भारतीय स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में अपशिष्ट प्रबंधन के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था पद्धति के सफल अंगीकरण हेतु आवश्यक कारकों की पहचान करता आईआईटी मुंबई का नवीन अध्ययन।

शिट चाय - जीवन बचाये!

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अगर कोई आपको ये कहे की किसी दूसरे व्यक्ति  का मल आपके लिए दवा सिद्ध हो सकता है, तो शायद आप उसे  पागल समझेंगे। आप उसका भरोसा करना तो दूर की बात बल्कि उसकी इस बेतुकी बात को हँसी में ज़रूर उड़ाने का सोचेंगे । यह बात अविश्वसनीय लगती है, लेकिन यह शत प्रतिशत सत्य है।

सूक्ष्म जीव  हमारे शरीर के अंदर और बाहर, हर उपलब्ध सतह पर मौजूद होते हैं। मानव कोशिकाओं के मुकाबले इनकी संख्या १० गुना अधिक होती है। हमारे सूक्ष्म जीवाणुओं- 'सुक्ष्मजीविता' का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिक सूक्ष्मदर्शी का उपयोग करने के साथ-साथ  डीएनए अनुक्रमण का उपयोग भी करते हैं। इन अध्ययनों से यह ज्ञात होता है कि सूक्ष्मजीवों की तादात और प्रकार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच अलग-अलग होती है। यह हमारे बीच स्वास्थ्य एवं बीमारी में अंतर के लिए भी जिम्मेदार हो सकता है। हमारे भीतर रहने वाले सूक्ष्म जीवाणू ज़्यादातर हमारे स्वास्थ्य हेतु फायदेमंद होते  है - वे प्रतिरक्षा विकसित करने, भोजन को पचाने एवं हानिकारक सूक्ष्म जीवों से लड़ने में भी मदद करते हैं और यहां तक कि वे हमारे शरीर की गंध को भी आकार देते हैं। दरअसल, सूक्ष्मजीविता के अनुक्रमित जीन, जिसे सामूहिक रूप से 'मानव सूक्ष्मजीव' कहा जाता है, और तो और नए एवं प्रभावी उपचारों में इनके अपार महत्व के चलते इन्हें  "दूसरा जीनोम" भी कहा गया है।

सूक्ष्मजीविता की विविधता को बनाये रखना मनुष्य के लिए अतिआवश्यक होता है। जब भी हमारे शरीर के अंदर एंटीबायोटिक दवाओं या फिर सफाई रासायनिकों का अधिक उपयोग होता है, तब यह लाभकारी सूक्ष्म जीवों में से अधिकांश को मार देता है। इस परिस्थिति में हानिकारक सूक्ष्मजीवों का पनपना बेहद आसान हो जाता है। यह शरीर के सामान्य कार्यों को भी बाधित करता है, जो हमें मोटापा, मधुमेह के प्रति संवेदनशील बनाता है और प्रतिरक्षा प्रणाली की बीमारियों के लिए जोखिम को बढ़ाता है।

कभी कभी एंटीबायोटिक दवाइयों के अतिसार का परिणाम कोलाइटिस (आंत की सूजन) हो सकता है । कोलाइटिस, जीवाणु क्लॉस्ट्रीडियम डिफ़्फीसिले के कारण होने वाली आंत की बिमारी को कहते हैं। इसके लक्षण में दस्त, बुखार, ऐंठन, आदि शामिल हैं और चरम परिस्थिति में मरीज़ की मृत्यु भी हो सकती  है। आखिरी उपाय के तौर पर, संक्रमण से लड़ने के लिए मरीज़ के बृहदान्त्र में अच्छे जीवाणुओं की तादात को पुनःस्थापित करने  हेतु डॉक्टर एक स्वस्थ दाता के बृहदान्त्र से मल लेकर मरीज़ की बृहदान्त्र में प्रत्यारोपित करते हैं। वास्तव में, घोड़ो और गायों में पाचन विकारों के इलाज के लिए मलीय प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को लम्बे समय से प्रयोग में लाया जाता रहा है। ऐसा करने के लिए पशु चिकित्सक एक स्वस्थ जानवर के मल का घोल बनाकर बीमार जानवर को पिलाते हैं और इसी घोल को 'मलीय चाय' अथवा 'शिट चाय' का अजीबोगरीब नाम दिया गया है।