एक ही क्षेत्र में भौगोलिक प्रतिबंधों के बिना नई प्रजातियों के विकास में पर्यावरणीय संसाधनों, जीन और प्रजातियों में प्रजनन की भूमिका की खोज आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने की है जिससे परंपरागत दृष्टिकोण पर उठा सवाल।

प्रकाश आधारित संवेदक के द्वारा रक्त शर्करा की निगरानी

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धनबाद
15 मई 2020
प्रकाश आधारित संवेदक के द्वारा रक्त शर्करा की निगरानी

एक नवीन अध्ययन के अंतर्गत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (भारतीय खनि विद्यापीठ), धनबाद के शोधकर्ताओं ने रक्त में शर्करा की निगरानी हेतु एक प्रकाश आधारित रक्त शर्करा संवेदक विकसित किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि  यह रक्त-शर्करा (रक्त में स्थित ग्लूकोज की मात्रा) को १० से २०० मिग्रा की विस्तृत सीमा तक माप सकता है। एक स्वस्थ वयस्क के लिए खाली पेट की स्थिति में रक्त शर्करा का औसत स्तर ७० से १२० मिलीग्राम/डेसीलीटर तक होता है।

जैविक नमूनों के विश्लेषण के लिए ये प्रकाश आधारित संवेदक, आसान उपयोग एवं क्षतिरहित परीक्षण अर्थात नॉनडिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग के चलते अब लोकप्रिय हो रहे हैं। ये संवेदक वांछित यौगिक की जांच के लिए सीधे ही परीक्षण नमूने में डाले जा सकते हैं। इस अध्ययन के शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तावित यह संवेदक "ऑप्टिकल रिंग रेज़ोनेटर" की कार्यप्रणाली पर आधारित है एवं रक्त-शर्करा के स्तर में होने वाले छोटे से छोटे परिवर्तन को भी पकड़ सकता है।

"ऑप्टिकल रिंग रेज़ोनेटर" अर्थात प्रकाशीय वलय अनुनादक को “व्हिसपरिंग गैलरी” के आधार पर समझा जा सकता है। “व्हिसपरिंग गैलरी” एक अवधारणा है जिसमें अपेक्षाकृत धीमी आवाज़ों वाली ध्वनि तरंगें आवर्धित होकर शीघ्र ही तीव्र शोर में परिवर्तित हो जाती हैं। इसी प्रकार प्रकाशीय अनुनादक में विशिष्ट तरंगदैर्ध्य वाली प्रकाश तरंग जब अनुनादक से होकर गुजरती है तो बार-बार होने वाले आंतरिक परावर्तन एवं प्रकाश के व्यतिकरण अर्थात इंटरफियरेंस ऑफ लाइट के कारण घनीभूत या सशक्त हो जाती है। प्रकाशीय वलय अनुनादक अत्यंत संवेदनशील होते हैं और यथार्थ पाठ्यांक अर्थात एकुरेट रीडिंग दर्शाते हैं क्योंकि इनमें अन्य अशुद्धियों की उपस्थिति से होने वाली विक्रतियां बहुत कम होती हैं। इस यंत्र की सहायता से विविध अणुओं और रसायनों का, साथ ही गैसीय अवस्था में भी परीक्षण किया जा सकता है।

प्रकाशीय वलय अनुनादकों का उपयोग विशिष्ट जैव-अणुओं जैसे प्रोटीन, जीवाणु, कोशिकाओं अथवा डी.एन.ए. नमूनों के अध्ययन के लिए किया जाता है। यह प्रकाश की उपस्थिति में इन जैव-अणुओं की गतिविधि एवं विचलन के आधार पर किया जाता है। जैव-अणु जिस माध्यम में उपस्थित होते हैं उसके अपवर्तनांक को परिवर्तित करते हुये, इसमें डुबोए गए अनुनादक यंत्र की अनुनाद अवस्था में विचलन उत्पन्न कर देते हैं। अनुनादी तरंगदैर्ध्य में होने वाला यह परिवर्तन माध्यम में उपस्थित जैव-अणुओं की संख्या से संबंधित होता है।

इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने प्रकाशीय अनुनादक का प्रयोग रक्त-नमूने में शर्करा के स्तर को मापने हेतु किया। शर्करा अणुओं की उपस्थिति अनुनादक के परिणामी प्रकाश को संशोधित कर देती है और इस संशोधन का परिमाण शर्करा अणुओं की संख्या पर निर्भर करता है। इस प्रकार इन अणुओं की संख्या को अप्रत्यक्ष रूप से परिणामी प्रकाश के मापन के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने दो प्रकार के तरंग पथप्रदर्शकों अर्थात वेव-गाइड (यंत्र जो तरंग को विशिष्ट दिशा प्रदान करता है) का उपयोग किया। स्लॉट तरंग पथप्रदर्शक में एक आयताकार नलिका में स्लॉट्स या खाँचे निहित होते हैं, जिसके माध्यम से तरंगें प्रसारित होती हैं, जबकि रिज़ तरंग पथप्रदर्शक में आयताकार नलिका के दो विपरीत फलकों पर रिज़ या उभार होते हैं। उन्होंने देखा कि खाँचा आधारित तरंग पथप्रदर्शक, उभारनुमा तरंग पथप्रदर्शक की तुलना में छह गुना अधिक संवेदनशील होते है। दोनों ही प्रकार के संवेदक, परीक्षण नमूने में स्थित शर्करा की मात्रा में होने वाले न्यूनतम परिवर्तन का पता लगाने में सक्षम पाए गए। 

इसके साथ, जबकि भारत विश्व की मधुमेह राजधानी हो रही है, ऐसे नवीनीकरण जो रक्त शर्करा के स्तर का आसान और सटीक मापन करने में सहायक हैं, हमें निगरानी रखने में मदद कर सकते हैं।