आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने भारत की प्रतिष्ठित मकराना संगमरमर संरचनाओं की सुरक्षा के लिए तापीय अपक्षय का प्रयोगशाला में अनुकरण करने की कार्यविधि एवं एक महत्वपूर्ण सहसंबंध विकसित किया है।

भारत की मकराना संगमरमर धरोहर का संरक्षण : संगमरमर के अपक्षय का प्रयोगशाला में अनुकरण

Mumbai
भारत में मकराना संगमरमर की धरोहर.

राजस्थान के मकराना क्षेत्र में पाया जाने वाला अत्यंत सुंदर और धवल मकराना संगमरमर ताजमहल, दिलवाड़ा मंदिर और जसवंत थाड़ा की शोभा तो बढ़ाता ही है, साथ ही इन संरचनाओं को शताब्दियों तक सुदृढ़ भी बनाए रखता है। आईयूजीएस हेरिटेज स्टोन के रूप में प्रतिष्ठित मकराना संगमरमर एक अत्यंत दृढ़ धरोहर पाषाण है और यह जल रिसाव का प्रतिरोध करता है। तथापि, तापमान के अत्यधिक उतार-चढ़ाव, वर्षा और वायु इस पाषाण को क्षय कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश, बढ़ता प्रदूषण इस क्षति को और अधिक गंभीर बना देता है। इन मकराना संगमरमर की धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए पुनरुद्धार के प्रयास निरंतर जारी हैं, किंतु संरक्षण और जीर्णोद्धार की विधियों का चयन करने हेतु क्षति का स्तर और उसके प्रकार का सटीक आकलन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

एनपीजे हेरिटेज साइंस नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई की सुश्री अनुपमा घिमिरे और प्राध्यापक स्वाती मनोहर ने मकराना संगमरमर में होने वाली क्षति के स्तर एवं उसके प्रकार का सटीक अनुमान लगाने और उसका प्रयोगशाला में अनुरूपण करने हेतु, विधियों का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने विशेषतः मकराना संगमरमर में प्राकृतिक तापन और शीतलन चक्रों के प्रभावों का अनुकरण करने के लिए एक विस्तृत कार्यविधि का वर्णन किया है। उनका शोध प्रयोगशाला में संगमरमर के नमूनों में वांछित सरंध्रता का स्तर प्राप्त करने के लिए मानकीकृत और अनुकूलित कार्यविधि की कमी का समाधान करता है, जिससे वे नमूने प्रत्यक्ष क्षेत्र में अपक्षयित हुए वास्तविक पाषाण के समान हों।

इसके अतिरिक्त, घिमिरे और मनोहर के संशोधन ने मकराना संगमरमर के वास्तविक स्थान पर होने वाले परीक्षण को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाया है। संगमरमर के खंडों या स्थापित पट्टिकाओं को बिना हानि पहुँचाए उनकी आंतरिक गुणवत्ता, संरचनात्मक अखंडता और क्षति के आकलन के लिए सामान्यतः उपयोग की जाने वाली एक विधि 'अल्ट्रासोनिक पल्स वेलोसिटी' अर्थात पराश्रव्य स्पंद वेग (यूपीवी) परीक्षण है। इस परीक्षण में, संगमरमर के नमूनों या पट्टिकाओं के भीतर से ध्वनि स्पंद प्रवाहित की जाती हैं और इस नमूने में स्पंद के वेग का मापन किया जाता है। स्पंद के वेग में कमी संगमरमर के क्षति को दर्शाती है। घिमिरे और मनोहर ने 'ओपन पोरोसिटी' अर्थात खुली सरंध्रता—जो क्षति की मात्रा को निर्धारित करने वाला एक मापदंड है—एवं यूपीवी के मध्य एक सुस्पष्ट संबंध स्थापित किया है।

खान से निकाला गया मकराना का शुद्ध और नया संगमरमर अत्यंत सघन होता है। समय बीतने के साथ यह संगमरमर परतों के रूप में उखड़ने लगता है, इसके टुकड़े झड़ने लगते हैं और इस पर दाग-धब्बे पड़ जाते हैं। इसका पृष्ठतल विषम एवं ऊबड़-खाबड़ हो जाता है, तथा इसमें सूक्ष्म गड्ढे एवं दरारें पडने लगती हैं। यह क्षति वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा और पर्यटकों की आवाजाही जैसे कई भिन्न कारकों से जुड़ी होती है। विस्मयकारी तथ्य है कि, ताजमहल की संगमरमर की पृष्ठतल पर नीले रंग के दाग निकट के जल निकायों में पनपने वाले मच्छरों के मल के कारण हुए थे! शोधकर्ताओं का मत है कि यद्यपि विभिन्न पर्यावरणीय कारक संगमरमर में क्षति उत्पन्न करते हैं और उसे तीव्र करते हैं, किंतु इसका मूल कारण बहुधा तापमान में होने वाले परिवर्तन से संगमरमर की खुली सरंध्रता में होने वाली वृद्धि है।

खुली सरंध्रता संगमरमर में उपस्थित उन रिक्तियों या छिद्रों को दर्शाती है जिन तक उसके पृष्ठतल से सहज पहुँचा जा सकता है। यदि पृष्ठ पर अधिक रिक्तियां खुल जाती हैं, तो जल, वायु और प्रदूषक सरलता से संगमरमर के भीतर प्रवेश कर सकते हैं। निरंतर होने वाले तापीय परिवर्तन संगमरमर की खुली सरंध्रता को बढ़ा देते हैं, जिससे जल और अन्य अशुद्धियों को भीतर जाने का मार्ग मिल जाता है। यह प्रक्रिया पत्थर की संरचनात्मक अखंडता और सौंदर्य को प्रभावित करने के साथ ही इसके क्रमिक क्षरण का कारण बनती है।

इस अध्ययन का महत्व रेखांकित करते हुए शोधकर्ता बताते हैं,“चूँकि खानों से निकाले गए ताजे मकराना संगमरमर में सरंध्रता अत्यंत न्यून होती है, इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि तापीय अपक्षय इस गुण को कैसे प्रभावित करता है, ताकि धरोहर संरचनाओं में होने वाली क्षति का आकलन और उसका शमन किया जा सके।”

प्रयोगशाला में ऐसे नमूने विकसित करना जिनकी खुली सरंध्रता प्रत्यक्ष स्थल में क्षय हो रहे संगमरमर की खुली सरंध्रता के समान हों, पुनरुद्धार की रणनीतियों की खोज और परीक्षण में सहायता करता है। तथापि, वर्तमान में मकराना संगमरमर के प्राकृतिक अपक्षय का अनुकरण करने के लिए कोई प्रस्थापित अथवा अनुकूलित प्रयोगशाला प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है।

घिमिरे और मनोहर ने अत्यंत उच्च तापमान का उपयोग करके प्रयोगशाला में तापीय अपक्षय को तीव्र करने के लिए एक प्रयोग की रूपरेखा विकसित की। संगमरमर के 5 सेंटीमीटर के घनों को एक भट्टी में एक घंटे तक गर्म करना और उसके तुरंत बाद घनों को सामान्य तापमान पर विखनिजीकृत (डीआयोनाइज्ड) जल में डुबोकर ठंडा करना, एक तापीय चक्र कहलाता है। भट्टी इस प्रकार बनाई गई है कि संगमरमर का ऊष्मा स्रोत और दहन के सह-उत्पादों से संपर्क न हो, एवं वे संदूषण से बच सके। जल विखनिजीकृत है, अर्थात जल से सभी घुले हुए खनिजों को हटा दिया गया है, ताकि संगमरमर को होने वाली क्षति केवल तापन के कारण हो, न कि जल में उपस्थित किसी अशुद्धि के कारण।

शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक रूप से अपक्षयित धरोहर संगमरमर में देखी गई सरंध्रता के स्तर का अनुकरण करने के उद्देश्य से, विभिन्न तापमानों (180°C, 200°C, 300°C एवं 400°C) और प्रत्येक तापमान पर चक्रों की भिन्न-भिन्न संख्या के साथ प्रयोगों के विभिन्न समूह संचालित किए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि, “अध्ययन को 400°C के तापन तक ही सीमित रखा गया था, क्योंकि संगमरमर इस सीमा पर विघटित होना प्रारंभ कर देता है, और 500°C से ऊपर जाने पर यह विघटन और भी तीव्र हो जाता है।”

प्रत्येक चक्र के पश्चात, उन्होंने संगमरमर के भौतिक और यांत्रिक गुणों में होने वाले परिवर्तनों का परीक्षण किया। उन्होंने खुली सरंध्रता का मापन किया एवं दृश्य परिवर्तनों का आकलन भी किया। रासायनिक परिवर्तनों की पहचान करने हेतु उन्होंने ‘फोकस्ड आयन बीम-स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी’ तथा ‘एनर्जी डिस्पर्सिव स्पेक्ट्रोस्कोपी’ का उपयोग करके विस्तृत सूक्ष्म-संरचनात्मक विश्लेषण किया, साथ ही पराश्रव्य स्पंद वेग (यूपीवी) परीक्षण भी किए।

अपने प्रयोगों के आधार पर शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि प्रयोगशाला में लक्षित सरंध्रता प्राप्त करने के लिए पाँच से सात तापीय चक्र इष्टतम हैं, एवं इससे अधिक चक्रों के होने से सरंध्रता में कोई उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना नहीं है। शोधकर्ताओं ने विभिन्न तापमानों पर किए गए तापीय चक्रों के प्रयोगों से प्राप्त होने वाली खुली सरंध्रता के अनुमानों को भी अंकित किया है।

धरोहर संरचनाओं की क्षति के आकलन की वर्तमान पद्धतियों में दो प्रकार की तकनीकें सम्मिलित है। एक होती हैं भंजक तकनीकें, जिनमें पाषाण से छोटे नमूने निकालने की आवश्यकता होती है। दूसरे प्रकार की तकनीकों में यूपीवी परीक्षण, आर्द्रता मापी और त्रि-आयामी (3D) स्कैनिंग जैसी संरचनाओं को कोई भौतिक हानि के बिना परीक्षण करने वाली क्षतिरहित तकनीकें (नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग; एनडीटी) सम्मिलित है। एनडीटी परीक्षण विधियों के लिए, प्रत्यक्ष स्थल में किए गए मापन को भौतिक क्षरण के वास्तविक मापदंडों, जैसे सरंध्रता या सामग्री की शक्ति, के साथ सह-संबंध स्थापित करने की आवश्यकता होती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि, “चूंकि प्रत्येक प्रकार के पत्थर का व्यवहार भिन्न होता है, इसलिए जब तक ऐसे सह-संबंध स्थापित नहीं किए जाते, केवल एनडीटी परीक्षण के निष्कर्ष क्षति का योग्य संकेत नहीं देते। ईंटों और पत्थरों जैसी सामग्रियों के लिए सह-सम्बद्ध एनडीटी डेटासेट की उपलब्धता सीमित है, किंतु आधुनिक निर्माण की कंक्रीट जैसी प्रचलित सामग्रियों के लिए ये उपलब्ध हैं।”

शोधकर्ताओं ने पराश्रव्य स्पंद वेग (यूपीवी) और खुली सरंध्रता के मध्य संबंध दर्शाते आरेख के आधार पर एक ऐसा समीकरण भी विकसित किया है जो पराश्रव्य स्पंद वेग के मापन को खुली सरंध्रता के मानों के साथ सह-संबद्ध करता है।

प्रा. मनोहर स्पष्ट करती हैं कि, “स्थापित किया गया यह सह-संबंध, यूपीवी परीक्षण को एक एनडीटी परीक्षण तकनीक के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, जो वास्तविक संरचनाओं में उपस्थित समान संगमरमर के क्षरण का अनुमान लगा सके ।”

धरोहर संरक्षक अब संगमरमर की स्थिति का आकलन करने के लिए कार्यस्थल पर ही संरचना को कोई अतिरिक्त क्षति पहुँचाये बिना पराश्रव्य स्पंद वेग उपकरण का उपयोग कर सकते हैं, जो उसकी सरंध्रता का अनुमान लगाने की एक त्वरित और व्यावहारिक पद्धति प्रदान करता है।

तथापि, शोधकर्ताओं ने पाया कि जब खुली सरंध्रता एक निश्चित सीमा से अधिक हो गई, तब घनों के पराश्रव्य स्पंद वेग मापन में महत्वपूर्ण भिन्नता दिखाई दी। यह इस बात का संकेत है कि अत्यधिक क्षतिग्रस्त संगमरमर में खुली सरंध्रता का अनुमान लगाने के लिए यूपीवी परीक्षण विश्वसनीय नहीं रह जाता है।

“यह अध्ययन कई संभावनाओं के द्वार खोलता है, जैसे कि पराश्रव्य स्पंद वेग के उन सीमांत मूल्यों को निश्चित करना जो यह बता सकते हैं कि कब संरक्षण हेतु हस्तक्षेप की आवश्यकता है तथा दीर्घकालिक क्षरण के लिए पूर्वानुमानित मॉडल विकसित करना, सुवाह्य यूपीवी उपकरणों का उपयोग करके धरोहर संरचनाओं के क्षरण चित्र बनाना, और निरंतर धरोहर निगरानी के लिए एनडीटी परीक्षण आधारित डेटा को त्रि-आयामी (3D) डिजिटल ट्विन्स में एकीकृत करना। अतः यह कार्य भविष्य के डिजिटल और विज्ञान-आधारित संरक्षण अभ्यासों की सहायता करता है,” प्रा. मनोहर निष्कर्ष स्वरूप कहती हैं।


 

वित्त पोषण: यह कार्य आईआईटी मुंबई के माध्यम से डीमार्ट प्राइवेट लिमिटेड, भारत द्वारा वित्तपोषित किया गया (डीमार्ट फेलोशिप, DO/2023-FLSP002-001)।

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