शोधकर्ताओं ने सिरेमिक आधारित शीतल-पट्टिकायें विकसित की हैं जो संगणक शीतलन में प्रयुक्त की जाने वाली ताम्र शीतल-पट्टिकाओं का स्थान लेकर लघु एवं सुसंबद्ध सर्किट बोर्ड का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

रहस्यमय फास्ट रेडियो बर्स्ट पर प्रकाश डालता नवीन सैद्धांतिक मॉडल

Read time: 1 min
Mumbai
3 जनवरी 2024
गुरुत्वीय तरंग ऊर्जा के फास्ट रेडियो बर्स्ट में रूपांतरण का प्रातिनिधिक चित्र

2007 में अमेरिकी खगोल भौतिकीविद् डंकन लॉरिमर एवं उनके छात्र, पल्सार के अभिलेखीय आँकड़ों का अवलोकन कर रहे थे। तारे के जीवन के अंत में सुपरनोवा (एक तारे का शक्तिशाली एवं प्रकाशमान विस्फोट) में विस्फोटित हो चुके उस तारे का स्पंदित अवशेष का अन्तर्भाग पल्सार कहलाता है। आँकड़ों का परीक्षण करते समय उन्होंने केवल कुछ मिलीसेकंड की एक असामान्य आकस्मिक ऊर्जा वृद्धि (एनर्जी स्पाइक) देखी। उन्होंने इसे लॉरिमर बर्स्ट कहा जो आगे चल कर फास्ट रेडियो बर्स्ट (एफआरबी) के नाम से जानी गयी। यह बर्स्ट भारी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित करने वाला एक संक्षिप्त स्पंद (शार्ट पल्स) था। इसकी ऊर्जा हमारे सूर्य की त्रिदिवसीय ऊर्जा के समतुल्य थी। इस प्रकार के 700 एफआरबी अब तक ज्ञात हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड से आते हुए देखे जा सकते हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनकी पुनरावृत्ति कई बार होती है। इन्हें दोहराए जाने वाले एफआरबी (रिपीटिंग एफआरबी) कहते हैं जो यादृच्छिक (रैंडम) एवं बिना किसी स्पष्ट अवधि के प्रतीत होते हैं। यद्यपि इन उच्च-ऊर्जा वाली क्षणिक ब्रह्मांडीय घटनाओं (ट्रांजियंट कॉस्मिक फिनोमिना) की उत्पत्ति रहस्यपूर्ण है।

एफआरबी को समझाने के लिए कई प्रयास किए गए हैं, जिनमें से कुछ असाधारण भौतिकी का प्रयोग करते हैं, जैसे प्राइमर्डियल ब्लैक होल विलय एवं कॉस्मिक स्ट्रिंग्स जो काल-अंतराल (स्पेसटाइम) पट-संरचना की सूक्ष्म दरारें हैं। किन्तु कोई भी स्पष्टीकरण अब तक एफआरबी की व्यापक व्याख्या नहीं कर सका है। सैद्धांतिक रूप से एफआरबी की व्याख्या करने हेतु इसके तीन प्रमुख अभिलक्षणों (कैरेक्टरिस्टिक्स) को सत्यापित करना आवश्यक है: इसकी अत्यधिक ऊर्जा जिसे पीक फ्लक्स कहा जाता है, इसके स्पंदन का अत्यधिक लघु समयमान (टाइम स्केल) जिसे पल्स विस्तार कहते हैं, एवं पल्स की सुसंगत (कोहेरेंट) प्रकृति जहां विद्युत चुम्बकीय तरंगें समान कला (सेम-फेज) में होती हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई (आईआईटी मुंबई) में प्राध्यापक शंकरनारायणन तथा उनके समूह सदस्य डॉ. आशु कुशवाह एवं डॉ. सुनील मलिक (वर्तमान में पॉट्सडैम, जर्मनी में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता) एफआरबी की उत्पत्ति का अध्ययन कर रहे हैं। रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी की मासिक समीक्षा पत्र में प्रकाशित एक नवीन अध्ययन में उन्होंने एक ऐसी युक्ति प्रस्तावित की है जो एफआरबी के तीनों अभिलक्षणों की व्याख्या करती है। उनके अध्ययन के अनुसार एफआरबी तब उत्पन्न होते हैं जब उच्च-आवृत्ति गुरुत्वीय तरंगों (हाई-फ़्रीक्वेंसी ग्रेविटेशनल वेव, एचएफजीडब्ल्यू) एवं शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र परस्पर क्रियाशील होते हैं।

“इन विस्फोट अभिलक्षणों (बर्स्ट कैरिक्टरिस्टिक्स) का विश्लेषण करते समय हमने पाया कि एक से दूसरे रूप में रूपांतरित होने का प्राकृतिक ऊर्जा संरक्षण सिद्धांत संभवत: इन अवलोकनों की व्याख्या कर सकता है। एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में गुरुत्वीय तरंग ऊर्जा के विद्युत चुम्बकीय तरंगों में रूपांतरण की गणना करने पर हमने देखा कि एफआरबी से संबंधित तीनों आवश्यक अभिलक्षण स्वाभाविक रूप से परिणामित हुए,” प्राध्यापक शंकरनारायणन एफआरबी के तीन आवश्यक अभिलक्षणों के आधार पर अपने मॉडल की सफलता को व्यक्त करते हुए कहते हैं।

गुरुत्वीय तरंगें समय-अंतराल (स्पेस-टाइम) की पट-संरचना में स्थित तरंगें हैं। जिस प्रकार पानी में फेंका गया एक कंकड़ पानी की सतह पर तरंग उत्पन्न करता है, ब्रह्मांड की ऊर्जा घटनाएं कुछ वैसी ही हैं। जैसे कि सुपरनोवा या ब्रह्मांडीय पिंडों का एक-दूसरे में सर्पिलन (स्पाइरलिंग) समय-अंतराल पट में लहर उत्पन्न करता है जो एक गुरुत्वीय तरंग की उत्पत्ति का कारण बनता है। विद्युत चुम्बकीय तरंगों के समान गुरुत्वीय तरंगों का भी एक वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) होता है। इस वर्णक्रम का विस्तार तारों की टक्कर जैसी अल्पमान ऊर्जा घटनाओं से उत्पन्न कम आवृत्ति तरंगों (किलोहर्ट्ज़ से मिलीहर्ट्ज़) से लेकर छोटे आकार के ब्लैक होल की टक्करों जैसी चरम घटनाओं से उत्पन्न बहुत उच्च आवृत्तियों (मेगाहर्ट्ज़ से गीगाहर्ट्ज़) तक होता है। आईआईटी मुंबई के अध्ययन के अनुसार मेगाहर्ट्ज से गीगाहर्ट्ज आवृत्ति विस्तार वाली गुरुत्वीय तरंगें जब अपने लंबवत स्थित शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र के साथ क्रियाशील होती हैं तब अल्पकालिक एफआरबी उत्पन्न करती हैं।

उनकी अवधारणा गर्टसेंश्टाइन-ज़ेल्डोविच प्रभाव नामक एक विधि पर आधारित है जो बताती है कि एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में गुरुत्वीय तरंग ऊर्जा का एक अंश विद्युत चुम्बकीय तरंगों जैसे कि रेडियो तरंगों में परिवर्तित हो जाता है।

“गर्टसेंश्टाइन एवं ज़ेल्डोविच ने 1960 और 1970 के दशक में इस ऊर्जा रूपांतरण प्रक्रिया की पहचान की एवं उसका अध्ययन किया। इसे 'ऊर्जा रूपांतरण' के सन्दर्भ में कुछ इस प्रकार से समझा जा सकता है जैसे पवन चक्कियों में यांत्रिक ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन। गर्टसेंश्टाइन-ज़ेल्डोविच प्रक्रिया में गुरुत्वीय तरंग ऊर्जा अपने लंबवत स्थित एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति में अपनी ऊर्जा के एक अंश को विद्युत चुम्बकीय तरंगों में परिवर्तित करती है, ” प्राध्यापक शंकरनारायणन बताते हैं।

आईआईटी मुंबई के नवीन अध्ययन के अनुसार न्यूट्रॉन तारे एवं मैग्निटार एफआरबी के लिए आवश्यक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र प्रदान कर सकते हैं। न्यूट्रॉन तारे सूर्य से 10 से 25 गुना अधिक द्रव्यमान वाले तारों के ढहे हुए अन्तर्भाग हैं जो सुपरनोवा में विस्फोटित हुए हैं, जबकि मैग्निटार अत्यधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाले न्यूट्रॉन तारे हैं। मान्यता है कि न्यूट्रॉन तारे किसी भी आकाशगंगा का लगभग 1% भाग हैं। इससे हमें प्रति आकाशगंगा, एफआरबी के अरबों संभावित स्रोत मिलते है। यद्यपि इन एफआरबी घटनाओं का पता लगाने की संभावना न्यून है। एफआरबी की खोज की संभावना में वृद्धि के लिए दो कारकों की सुनिश्चितता आवश्यक है: प्रथम, गुरुत्वीय तरंग को न्यूट्रॉन तारे या मैग्निटार के चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत गुजरना होगा, एवं द्वितीय, परिणामी विद्युत चुम्बकीय विस्फोट को प्रेक्षक की दृष्टि रेखा की दिशा में यात्रा करनी होगी। दूसरे शब्दों में जब इस विस्फोट तरंग की दिशा हमारे प्रेक्षण की दिशा में होगी तब ही हम इसे देख सकेंगे।

Schematic diagram illustrating Gertsenshtein-Zel'dovich mechanism leading to conversion of Gravitational Waves energy to Fast Radio Bursts signal
आरेखीय निरूपण: गुरुत्वीय तरंग ऊर्जा के फास्ट रेडियो बर्स्ट में रूपांतरण को दर्शाती गर्टसेंश्टाइन-ज़ेल्डोविच प्रक्रिया
छवि श्रेय : प्राध्यापक एस. शंकरनारायणन

प्रस्तावित शोध अवधारणा एफआरबी की उत्पत्ति संबंधी खगोल विज्ञान के दीर्घकालिक प्रश्न की व्याख्या कर सकती है। साथ ही यह व्याख्या, ब्रह्मांडीय स्ट्रिंग्स एवं प्राइमर्डियल ब्लैक होल जैसी सैद्धांतिक या अप्राप्य घटना अथवा वस्तुओं के उपयोग वाली असाधारण भौतिकी का सहारा नहीं लेती। यह नवीन प्रक्रिया वर्तमान संसूचन (डिटेक्शन) क्षमताओं से परे गुरुत्वीय तरंगों का निरीक्षण करने का एक नया मार्ग भी प्रशस्त करती है।

लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्ज़र्वेटरी, वर्गों इंटरफेरोमीटर एवं नैनोग्रेव जैसे उपकरणों पर आधारित प्रयोगों के साथ मनुष्य ने ब्रह्मांड में गुरुत्वीय तरंगों का अन्वेषण अभी प्रारम्भ किया है, किन्तु ये अभी किलोहर्ट्ज़ और नैनोहर्ट्ज़ जैसी अल्प आवृत्ति तरंगों का संसूचन कर रहे हैं। यद्यपि मेगा हर्ट्ज़ और गीगा हर्ट्ज़ विस्तार की गुरुत्वीय तरंगों के संसूचन के लिए ऑस्ट्रेलियाई हाई-फ़्रीक्वेंसी ग्रेविटेशनल वेव संसूचक या जापानी 100 मेगाहर्ट्ज ग्रेविटेशनल वेव संसूचक निर्मित किये जा चुके हैं, किंतु उच्च-आवृत्ति गुरुत्वीय तरंगों के संसूचन के लिए ये वर्षों या दशकों का समय ले सकते हैं। नवीन मॉडल उच्च-आवृत्ति गुरुत्वीय तरंगों के अप्रत्यक्ष संसूचन की दिशा में कार्यरत है एवं यह एफआरबी के अवलोकन के आधार पर उच्च-आवृत्ति गुरुत्वीय तरंगों की उपस्थिति को संसूचित करेगा।

अध्ययन दल पुनरावृत्ति वाले एफआरबी की व्याख्या करने के एक अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य की ओर भी अग्रसर हुआ है।

“इन एफआरबी में पुनरावृत्ति की कोई निश्चित अवधि न होने के कारण इनकी व्याख्या कर पाना बहुत कठिन है। भविष्य में पुनरावृत्ति वाले एफआरबी के अभिलक्षणों के अन्वेषण के लिए हम अपने मॉडल का विस्तार करने की संभावनायें खोज रहे हैं," लेखकों का कहना है।