शोधकर्ताओं ने सिरेमिक आधारित शीतल-पट्टिकायें विकसित की हैं जो संगणक शीतलन में प्रयुक्त की जाने वाली ताम्र शीतल-पट्टिकाओं का स्थान लेकर लघु एवं सुसंबद्ध सर्किट बोर्ड का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

भारत में कुपोषण सम्बन्धी समस्या को समझने के लिए एक नवीन दृष्टिकोण

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मुंबई
1 मार्च 2021
भारत में कुपोषण सम्बन्धी समस्या को समझने के लिए एक नवीन दृष्टिकोण

चित्र: जयकिशन पटेल

आज भारत में सबसे बड़ी विडंबना संभवतः हमारे खाए जाने वाले भोजन को लेकर है। आज देश में दुनिया में कुल कुपोषित बच्चों का एक तिहाई भाग है, जबकि वर्ष 2018-19 में हमारा कृषि उत्पादन 285 मिलियन टन से अधिक था, जो वैश्विक स्तर पर प्रमुख देशों के कृषि उत्पादन में से एक है। पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों में आधी से अधिक अल्पपोषण के कारण होती हैं। आज भारत में बच्चों में कुपोषण, सूक्ष्म पोषक (माइक्रोन्यूट्रिएंट) तत्वों की कमी और बढ़ता मोटापा तिहरी समस्या के रूप में उभरा है।

गत वर्षों में, भारत में बाल पोषण में सुधार के लिए कई नीतियों को कार्यान्वित किया गया है। ऐसी ही एक पहल है राष्ट्रीय पोषण मिशन (एनएनएम) या पोषण अभियान जिसे 2018 में शुरू किया गया था। इस अभियान का लक्ष्य वर्ष 2022 तक 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में जन्म के समय कम वजन, रक्ताल्पता (एनीमिया) और वृद्धिरोध की व्यापकता को कम करना है। इस नीति के कार्यान्वयन के साथ साथ इसकी प्रभावशीलता की निगरानी करना भी महत्वपूर्ण है ताकि इसे और अधिक उन्नत और अद्यतित किया जा सके। हाल ही में, इंटरनेशनल जर्नल फॉर इक्विटी इन हैल्थ नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के शोधकर्ताओं ने देश में कुपोषण के तिहरे बोझ को समझने के लिए मानुष (MANUSH) नामक एक नई श्रेणी तकनीक का उपयोग किया है।

नीति निर्माताओं को निर्णय लेने के साथ साथ संसाधन और निधि आवंटन में सहायता करने के लिए कई स्वास्थ्य और पोषण सूचकांक जैसे SDG सूचकांक, खाद्य और पोषण सुरक्षा विश्लेषण और नीति आयोग का स्वास्थ्य सूचकांक आदि, जो नीति की प्रभावशीलता को प्रतिबिंबित करते हैं, विकसित किए गए हैं। इन सूचकांकों पर निकट से दृष्टि डालने पर पता चलता  है कि ये एक रेखीय एकत्रीकरण पद्धति या सरल औसत विधि के उपयोग को दर्शाते हैं। इस विधि में, विभिन्न मानदंडों के अंतर्गत नीति का प्रदर्शन केवल एक समग्र सूचकांक की गणना करने के लिए जोड़ा जाता है, जो बहुगामी संकेतकों को दर्शाता है। लेकिन, यह प्रभावी रूप से कुछ संकेतकों के खराब प्रदर्शन को छिपाकर एक  एकांगी वृद्धि पर आवरण डाल सकता है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी अल्टरनेटिव्ज फॉर रुरल एरियाज (सीटीएआरए) की वरिष्ठ शोधकर्ता आयुषी जैन कहती हैं कि, "सामान्य समग्र सूचकांक में, अंकगणित के औसत के  आधार पर एक संकेतक में खराब प्रदर्शन यथा वेस्टिंग , दूसरे संकेतक में सुधार यथा स्टंटिंग के द्वारा छिपा (मास्किंग) सकते हैं।" यहां तक कि मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) की गणना में उपयोग किए जाने वाले समग्र अनुक्रमण की ज्यामितीय माध्य विधि भी यह सुनिश्चित नहीं करती है, क्योंकि आर्थिक मोर्चे पर देश की प्रगति अपने कुछ संकेतको जैसे स्वास्थ्य सेवा आदि के मंथर प्रदर्शन को  छिपा सकती है।

उपरोक्त विधियों की सीमाओं से पार पाने के लिए, शोधकर्ताओं ने सूचकांक की गणना के लिए मानुष नामक तकनीक अनुप्रयुक्त की है। अध्ययन में सम्मिलित सीटीएआरए के प्राध्यापक सतीश अग्निहोत्री कहते हैं कि, "कुपोषण  एक बहुआयामी समस्या है और इसमें विकास दर का कम होना, कम वजन ,मोटापा और यहाँ तक कि शरीर में लोहे की कमी के कारण होने वाला रोग रक्ताल्पता (एनीमिया) आदि कई पक्ष सम्मिलित है"। मानुष तकनीक यह सुनिश्चित करती है कि, किसी भी सूचकांक पर विशिष्ट कारकों के अलग अलग प्रभाव पर विचार करने के अतिरिक्त , विभिन्न कारकों के बीच पारस्परिक संबंधों को भी ध्यान में रखा जाए। यदि लागू नीति दूसरों को अच्छी बनाने के लिए एक संकेतक की अवहेलना करती है तो सूचकांक इस पर नकारात्मक रूप में काम करेगा।

उदाहरण के लिए, एचडीआई के प्रकरण में, मानुष को आवश्यकता होगी कि खराब प्रदर्शन करने वाले संकेतक जैसे कि स्वास्थ्य सेवा को अच्छा प्रदर्शन करने वाले संकेतक जैसे आर्थिक विकास की तुलना में  तीव्र गति से सुधार करे ताकि विभिन्न संकेतकों के बीच समग्र अंतर कम हो जाए और विकास, अधिक संतुलित हो सके।

वर्तमान अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने कुपोषण के  तिहरे (ट्रिपल) बोझ के सूचकांक की गणना करने के लिए चार मापदंडों पर विचार किया। इसमें अविकसित और कमज़ोर बच्चों का अनुपात जो अल्पपोषण को दर्शाता है, रक्ताल्पता (एनेमिक) ग्रस्त बच्चों के अनुपात में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का संकेत है, और बच्चो का औसत वजन - कद का अनुपात दो से अधिक होना  जो मोटापा इंगित करता है, जैसा विश्व स्वास्थ्य संगठन बाल विकास मानकों से सम्बंधित है। वर्ष 2005-6 और 2015-16 , क्रमशः किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 3 एवं 4 (एनएफएचएस 3 एवं 4) के साथ 2016-18 में किये गए व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (CNNS) के अंतर्गत आने वाले सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एकत्रित पोषण और पारिवारिक स्वास्थ्य आधार-सामग्री का उपयोग करते हुए, उन्होंने 0 से 1 तक के मानुष आधारित सूचकांक अंकों की गणना की। इस सूचकांक की कम संख्या,, कुपोषण  के कम बोझ को दर्शाती है।

मानुष सूचकांक के अनुसार कुपोषण की तीव्रता के आधार पर शोधकर्ताओं ने राज्यों और जिलों को पांच वर्गों (निम्न, मध्यम, गंभीर, अति गंभीर और अत्यधिक गंभीर) में वर्गीकृत किया है। आयुषी कहती हैं, " तीव्रता के आधार पर राज्यों और जिलों का वर्गीकरण वैश्विक भूख सूचकांक या ग्लोबल हंगर इंडेक्स के वर्गीकरण पर आधारित है, क्योंकि इसे नीति निर्माताओं द्वारा व्यापक रूप से स्वीकारा एवं समझा जाता है।  तथापि राज्यों और जिलों के लिए निर्दिष्ट सीमा (कट-ऑफ), मानुष सूचकांक की सीमा और प्रसार के आधार पर  निर्धारित किए गए।" शोधकर्ताओं ने अवलोकन किया कि केरल, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक और गोवा को छोड़कर सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने दो एनएफएचएस सर्वेक्षणों के बीच मानुष सूचकांक में 2–25% की कमी दिखाई।  यह इस विश्लेषण में लिए गए अधिकांश संकेतकों में 2005 से 2016  की अवधि में हुए सुधार को दर्शाता है। मेघालय राज्य ने मानुष सूचकांक में सबसे अधिक सुधार दिखाया, जबकि मध्य प्रदेश और बिहार, जिन दोनों राज्यों पर देश में कुपोषण का सबसे अधिक बोझ पाया गया, सुधार क्रम में इसके तुरंत बाद रहे।

अधिकांश राज्यों और  केन्द्र शासित प्रदेशों ने कर्नाटक राज्य के अपवाद (जो अति गंभीर से  अत्यधिक गंभीर की श्रेणी में उतर गया)  के साथ गंभीरता के पैमाने पर अच्छा प्रदर्शन किया। गोवा, मध्यम से गंभीर हो गया, जो कि कमजोर पड़ने वाले कारकों में प्रगति की कमी की ओर दर्शाता है। केरल और जम्मू और कश्मीर अपने मानुष सूचकांक में वृद्धि के बावजूद, क्रमशः मध्यम और गंभीर श्रेणियों में बने रहे।

“यदि राज्य या जिला, गंभीर श्रेणी से निम्न श्रेणी में आता है, तो यह कुपोषण में तेजी से आई  कमी को दर्शाता है और इसे अन्य राज्यों / जिलों के लिए प्रेरणा स्रोत (रोल मॉडल) के रूप में सराहा और व्यवहार किया जाना चाहिए। लेकिन, अगर राज्य गंभीर से अति गंभीर स्थिति में चला जाता है, तो यह कुपोषण कम करने की गति में कमी का संकेत देता है, और इसके लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है, आयुषी व्याख्या करती हैं।" तथापि, अगर राज्य या जिला एक ही श्रेणी में रहता है या खराब श्रेणी (मध्यम से अधिक गंभीर श्रेणी) के अंतर्गत आ जाता है, तो इसके कारण को समझने के लिए अन्वेषण की आवश्यकता होगी और ऐसे  राज्यों / जिलों के प्रदर्शन में सुधार के लिए अधिक प्रयास करने होंगे ", वे जोड़ती हैं ।

हाल के सीएनएन सर्वेक्षण के साथ इसी तरह की तुलना से पता चला है कि कोई भी राज्य अत्यधिक गंभीर श्रेणी में नहीं आया है। मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और असम को छोड़कर सभी राज्यों ने एनएफएचएस -4 और सीएनएनएस के बीच मानुष सूचकांक में गिरावट दिखाई। केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में मानुष सूचकांक में उल्लेखनीय कमी आई। शासन की बेहतर गुणवत्ता और पिछले वर्षों में कुपोषण के निवारण के लिए उठाए गए कदम को इस सुधार के मुख्य कारक होने का श्रेय दिया जा सकता  है।

उन चरणों के बारे में बात करते हुए जो राज्यों को बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करते हैं डॉ अग्निहोत्री कहते हैं कि "तीन साल की उम्र से ऊपर के बच्चे के पूरक पोषण पर आप जितना व्यय करते हैं, उससे कहीं अधिक प्रभावी कारक हैं परिवार में माँ की शिक्षा, साधन, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता और खुले में शौच-मुक्त वातावरण का होना। “कुपोषण की सबसे अच्छी रोकथाम जीवन के पहले 1000 दिनों के भीतर, यानी गर्भावस्था के नौ महीने और जन्म के दो साल बाद तक होती है। उन्होंने  आगे बताया कि जो राज्य  इस अवधि में रोकथाम करते  हैं उन राज्यों में संतुलित विकास देखा गया है।

NFHS-4 डेटा से जिला-स्तरीय विश्लेषण ने मध्य क्षेत्रों से सीमाओं तक जाने पर कुपोषण की  तीव्रता कम होने  की ओर इंगित किया है। कुपोषण के गंभीर और अति गंभीर स्तरों वाले अधिकांश जिले मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, राजस्थान और गुजरात राज्यों में हैं। उसी राज्य के  अन्य जिलों ने भी अपने मानुष सूचकांक में अंतर दिखाया, जैसे उड़ीसा में मानुष सूचकांक 0.21 से 0.60 के बीच था, जो कुपोषण को कम करने में एकरूपता में कमी को दर्शाता है।

आयुषी कहती है, "एक राज्य के भीतर असमान प्रदर्शन शासन में  कमियों को दर्शाता है भले ही उसमे प्रशासनिक आधारभूत ढाँचा और प्रक्रियाएं समान हों। साथ ही हमारे  जिलों सम्बन्धी अध्ययन से भारत के विभिन्न राज्यों में अच्छे और खराब प्रदर्शन करने वाले जिलों के स्थानिक समूह का पता चलता है।  रोचक बात यह है कि ये समूह अधिक समरूप राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) क्षेत्रों के साथ मेल खाते हैं। इन 88 एनएसएसओ क्षेत्रों का गठन अन्य विशेषताओं के साथ भौगोलिक विशेषताओं, जनसंख्या घनत्व और फसल के स्वरुप (पैटर्न) में समरूपता के आधार पर किया गया था।

2018 के राष्ट्रीय पोषण मिशन (एनएसएस) ने वृद्धिरोध की व्यापकता के आधार पर जिलों को समूहीकृत किया। चूंकि कुपोषण, वृद्धिरोध, और रक्ताल्पता (एनीमिया) का एक संयोजन है, शोधकर्ताओं का तर्क है कि नीति को लागू करने के लिए केवल वृद्धिरोध पर विचार करने से धन और संसाधनों का अनुचित आवंटन होगा। आयुषी कहती हैं कि एक ही लाठी से सबको हांकने का दृष्टिकोण छोड़ते हुए  यह सूचकांक जिलों या एनएसएस क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, एक विशिष्ट निर्णय योजना को विकसित करते हुए एक ठोस निर्णय आधार  के रूप में काम कर सकता है।

जिलों के लिए मानुष सूचकांक का विश्लेषण करने और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर तीन चरणों में वर्गीकृत करने पर (चरण 1 को सर्वोच्च प्राथमिकता) शोधकर्ताओं ने पाया कि मानुष आधारित वर्गीकरण के चरण 1 में 45 जिलों में से, आठ जिले एनएनएम के चरण 3 एवं बाकी एनएनएम के चरण 2 के अंतर्गत आते हैं। यह असमानता उस दिशा  की ओर संकेत करती है जिसमे नीति कार्यान्वयन मिशन के अंतिम उद्देश्यों के अनुरूप नहीं है।

"मानुष सूचकांक सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले संकेतकों की पहचान करने में  सहायता करेगा। यह विभिन्न क्षेत्रों में न्यायोचित विकास में अंतर और संकेतकों में असमान विकास की सीमा के लिए आवश्यक है जिससे नियोजन को आवश्यकता के अनुरूप किया जा सके," प्राध्यापक अग्निहोत्री कहते हैं। इस तरह का विकेन्द्रीकृत और विशिष्ट नियोजन और उसका कार्यान्वयन, भारत में कुपोषण के तिहरे बोझ को दूर करने में मील का पत्थर साबित हो  सकता है।