फोटोनिक तत्वों की दक्षता वृद्धि हेतु शोधकर्ताओं ने सिलिकॉन नाइट्राइड के उपयोग की नवीन विधि विकसित की है, जो संचार एवं सूचना प्रसंस्करण के क्षेत्र में तेज, अधिक सुरक्षित एवं ऊर्जा-दक्ष प्रौद्योगिकी की दिशा में एक कदम है।

प्रभावी इलाज के लिए मलेरिया परजीवियों की प्रजातियों के विभेदन और निदान में विलम्ब को नई तकनीक से कम किया जा सकता है

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मुंबई
5 मार्च 2021
प्रभावी इलाज के लिए मलेरिया परजीवियों की प्रजातियों के विभेदन और निदान में विलम्ब को नई  तकनीक से कम किया जा सकता है

चित्र: सयैद अली

मलेरिया, मानव जाति को प्रभावित करने वाली  प्राणघाती बीमारियों में से एक है। वर्ष 2019 में दुनिया भर में इसके कारण 4 लाख से अधिक लोग मारे गए। मादा एनोफिलीज मच्छरों द्वारा संचारित, ये बीमारी प्लास्मोडियम नामक सूक्ष्म परजीवी की विभिन्न प्रजातियों के कारण होती है। इनमें से दो प्रजातियां प्लास्मोडियम विवैक्स और विशेष रूप से, प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम, मलेरिया की प्रचुरता का कारण बनती  हैं। फाल्सीपेरम मलेरिया के हल्के से बढ़कर गंभीर हो जाने के कई कारक हैं जैसे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति, रक्त में परजीवी स्तर, दिमाग जैसे विशिष्ट अंगों पर परजीवी आक्रमण आदि। बहुत से लोग परजीवी के प्रति अच्छी प्रतिरोध शक्ति रखते हैं, यहां तक ​​कि गंभीर रूप से संक्रमित होने पर भी उनमें बुखार, सिरदर्द या ठंड लगना जैसे महत्वपूर्ण लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। भारत में संक्रमण की गंभीरता का अनुमान लगाने के लिए वर्तमान में प्रयोग में आने वाली एक प्रयोगसिद्ध विधि, केवल रोगियों के अवलोकन और अनुभवों पर आधारित है।

हाल ही के एक अध्ययन में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के शोधकर्ताओं ने अपने सहयोगी अस्पतालों के साथ मिलकर प्रोटीनों की एक सूची बनाई है जो मलेरिया परजीवी प्रजातियों (प्लास्मोडियम विवैक्स या प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम)  को अलग करने और उनकी गंभीरता को जानने में सहायता कर सकती है। यह अध्ययन कम्यूनिकेशन बायोलॉजी - नेचर शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसे जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित किया गया था।

माइक्रोस्कोप का उपयोग करके मलेरिया का पता लगाने के लिए मानक प्रयोगशाला में परजीवी को चिह्नित करने के लिए संदिग्ध रोगियों के रक्त के नमूनों की जाँच करना सम्मिलित है। तथापि, यह संक्रमण के निदान में सहायता नहीं करता है। इसके अन्य उपाय जैसे आरएनए से रैपिड डायग्नोस्टिक्स टेस्ट (आरडीटी) और न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफिकेशन (एनएए) आदि हैं। एक ओर, आरडीटी त्वरित हैं लेकिन इसकी  मलेरिया परजीवियों के निदान के प्रति संवेदनशीलता और विशिष्टता कम है। हालांकि, कुछ स्थानों पर,  परजीवियों में निदान के लिए उपयोग किए जाने वाले जीन उत्परिवर्तन  (म्यूटेशन के कारण)  के विलोपन से गलत निदान हो जाता है। दूसरी ओर, एनएए अत्यधिक विशिष्ट है, लेकिन इसमें  सुसज्जित प्रयोगशाला और निरंतर विद्युत आपूर्ति की आवश्यकता होती है, जो ग्रामीण अंचल, मलेरिया-स्थानिक क्षेत्रों में एक  असम्भाव्य परिदृश्य है। इस प्रकार, मलेरिया परजीवियों के निदान और  विभेदन के लिए  उन्नत परीक्षणों की आवश्यकता है। यह न केवल बीमारी का पूर्वानुमान करने में सहायक होगा अपितु इसके उपचार की योजना को तैयार करने में भी सहायता करेगा।

“हमारे निष्कर्ष मलेरिया रोग के प्रति अति संवेदनशील आबादी को अपेक्षाकृत अच्छी गुणवत्ता वाला जीवन  प्रदान करने में मदद करेंगे। इसके साथ ही, यह न्यूनतम संसाधनों वाले देशों में व्यक्तियों के लिए एक प्रभावी और कुशल उपचार योजना प्रदान करेगा, जो रोगियों के बेहतर रोग निदान के कारण होगा,” भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई से सुश्री शालिनी अग्रवाल कहती हैं। वे इस अध्ययन में सम्मिलित शोधकर्ताओं में से एक हैं।

प्रोटीन जटिल अणु होते हैं जो हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। रासायनिक रूप से वे अमीनो एसिड से बने होते हैं, जो स्वयं पेप्टाइड्स से बने होते हैं। जब एक परजीवी मानव शरीर में प्रवेश  कर रहने लगता है तो यह उस शरीर के प्रोटीन में उतार-चढ़ाव करता है, जो शरीर में परजीवी के कारण होने वाले कोशीय और आणविक प्रभाव को प्रतिबिम्बित करता है।

शोधकर्ताओं ने फाल्सीपेरम मलेरिया, विवैक्स मलेरिया और डेंगू के गंभीर और हल्के मामलों के रोगियों के साथ-साथ स्वस्थ लोगों के समूह से रक्त के नमूने एकत्र किए। उन्होंने प्लाज्मा से सभी प्रोटीन (रक्त का हल्का-पीला तरल भाग जो प्रोटीन को शरीर के विभिन्न अंगों में पहुंचाता है) प्राप्त किए। तरल क्रोमैटोग्राफी और द्रव्यमान (मास) स्पेक्ट्रोमेट्री जैसी तकनीकों के संयोजन का उपयोग करते हुए, उन्होंने प्रोटीन की पहचान की और मात्रा का निर्धारण  किया। प्लाज्मा नमूनों में सम्मिलित प्रत्येक प्रकार के प्रोटीन को चोटियों (पीक्स) के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, जिसकी मात्रा इन चोटियों के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल के  बराबर होती है। वेब डेटाबेस पर उपलब्ध प्रोटीन अनुक्रमों के लिए चोटियों के स्पेक्ट्रा की तुलना करके, उन्होंने प्रोटीन की पहचान की और फाल्सीपेरम मलेरिया, विवैक्स मलेरिया और डेंगू के हल्के और गंभीर मामलों में उनकी मात्रा की तुलना की।

शोधकर्ताओं ने इस डेटा को प्रत्येक बीमारी और इसकी गंभीरता के उदाहरण के रूप में मशीन लर्निंग मॉडल में निरूपित किया। यह एक प्रकार का सांख्यिकीय एल्गोरिथम है, जो आगम (इनपुट) और  तत्सम्बन्धी ज्ञात परिणाम के बीच सार्थक संबंध बनाना सीख सकता है। मॉडल, मलेरिया और डेंगू के बीच हल्के और गंभीर मामलों को अलग करने के लिए इन सीखे गए संबंधो का उपयोग करता है। प्रशिक्षित मॉडल का उपयोग नए मामलों को वर्गीकृत करने और उनकी गंभीरता को जांचने में भी किया जा सकता है, इस प्रकार यह प्रोटीन को मलेरिया के लिए बायोमार्कर का एक संभावित नैदानिक ​​पैनल बनाता है।

शोधकर्ताओं ने आगे इस पैनल को प्लाज्मा के नमूनों में अंततः विकृत स्तर पर उपस्थित प्रोटीन तक सीमित कर दिया। उन्होंने गैर-गंभीर मामलों की तुलना में गंभीर फाल्सीपेरम मलेरिया रोगियों में असामान्य रूप से उच्च 25 प्रोटीनों को पाया। इन प्रोटीनों ने परजीवियों के विरुद्ध प्लेटलेट्स की सक्रियता को नियंत्रित किया और लाल रक्त कोशिकाओं (आरबीसी), जो छोटी रक्त वाहिकाओं को अवरोधित करते हुए गंभीर अंग क्षति  का कारण बनती है, का एकत्रीकरण किया। विवैक्स मलेरिया के गंभीर मामलों में  उन्होंने 45 प्रोटीन प्रचुरता में पाए, जो मानव आरबीसी के अंदर प्रतिरोधक शक्ति और परजीवियों की तीव्र वृद्धि का कारण थे।

शोधकर्ताओं ने मलेरिया के रोगियों में प्लासमोडियम फाल्सीपेरम से संबंधित छह परजीवी प्रोटीनों को भी निरंतर देखा है। ये प्रोटीन एंजाइमों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो परजीवी की रोग उत्पादक क्षमता को तेज करते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने फाल्सीपेरम मलेरिया, जिससे मस्तिष्क क्षति और अत्यधिक रक्ताल्पता (एनीमिया) के कारण होने वाली गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं, से जुड़े प्रोटीन की पहचान की।

इन प्रोटीनों की पहचान मलेरिया के गंभीर मामलों का पता लगाने और मलेरिया और डेंगू के बीच विभेदन करने के लिए नैदानिक ​​किट के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है। नैदानिक ​​उपयोग में, कोई भी मधुमेह या कोलेस्ट्रॉल परीक्षण की तरह, रोगी के नमूने में प्रोटीन के स्तर की एक निर्धारित मानक से तुलना करके इन बीमारियों का पता लगाने में सक्षम होगा। समय पर रोगनिदान रोगियों के समय पर उपचार में सहायता करेगा जिसके परिणाम सकारात्मक होंगे।

भारत में, जहाँ 85% आबादी मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रहती है, वर्तमान अध्ययन मलेरिया को नियंत्रित करने के लिए एक नया दृष्टिकोण देता है। अपनी योजनाओं के बारे में बताते हुए सुश्री शालिनी कहती हैं - “भविष्य में, हम इस जानकारी को डिप-चिप जाँच या एक उपयोगकर्ता के लिए मैत्रीपूर्ण किट के रूप में विकसित करना चाहते हैं, जहां प्रोटीन पैनल, जो रोग का विभेदन और पूर्वानुमान करने में सक्षम हैं, को उपचार  हेतु एक कुशल निदान के लिए एक सब्सट्रेट पर संचारित किया जा सकता है"।