भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई द्वारा विकसित एक आधुनिक स्मार्ट प्लेटफॉर्म मस्तिष्क रोगों से संबंधित बिखरी हुई जानकारी को एकीकृत कर जैव-चिह्नकों की सहज पहचान, उपचार के विकल्पों की खोज और औषध-योग्य लक्ष्यों के सटीक निर्धारण में सहायता करता है।

मस्तिष्क के रहस्य सुलझाने की नई पहल : ब्रेनप्रॉट और ड्रगप्रॉटएआई के माध्यम से अनुसंधान को नई दिशा

Mumbai
The schematic image of BrainProt

अल्जाइमर, पार्किंसंस रोग या मस्तिष्क के ट्यूमर जैसे विकारों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं और चिकित्सकों के सामने प्रायः एक चुनौती होती है कि उनके काम के लिए आवश्यक जानकारी व्यापक रूप से उपलब्ध तो है, परंतु वह बिखरी हुई मिलती है। मस्तिष्क रोगों के विकसित होने की प्रक्रिया को समझने के लिए चिकित्सीय अवलोकनों को आणविक साक्ष्यों के साथ जोड़ना आवश्यक है, जिनमें जीन, प्रोटीन, जैव-चिह्नक (बायोमार्कर) एवं कई सहस्र अध्ययनों से उत्पन्न प्रयोगात्मक डेटा शामिल होते हैं।

प्रत्येक नया अध्ययन जीन की अभिव्यक्ति के स्वरूप (सक्रीय जीन एवं कोशिकाओं की स्थिति), प्रोटीन के माप या रोगियों से प्राप्त अवलोकनों को जोड़ता रहता है। यद्यपि, यह जानकारी स्वतंत्र जीन और प्रोटीन डेटाबेस, बायोमार्कर भंडारों, औषधि संसाधनों और नैदानिक परीक्षण रजिस्ट्रियों में बिखरे हुई रहती है। शोधकर्ता और चिकित्सक इन संसाधनों को खोजने और सूचनाओं को जोड़ने में बहुत समय एवं प्रयास व्यतीत करते हैं। ऐसे बिखरे हुए प्रयास महत्वपूर्ण जैविक संबंधों को धुंधला कर सकते है, जिससे रोग की क्रियाविधि और रोग के बढ़ने के समय स्वस्थ मानव-मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तनों को समझने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के जैव विज्ञान और जैव अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक संजीव श्रीवास्तव के नेतृत्व में एक शोध दल ने भारत और विदेशों के विभिन्न शोध संस्थानों के शोधकर्ताओं के सहयोग से ‘ब्रेनप्रॉट संस्करण 3.0’ (BrainProt v3.0) विकसित किया है। यह एक ऐसा डेटाबेस है जो जीन से लेकर प्रोटीन तक विभिन्न प्रकार के जैविक डेटा को एक ही मंच पर संयोजित करता है ताकि स्वस्थ और रोगग्रस्त दोनों ही स्थितियों में मानव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे में व्यवस्थित अंतर्दृष्टि प्राप्त की जा सके।

ब्रेनप्रॉट पहली प्रणाली है जो ‘जीनोमिक्स’, ‘ट्रांसक्रिप्टोमिक्स’, ‘प्रोटिओमिक्स’ एवं जैव-चिह्नक अनुसंधान से विभिन्न रोगों संबंधी डेटा तथा विभिन्न डेटाबेस की जानकारी को एक पोर्टल में एकीकृत करती है। जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स और प्रोटिओमिक्स, किसी कोशिका, ऊतक या जीव के भीतर, क्रमशः डीएनए, आरएनए और प्रोटीन के स्वतंत्र घटकों को देखने के स्थान पर उनके संपूर्ण समूह से संबंधित अध्ययन होते हैं।

प्रा. संजीव श्रीवास्तव का कहना है, “ब्रेनप्रॉट में मानव मस्तिष्क के बाएं और दाएं भागों के मध्य 20 न्यूरोएनाटॉमिकल (तंत्रिका-शारीरिक) क्षेत्रों में प्रोटीन की अभिव्यक्ति में अंतर को पहचानने और समझने के संसाधन भी सम्मिलित हैं। यह अपनी तरह का पहला संसाधन है।”

‘मल्टी-ओमिक्स’ डेटा का यह एकीकरण जटिल डेटा के विश्लेषण और उनसे जीन और प्रोटीन में रोग संबंधी परिवर्तनों को प्रकट कर सकनेवाले अर्थपूर्ण विन्यासों की पहचान करने में लगने वाले समय को विशेष रूप से कम कर देता है। यह एकीकरण मस्तिष्क विकारों से जुड़े जैविक प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने और रोग प्रक्रियाओं को संचालित करने वाले प्रमुख जीन एवं प्रोटीन को उजागर करने में भी सहायता करता है। ब्रेनप्रॉट विभिन्न रोगों के डेटा की तुलना करने की सुविधा भी प्रदान करता है। ब्रेनप्रॉट के माध्यम से उत्पन्न अंतर्दृष्टि, चिकित्सा के लक्ष्य एवं किसी रोग पर उपयोगी औषधि को दूसरे रोग के लिए उपयोग करने की संभावनाओं को खोजने में सहायता कर सकती है।

ब्रेनप्रॉट में 56 मानव मस्तिष्क रोगों से संबंधित डेटा और 1,800 से अधिक रोगियों के नमूनों से प्राप्त 52 मल्टी-ओमिक्स डेटासेट सम्मिलित हैं। इन डेटासेट में 11 रोगों के लिए ट्रांसक्रिप्टोमिक डेटा और छह रोगों के लिए प्रोटिओमिक डेटा उपलब्ध हैं। प्रत्येक रोग के लिए उपयोगकर्ता उन जीन और प्रोटीन का परीक्षण कर सकते हैं जो पुनः-पुनः उस रोग से जुड़े पाए जाते हैं। साथ ही वे यह भी आकलन कर सकते हैं कि वर्तमान में उपलब्ध चिकित्सा और वैज्ञानिक डेटाबेस इन जीन और प्रोटीन का कितना दृढ़ता से समर्थन करते हैं तथा रोगियों के नमूनों में इनके गतिविधि के स्तर किस प्रकार परिवर्तित होते हैं।

ब्रेनप्रॉट अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. दीप्तरूप बिस्वास का कहना है, “नए विचार और प्रयोग वास्तव में तभी सार्थक होते हैं जब शोध के परिणाम हितधारकों के लिए दृश्य स्वरुप में देखने, अन्वेषण, व्याख्या एवं उपयोग हेतु सुलभ हों। इसी विचार से हमने इस जानकारी को एक उपयोग के लिए सुलभ प्लेटफॉर्म में एकीकृत किया है।”

जैव चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र में शोध संबंधी पूर्वाग्रह की संभावना रहती है, जहां शोधकर्ता और चिकित्सक कई बार व्यापक रूप से अध्ययन किए गए जीन और प्रोटीन के एक छोटे समूह को ही रोग के उपचार हेतु लक्ष्य के रूप में प्राथमिकता देते हैं। इस प्रक्रिया में अन्य कम अध्ययन किए गए किंतु जैविक रूप से महत्वपूर्ण जीन और प्रोटीन की अनदेखी हो सकती है। इस अध्ययन के सह-लेखक डॉ. अंकित हालदार का कहना है, “इन सभी साधनों अर्थात, जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, प्रोटिओमिक्स और बायोमार्कर विश्लेषण, को एकीकृत कर आप तुरंत यह देख सकते हैं कि कौन से चिह्नक विभिन्न एल्गोरिदम में बार-बार दिखाई देते हैं और शोध संबंधी पूर्वाग्रह कहां हो सकते हैं।” ब्रेनप्रॉट शोधकर्ताओं को उन चिह्नकों की पहचान करने में सहायता करता है जिन्हें वास्तव में कई प्रमाणों का समर्थन प्राप्त है और उनकी भी जिन पर दीर्घकाल से शोध केंद्रित होने के कारण आवश्यकता से अधिक अध्ययन किए गए हैं अथवा जिनपर कम अध्ययन केंद्रित हैं ।

वैज्ञानिक साहित्य में किसी विशेष मस्तिष्क रोग के साथ किसी जीन का कितना दृढ़ संबंध है, इसकी मात्रा निर्धारित करने के लिए यह प्रणाली ‘ब्रेन डिजीज मार्कर क्यूरेटर’ (बीडीएमसी) निर्देशांक की गणना करती है। यह बीडीएमसी निर्देशांक रोग-विशिष्ट होता है : प्रत्येक रोग के लिए हर जीन को एक स्कोर दिया जाता है जो यह दर्शाता है कि विभिन्न संपादित डेटाबेस और साहित्य खोजने वाले एल्गोरिदम में किसी रोग के लिए उस जीन का कितने सातत्य से संबंध बताया गया है।

ब्रेनप्रॉट विकास दल के श्री संज्योत विनायक शेनॉय का कहना है, “हम यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि एल्गोरिदम हजारों प्रोटीन/जीन में से सबसे अधिक संबंध दर्शाते चिह्नकों की पहचान कर सके—विशाल डेटा से यह खोजना चुनौतीपूर्ण है।”

शोधकर्ताओं ने इस प्रणाली की सटीकता की पुष्टि यह दिखाकर की कि अल्जाइमर के लिए ‘एमाइलॉयड प्रिकर्सर प्रोटीन’ और ग्लियोमा के लिए ‘ईजीएफआर’ जैसे प्रस्थापित रोग चिह्नकों को सही ढंग से उच्च स्कोर दिया गया और उन्हें शीर्ष स्थान पर रखा गया।

ब्रेनप्रॉट परिणामों को कुछ इस प्रकार प्रस्तुत करता है : चिह्नकों की रैंकिंग, रोगियों के नमूनों में उनकी अभिव्यक्ति का स्वरूप एवं बाहरी डेटाबेस के लिंक। यह जानकारी एक ही इंटरफेस पर एक साथ प्रदर्शित होती है। इस एकीकृत दृश्य के कारण जानकारी में पैटर्न की पहचान शीघ्रता से हो सकती है तथा शोधकर्ताओं को कई वेबसाइटों पर प्रति-परिक्षण किए बिना पिछले निष्कर्षों को जल्दी से सत्यापित करने में सहायता मिलती है।

ब्रेनप्रॉट में ‘ब्रेन डिजीज ड्रग फाइंडर’ (बीडीडीएफ; मस्तिष्क रोगों की औषधि खोजने वाला साधन) सम्मिलित है, जो औषधियों और रसायनों तथा 53 मस्तिष्क रोगों के नैदानिक परीक्षणों की एक व्यापक सूची है। बीडीडीएफ उपचारों को उनके आणविक लक्ष्यों से जोड़ता है एवं यह रेखांकित करता है कि प्रयोगात्मक उपचार कहां सफल हुए, कहां रुक गए या कहां बंद कर दिए गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि कोई पहलेसे उपयोग की जाने वाली औषधि इसी तरह के प्रोटीन को लक्षित करती है, तो प्रारंभिक सुरक्षा परीक्षणों की बहुधा आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि औषधि का मनुष्यों में परीक्षण पहले ही हो चुका है। इससे शोधकर्ता औषधि के किसी नए मस्तिष्क रोग पर काम करने की योग्यता पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, जिससे विकासकार्य के कई वर्षों की बचत हो सकती है।

इसके अतिरिक्त, आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने ड्रगप्रॉटएआई सॉफ्टवेयर साधन (DrugProtAI) विकसित किया है।

डॉ. हालदार का कहना है, “हम महंगे प्रयोग करने से पहले यह समझने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग तकनीकों का उपयोग करना चाहते थे कि क्या कोई प्रोटीन 'ड्रगेबल' अथवा ‘औषध-योग्य’ है, अर्थात उसमें एक उपयोगी औषध-लक्ष्य बनने के लिए आवश्यक जैविक और भौतिक विशेषताएं उपस्थित हैं या नहीं।”

यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में केवल लगभग 10 प्रतिशत मानव प्रोटीन के लिए ही एफडीए द्वारा अनुमोदित औषध उपलब्ध है, जबकि अन्य 3 से 4 प्रतिशत का परीक्षण हो रहा है।

वे आगे बताते हैं, “किसी प्रोटीन लक्ष्य पर वर्षों का काम निवेश करने से पहले, ड्रगप्रॉटएआई प्रोटीन के अनुक्रम से परे उसकी कोशिकीय स्थिति, संरचनात्मक गुणों और अन्य विशिष्ट विशेषताओं का विश्लेषण करके यह पूर्वानुमान देता है कि वह प्रोटीन औषध-योग्य है या नहीं।”

ड्रगप्रॉटएआई एक 'ड्रगेबिलिटी इंडेक्स' यानी औषध-योग्यता सूचकांक भी देता है। यह एक ऐसा स्कोर है जो बताता है कि किसी प्रोटीन के औषध-योग्य होने की कितनी संभावना है। उच्च स्कोर यह दर्शाता है कि उस प्रोटीन के गुण उन प्रोटीनों के समान हैं जिनके लिए पहले से ही अनुमोदित औषधियाँ विद्यमान हैं, जबकि कम स्कोर यह संकेत देता है कि उस पर औषधियों का विकास अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अपने प्रणाली के लाभ रेखांकित करते हुए डॉ. हालदार कहते हैं,“ड्रगप्रॉटएआई को सीधे ब्रेनप्रॉट में एकीकृत करके हमने एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित की है जिसमें शोधकर्ता किसी रोग चिह्नक की पहचान करना → उसके अभिव्यक्ति स्वरूपों का परीक्षण करना → उसके औषध-योग्यता का मूल्यांकन करना → पहले से उपलब्ध यौगिकों या नैदानिक परीक्षणों की खोज करना, यह पूरी प्रक्रिया को मात्र एक घंटे के भीतर संपन्न कर सकते हैं। ” 

ब्रेनप्रॉट एवं ड्रगप्रॉटएआई दोनों सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं और इनके ट्रेडमार्क आईआईटी मुंबई के अधीन हैं, जबकि इनके अंतर्निहित एल्गोरिदम कॉपीराइट द्वारा सुरक्षित हैं। ब्रेनप्रॉट अन्य वैज्ञानिक डेटाबेस के अपडेट होते ही वहां से नई जानकारी को स्वचालित रूप से प्राप्त और समाहित कर लेता है। ड्रगप्रॉटएआई को प्रतिवर्ष ड्रगबैंक के अद्यतन संस्करणों का उपयोग करके पुनर्गठित किया जाता है ताकि नए स्वीकृत औषध-लक्ष्यों के साथ इसके पूर्वानुमानों को सत्यापित किया जा सके। ड्रगबैंक एक व्यवस्थित डेटाबेस है जो औषधियों को उनके आणविक लक्ष्यों और चिकित्स्कीय स्थिति से जोड़ता है। 

शोधकर्ताओं ने, मॉडल के विकसित होने के बाद प्रकाशित हुए ड्रगबैंक के नए संस्करणों के साथ तुलना करके ड्रगप्रॉटएआई के अनुमानों का परीक्षण किया। उदाहरण के लिए, ‘इंटीग्रिन-लिंक्ड काइनेज’ नामक प्रोटीन के लिए अभी तक कोई स्वीकृत दवा नहीं है, लेकिन ड्रगप्रॉटएआई ने अनुमान दिया कि यह औषध-योग्य हो सकता है। अन्य शोधकर्ताओं ने हृदय रोगों में उच्च औषध-योग्यता वाले लक्ष्यों की पहचान करने के लिए भी ड्रगप्रॉटएआई का सन्दर्भ दिया है।

ब्रेनप्रॉट एवं ड्रगप्रॉटएआई शोधकर्ताओं को एक स्पष्ट और अधिक सुव्यवस्थित प्रारंभिक जानकारी प्रदान करते हैं।

डॉ. बिस्वास बताते हैं, “आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मेडिकल इमेजिंग के साथ-साथ अधिक विविध प्रकार के डेटा और मेटाडेटा को एकीकृत करना हमारा लक्ष्य है, जिससे यह प्लेटफॉर्म एक ‘मल्टीमोडल मानव-मस्तिष्क ज्ञानकोश’ के रूप में बदला जा सके और जिसका उद्देश्य भारत में न्यूरोसायन्स अनुसंधान को गति प्रदान करना हो।”

वित्तीय सूचना: यह अध्ययन मानव संसाधन विकास मंत्रालय-यूएवाई परियोजना, मर्क-सीओई और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से संपन्न हुआ।

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