवाज़ें और खिड़कियाँ खुली हैं तो एलएमए मान तीन मिनिट से भी कम हो सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि एलएमए एक ऐसा मानक है जो स्थानीय भाषा मराठी में समझना और समझाना आसान है।

शोधकर्ताओं ने इमारत की दिशा, उद्यानों,  सड़कों की उपस्थिति और इमारत के चारों ओर की बाधाओं, इमारत के क्षेत्र, दीवारों की मोटाई और उस क्षेत्र में खिड़कियों व दीवारों का अनुपात जैसे कारकों पर भी विचार किया। उन्होंने रहवासियों के दरवाज़े-खिड़कियाँ कितने समय तक खुले रहते हैं का भी सर्वे किया। उन्होंने स्थानीय मौसम डैटा लेने के साथ ही कुछ घरों में तापमान और आर्द्रता मापने वाले सेंसर भी स्थापित किए थे। शोधकर्ताओं ने इस जानकारी को इकट्ठा कर एक गणितीय मॉडल की मदद से एलएमए का आकलन किया।

अध्ययन के नतीजे इस ओर इशारा करते हैं कि खराब हवा में रहने वाले लोगों की तुलना में हवादार घरों के रहवासी कम बीमार पड़ते हैं और स्वास्थ केन्द्रों पर कम जाते हैं । हालाँकि ताज़ी हवा और स्वास्थ केन्द्रों पर जाने वाले लोगों की संख्या के बीच कोई महत्वपूर्ण सम्बंध नहीं देखा गया।

शोधकर्ताओं ने पाया है की  बाहरी व्यवधान एलएमए को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इनको हटाने से एलएमए को आधे तक कम किया जा सकता है। वह कहते हैं कि, “ इन परिवर्तनों के लिए नीति के स्तर पर कारवाई करने की आवश्यकता है ताकि उचित संशोधन किया जा सके और साथ ही ताज़ी हवा वाले रहवास के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सके।”

शोधकर्ताओं का यह कहना है कि, “स्थानीय अधिकारियों की भागीदारी से हमें चॉल में रहने वालों के वातावरण को समझने में बेहतर मदद मिली। हम वास्तविक समय में रहवासों के मानव-जगह परस्पर क्रियाओं का अध्ययन कर सकते हैं और लोगों के बीच रहने की जगह के सुग्राहीकरण की संरचना को संभव बना सकते हैं।”

नियोजन प्राधिकरणों के लिए अध्ययन के निष्कर्ष और सुझाव महत्वपूर्ण परिणाम  की तरह हो सकते हैं जो इन इमारतों की संरचना  को बदलने में मदद कर सकते हैं और साथ ही बीडीडी चॉल में रहने वाले लोगों को अपेक्षाकृत स्वस्थ जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।

Section: General, Science, Health, Society, Deep-dive Source:
Pune Wednesday, 16 January, 2019 - 07:46

The year 2018 was exciting for herpetologists in India as over 20 new species of frogs and geckos were discovered here. As we ring in 2019, the excitement continues to live on as researchers from Pune’s Savitribai Phule Pune University and the Zoological Survey of India, Kolkata, have discovered a new species of cricket frog from the northern Western Ghats in Maharashtra. They have detailed about the discovery in the journal Zootaxa.

Called Fejervarya Marathi, or the Marathi Fejervarya frog, named after the official language of the state where the frog is found. Fejervarya Marathi is currently known from only a few localities near Lonavala and Mulshi region of the western part of Pune district.

“The habitat preference being endemic to the northern Western Ghats, the Marathi Fejervarya frog could have possible distribution in other parts of adjacent districts Ahmednagar and Raigad”, says Dr Samadhan Phuge from Savitribai Phule Pune University, who is the lead author of the study.

The researchers used an integrative taxonomic approach and compared the newly discovered frog’s DNA, geographic range, calling pattern and morphology with similar frogs—Fejervarya cepfi, Fejervarya syhadrensis and Fejervarya granosa—all belonging to the same genus and known to share the same habitat.

It was observed that individuals of Fejervarya Marathi were found in water pools, paddy fields and grasslands and breed during the monsoon, as most frogs do. Their calls comprised of a series of 24 notes.

“Males generally sit in the vicinity of water pools and call for long periods with a single note of the call lasting for about 40 seconds, which is a unique character among other, similar-looking Fejervaryan frogs found in the same habitat. This unique call is useful for easy identification of this new species in the field”, say the authors.

The females were observed to lay eggs on the shallow end of pools, and the researchers reportedly observed crabs predating on these eggs.

The discovery of Fejervarya Marathi is sensational for another reason—it is the first cricket frog to be discovered in Pune after more than a century! The last one was Fejervarya syhadrensis in 1915. With rousing interest in herpetology, the year could hold more such discoveries in the offing! 

Section: General, Science, Ecology, Deep-dive Source: Link
Bhubaneswar Monday, 14 January, 2019 - 16:28

The word monsoon may bring to mind the incessant downpours, the lush green surroundings and the sweet smell of earth. Did you know that India, and South Asia, has two monsoons during the year? Yes, the summer or southwest monsoon from June to September, and the winter or northeast monsoon from October to December. In a recent study, researchers from the Indian Institute of Technology Bhubaneswar have tried to understand the pattern of winter rainfall over the last century.

Although the summer monsoon contributes to a significant part of the rainfall received in India, the winter monsoon brings rain to many parts of South India and adds to about 11% of the total annual precipitation. Parts of coastal Andhra Pradesh, Rayalaseema, south interior Karnataka, coastal Karnataka, Tamil Nadu and Kerala receive about 30-60% of the annual rainfall during this time. These monsoon rains also regulate the agricultural production in these areas.

In this study, the researchers have tried to understand the winter rainfall pattern in these areas and how they are affected by global warming. The study, funded by the Department of Agriculture, Cooperation & Farmers Welfare (DAC&FW), was published in the journal Theoretical and Applied Climatology. The researchers studied various aspects of winter monsoon, like the changes in the rainfall amounts in the region, also called variability of rainfall, and the changes in the local climate, in the southern parts of Peninsular India. They used data of 116 years, from 1901–2016, about the winter monsoon obtained from India Meteorological Department.

The researchers found that the variability of rainfall during the northeast monsoon has increased in the period between 1959–2016. They also observed that the seasonal rainfall has increased over Tamil Nadu, Rayalaseema, as well as south peninsular India because of an increase in the number of high-intensity rainfall events in the recent period compared to that between 1901–1958. However, in the other parts of south peninsular India, the seasonal rainfall has decreased. The study also found that the relationships between the winter monsoon and other climatic phenomena like the El-Niño Southern Oscillations (ENSO), the Indian Ocean Dipole or Indian Niño, and the summer monsoon have weakened in the recent decades after 1988.

The findings of the study could help design strategies for managing the odds associated with the winter monsoon rainfall, say the researchers.

“This study is very useful in determining the effects on various sectors due to the variability of heavy rainfall events over south peninsular India during this season and assists the risk management sectors in adapting advanced technologies for a sustainable future in the present global warming era”, they conclude.

Section: General, Science, News Source:

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