फोटोनिक तत्वों की दक्षता वृद्धि हेतु शोधकर्ताओं ने सिलिकॉन नाइट्राइड के उपयोग की नवीन विधि विकसित की है, जो संचार एवं सूचना प्रसंस्करण के क्षेत्र में तेज, अधिक सुरक्षित एवं ऊर्जा-दक्ष प्रौद्योगिकी की दिशा में एक कदम है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के प्राध्यापक सुब्रमण्यम चंद्रमौली को वर्ष 2021 के लिए प्रतिष्ठित स्वर्णजयंती फैलोशिप से सम्मानित किया गया।

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मुंबई
20 दिसम्बर 2021
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई के प्राध्यापक सुब्रमण्यम चंद्रमौली को वर्ष 2021 के लिए प्रतिष्ठित स्वर्णजयंती फैलोशिप से सम्मानित किया गया।

प्राध्यापक सुब्रमण्यम चंद्रमौली, 2020-21 स्वर्णजयंती फैलोशिप के प्राप्तकर्ता

भारत की स्वतंत्रता के पचासवें वर्ष के उपलक्ष्य में स्वर्णजयंती फैलोशिप योजना का शुभारम्भ किया गया था। यह फैलोशिप प्रति वर्ष, कुछ चयनित युवा शोधकर्ताओं को जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, अभियांत्रिकी, गणित, चिकित्सा और भौतिकी के क्षेत्रों में उनके निरंतर उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान की जाती है। प्रति वर्ष, पुरस्कार विजेताओं का चयन एक कठोर -त्रिस्तरीय जाँच प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। इस फैलोशिप में प्रतिमाह 25,000 रूपये पुरस्कार राशि के साथ पांच साल के लिए मुक्तहस्त शोध अनुदान दिया जाता है। प्राध्यापक सुब्रमण्यम चंद्रमौली, रसायन विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई से रसायन विज्ञान के क्षेत्र में इस वर्ष (2020-21) इस प्रतिष्ठित फैलोशिप को प्राप्त करने वाले तीन पुरस्कार विजेताओं में से एक हैं।

प्राध्यापक चंद्रमौली कार्बन अपरूपों के सूक्ष्म रूप जैसे कार्बन नैनोट्यूब (सीएनटी), ग्राफीन और नाइट्रोजन और बोरॉन-डॉप्ड सीएनटी आदि जैसे नैनो कार्बन के संरचना-गुणों के संबंधों को समझने के कार्य का नेतृत्व कर रहे हैं। उनकी अनुप्रयोग-उन्मुख मौलिक शोध विभिन्न नैनोपदार्थो के विद्युत और उष्णा अपवाहन गुणों को समझने का प्रयास करती है और इस प्रकार ऊर्जा रूपांतरण और भंडारण के कार्य क्षेत्र में अनुप्रयोगों का विकास करती है। इस संबंध में, उनके स्वर्णजयंती फैलोशिप प्रस्ताव का उद्देश्य विभिन्न व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए सौर ऊर्जा से 'हरित ऊष्मा' उत्पन्न करना है।

समूचे भारत में, यहां तक कि सियाचिन और लद्दाख जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी सूर्य से प्रकाश ऊर्जा प्रचुर मात्रा में मिलती रहती है। अधिशेष सौर ऊर्जा का लाभ उठाते हुए, सरकार सौर ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने हेतु व्यापक स्तर पर अभियान चला रही है। पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा का लगभग 47% भाग अवरक्त क्षेत्र (इंफ्रारेड) में स्थित है। अधिकांश सौर पैनल पराबैंगनी प्रकाश और दृश्य प्रकाश के एक भाग को ही अवशोषित करते हैं, जो विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। तथापि, इंफ्रारेड भाग जो ऊष्मा घटक को वहन करता है, अनुपयोगी रह जाता है। प्रकाश ऊर्जा की इस प्रचुर आपूर्ति का अधिक से अधिक उपयोग किस प्रकार किया जाय यह चुनौती ही डॉ सुब्रमण्यम के फैलोशिप प्रस्ताव का आधार बनी।

प्राध्यापक सुब्रमण्यम कहते हैं कि, "हमने अपने आप से पूछा, 'क्या हम प्रकाश ऊर्जा को ऊष्मा में बदल सकते हैं?' इसका अर्थ यह है कि हम बिना किसी जीवाश्म ईंधन को जलाए हरित ऊष्मा उत्पन्न कर रहे हैं। साथ ही इस प्रकार का प्रकाश-से-ऊष्मा रूपांतरण पूरी तरह से धारणीय होना चाहिए।"

शोधकर्ता और उनके दल ने विभिन्न सतहों जैसे तांबा, कागज, प्लास्टिक आदि पर कार्बन नैनोस्ट्रक्चर आवरण (कोटिंग्स) लगाकर चुनौती पर नियंत्रण पा लिया, जो पूरे प्रकाश वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) के ब्रॉडबैंड अवशोषक के रूप में काम करते हैं। कार्बन नैनोस्ट्रक्चर में कीप (फ़नल) के आकार के तत्व होते हैं जिन्हें कार्बन पुष्पक (फ्लोरेट) जैसी संरचना बनाने के लिए एक साथ लपेटते हैं। एक बार प्रकाश जब इन शंक्वाकार संरचना के पदार्थो में प्रवेश कर जाता है, तो वह बाहर नहीं निकल पाता। यह अनेकों आंतरिक प्रतिबिंबों की सुविधा प्रदान करता है और इस प्रकार प्रकाश को बाहर जाने देने के स्थान पर मूल आधार की ओर निर्देशित करता है। इस प्रकार रसायन विज्ञान और विशेष संरचना का संयोजन इन संरचनाओं द्वारा सौर प्रकाश के उच्च अवशोषण को यथार्थ रूप देता है।

इसके अतिरिक्त, उच्च अवशोषण सुनिश्चित करने के लिए इस पदार्थ को अधिकतम काले कार्बन का उत्पादन करने के लिए प्रारूपित किया गया है। डॉ सुब्रमण्यम कहते हैं कि, "यह प्रारूप विकिरण के 98 % तक  उच्च अवशोषण को सुनिश्चित करता है। इसके अतिरिक्त, पुष्पक (फ्लोरेट) संरचना में एक बड़ा सतह क्षेत्र होता है, जिसके द्वारा प्रकाश-पदार्थ की प्रतिक्रिया के लिए एक उच्च अंतराफलक उपलब्ध किया जाता है।

दाहरण के लिए, एक ग्राम पदार्थ का क्षेत्रफल लगभग चार टेनिस कोर्ट के क्षेत्रफल के समकक्ष होता है। यही नहीं, नैनोपदार्थ पाउडर के रूप में उपलब्ध है जिसे एक तरल में तितर बितर किया जा सकता है और एक व्यावसायिक पिचकारी (स्प्रे गन) का उपयोग करके सतहों पर छिड़का जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये आवरण परिवेशीय परिस्थितियों में चार महीने तक चल सकेंगे।

इन नैनोस्ट्रक्चर में प्रकाश अवशोषण प्रचंड ऊष्मा उत्पन्न करता है। प्रयोगशाला प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि जब इन प्रतिरूपों को धूप में रखा जाता है, तो सतह का तापमान तुरंत 160 °C तक बढ़ जाता है। उत्पन्न ऊष्मा का उपयोग पानी के भाप में परिवर्तन हेतु किया जा सकता है। तत्पश्चात, भाप का उपयोग जल शोधन और विलवणीकरण द्वारा पीने योग्य पानी प्राप्त करने, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हीटिंग उद्देश्यों, और कई अन्य अनुप्रयोगों के लिए किया जा सकता है।

प्राध्यापक चंद्रमौली कहते हैं कि, "हमारा शोध प्रौद्योगिकी तैयारी में स्तर 3 चरण में है, अर्थात, हमारे पास एक प्रयोगशाला प्रोटोटाइप (मूलरूप) है जिसका वास्तविक बाहरी स्थितियों में बृहद स्तर पर परीक्षण किया गया है।" उन्होंने चीनी मिट्टी के बरतन और तांबे जैसी सतहों पर कार्बन नैनोस्ट्रक्चर की परत चढ़ा कर और प्रतिरूपों को सूर्य की रोशनी में रखकर प्रयोग किए। इसके बाद सतहों का तापमान तुरंत बढ़कर 145°C हो गया, जो प्रकाश के कुशल अवशोषण को दर्शाता है। यह फैलोशिप, उन्हें प्रकाश-पदार्थ की क्रिया के मूलभूत भौतिकी और ऐसी संरचनाओं में प्रकाश ऊर्जा के ऊष्मा ऊर्जा में रूपांतरण का अध्ययन करने में सहायक होगा। इसके अतिरिक्त, यह प्रयोगों को उन्नत करने और व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए उनका परीक्षण करने में भी सक्षम होगा जहां ऊष्मा उत्पादन की आवश्यकता होती है, उदाहरण के लिए, जल को गरम करना।

शीघ्र ही, हमारे पास पर्वतीय क्षेत्रों में क्रियान्वयन के लिए तैयार स्पेस-हीटिंग  मापांक (मॉड्यूल) का एक मूलरूप (प्रोटोटाइप) होगा," प्राध्यापक चंद्रमौली शोध के बारे में बताते हैं।

उनका दल छोटे घूर्णन ब्लेडों को लेपित करने के लिए समान कार्बन नैनोस्ट्रक्चर का उपयोग करके सूक्ष्म प्रकाश-मिलों का भी विकास कर रही है। प्रकाश मिलें अत्यधिक लघु पवन-चक्की जैसे उपकरण हैं जो प्रकाश उत्प्रेरित यांत्रिक गति द्वारा विद्युत उत्पन्न करते हैं। इस तरह के उपकरणों में माइक्रोफ्लुइडिक्स और जैविक प्रयोगों (लघु वाल्वों के माध्यम से तरल पदार्थ स्पंदित करने के लिए) में अनुप्रयोगों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है।