मेनिंजियोमा के निदान एवं पूर्वानुमान हेतु ट्यूमर एवं रक्त प्रतिदर्शों से प्रोटीनों के एक समूह को खोजा गया है, जो इसकी गंभीरता का अनुमान लगा सकता है।

वैज्ञानिकों ने प्रमुख जीन की पहचान की जो चावल को पानी की कमी के अनुकूल बनाने में मदद करते हैं

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हैदराबाद
15 जून 2020
वैज्ञानिकों ने प्रमुख जीन की पहचान की जो चावल को पानी की कमी के अनुकूल बनाने में मदद करते हैं

बहुत जल्द, दुनिया में जनसंख्या विस्फोट और पानी की कमी से  शायद आपको बिरयानी की थाली और कई लोगों को अपनी आजीविका से हाथ धोना पड़ सकता है। दुनिया भर में पानी की कमी के कारण हाल के वर्षों में दुनिया के लगभग ३.५ अरब से अधिक लोगों के लिए उनका मुख्य भोजन, चावल खतरे में आ गया है। परंपरागत रूप से, चावल  एक अधिक पानी की ज़रुरत वाली फसल है, जिसे खेतों में पानी भरकर उगाया जाता है। कृषि में पानी के संरक्षण का बढ़ता दबाव निश्चित तौर पर चावल पर पड़ता है क्योंकि एक किलोग्राम अनाज का उत्पादन करने के लिए लगभग ४०००-५००० लीटर पानी की आवश्यकता होती है! इसलिए, दुनिया भर के वैज्ञानिक चावल की ऐसी किस्मों का विकास कर रहे हैं जिसमें पानी का उपयोग कम हो तथा बिना जल से भरे खेतों में आसानी से वायु संचारण के सहारे पैदा किया जा सके। ऐसे चावल को 'वायुजीवी चावल' कहा जाता है।

हाल ही में एक अध्ययन में, आईसीएआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ राइस रिसर्च, हैदराबाद और तेलंगाना स्टेट एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने ऐसे जीन की पहचान की है जो वायुजीवी चावल को पानी के अभाव वाली परिस्थितियों के अनुकूलन में मदद करते हैं। वैज्ञानिकों ने आणविक स्तर पर कोशिका के आनुवंशिक तंत्र को प्रकट करने के लिए चावल के पौधे की कोशिकाओं में पाए जाने वाले आरएनए (राइबोन्यूक्लिक एसिड) का अनुक्रमण किया है। अध्ययन ‘ साइंटिफिक रिपोर्ट्स ‘ नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया था और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वित्त पोषित किया गया था

वैज्ञानिकों ने चावल की दो किस्मों की जड़ और टहनी का अध्ययन किया- एक वायुजीवी किस्म (सीआर धन 202) जो पूरी तरह से सूखी, पानी के अभाव वाली स्थितियों में उग सके और एक अन्य किस्म (बीपीटी 5204) जिसे पारंपरिक रूप से पानी से भरे खेतों में उगाया जाता है।  उन्होंने जड़ और टहनी के ऊतकों में मौजूद आरएनए का विश्लेषण किया और अगली पीढ़ी के अनुक्रमण नामक तकनीक के माध्यम से कोशिकाओं में मौजूद हजारों आरएनए के पैटर्न का अध्ययन  किया।

अनुक्रमण प्रक्रिया के परिणामों के आधार पर,वैज्ञानिकों ने जीन को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया। पहली श्रेणी में अनुलेखन कारक जीन थे, जो प्रोटीन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं। दूसरी श्रेणी में ट्रांसपोर्टर्स जीन थे जो एक विशिष्ट प्रोटीन  होते है जो कि ग्लूकोज और अन्य पोषक तत्वों को संयंत्र कोशिकाओं में पारित करने में मदद करते हैं। जीन की तीसरी श्रेणी जड़ विशेषता से जुड़े जीन थे, जो जड़ को विशिष्ट विशेषताएँ प्रदान करते हैं, जैसे इसकी लंबाई और गहराई, जो इसके कार्य के लिए आवश्यक हैं।

अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि पौधे की जड़ प्रणाली टहनी से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे पौधे को पानी के अभाव वाले वातावरण में मौजूद एरोबिक स्थितियों के लिए तैयार किया जाता है। जड़ों में व्यक्त महत्वपूर्ण जीनों में से एक DREB1F नामक एक अनुलेखन कारक जीन था, जो अवायवीय स्थितियों की तुलना में एरोबिक स्थितियों में १.५ गुना अधिक प्रोटीन का उत्पादन करता था। इसके अलावा, अकार्बनिक फॉस्फेट, PHT1; 6 के लिए ट्रांसपोर्टर जीन, अन्य की तुलना में एरोबिक किस्म में ४.४२  गुना अधिक व्यक्त होता है, जो दर्शाता है अनुकूलन में इसकी बहुत अधिक भूमिका हो सकती है। जड़ मूल से जुड़े जीन, ओएसएमटी 2 ए, को एरोबिक किस्म की जड़ों में लगभग तीन गुना अधिक पाया गया था, जो पानी की कमी वाली स्थिति में  जड़ों की संवेदनशील भूमिका को दर्शाता है।

“इस अध्ययन में चिन्हांकित किए गए जीन, पानी की अनुपलब्धता से निपटने के लिए चावल के आनुवंशिक सुधार के विचार को लागू करने के लिए दूसरों के लिए एक मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। इसके अलावा, इसी तरह के विचारों को अन्य महत्वपूर्ण फसलों के लिए भी विस्तारित किया जा सकता है ”, वैज्ञानिकों ने अपने निष्कर्षों के बारे में कहा। उन्हें एरोबिक अनुकूलन प्रदान करने में कुछ हार्मोन जैसे एथिलीन और एब्सिसिक एसिड के प्रमाण भी मिले। " वायुजीवी अनुकूलन का तंत्र, कुछ हद तक, सूखे की सहिष्णुता का अनुसरण करता है", वे कहते हैं।

यह अध्ययन चावल के वायुजीवी स्थितियों के अनुकूलन के पीछे आनुवंशिक तंत्र को जानने वाला पहला अध्ययन है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस ज्ञान का उपयोग अधिक किस्मों को विकसित करने के लिए किया जा सकता है जो जल-अभाव क्षेत्रों में उगाए जा सकते हैं और सूखे और निराशा के समय में दुनिया के पोषण / में मदद कर सकते हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो 105.4 मिलियन वाला / चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, और जहाँ चावल की खेती वाली जमीन के सिर्फ आधे हिस्से में ही सिंचाई होती है , यह अध्ययन यह उम्मीद जगाता है कि किसी को पानी की कमी के कारण भूखा नहीं रहना पड़ेगा।

सारांश: बहुत जल्द, दुनिया में पानी और जनसंख्या विस्फोट की कमी से आपको बिरयानी की थाली, और कई लोगों के लिए, उनकी आजीविका, खतरे में पड़ सकती है। आईसीएआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ राइस रिसर्च, हैदराबाद और तेलंगाना स्टेट एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने आवश्यक जीन की पहचान की है जो वायुजीवी चावल को पानी के अभाव वाली परिस्थितियों के अनुकूलन में मदद करते हैं।