आयआयटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने सफलतापूर्वक एक ऐसी रोबोटिक जोड़ी विकसित की है जो सूक्ष्मजीवों की भांति सटीक ‘रन-एंड-टम्बल’ गतिकी को स्वतः उत्पन्न करती है तथा समायोज्य है ।

रोबोट जोड़ी ने समझाए सूक्ष्म जीवों के गति के भौतिक नियम

Mumbai
Biomimicking robots and Chlamydomonas

अरबों वर्षों के उद्विकास के क्रम में जीवन ने निरंतर परिवर्तनशील वातावरण द्वारा प्रस्तुत अनेक चुनौतियों पर विजय प्राप्त करने के लिए, अत्यंत कुशल मार्ग खोज लिए हैं। जैसे-जैसे हमने आधुनिक विश्व का निर्माण करना प्रारंभ किया, हमने जीवों और जैविक प्रणालियों का अनुकरण करके कई समस्याओं के समाधान खोजे, जिसे जैव-अनुकृति या बायोमिमिक्री के रूप में जाना जाता है। यद्यपि जैव-अनुकृति का मुख्य उपयोग अभियांत्रिकी समाधान खोजने के लिए किया जाता है, परंतु यह कभी-कभी अनपेक्षित परिणाम भी दे सकता है, जो उन जीवों के बारे में एवं स्वयं जीवन के बारे में कुछ कहीं अधिक मूलभूत रहस्यों को उजागर करता है जिनका हम अनुकरण करते हैं।

ऐसी ही एक खोज में शोधकर्ताओं के एक दल ने शैवाल जैसे एककोशिकीय सूक्ष्म जीवों के जटिल और अनिश्चित तैरने के व्यवहार का अनुकरण करने हेतु, एक सरल तथा असूक्ष्म ‘टेबलटॉप’ रोबोटिक प्रणाली का निर्माण किया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के भौतिकी विभाग एवं आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ फिज़िकल सायन्सेस के शोधकर्ताओं ने रोबोटों की एक जोड़ी को इस प्रकार अभिकल्पित किया, जिसने पहली बार किसी कृत्रिम परिवेश में क्लैमिडोमोनास रेनहार्ड्टी जैसे तैरनेवाले सूक्ष्म जीवों द्वारा प्रदर्शित ‘रन-एंड-टम्बल’ नामक गति, यानि सीधे भागना एवं लुढ़कना का सटीक अनुकरण किया। अध्ययन के प्रमुख लेखक सोमनाथ परमाणिक (आईआईटी मुंबई) एवं उमाशंकर पारधी (आईआईटी मंडी) ने प्राध्यापक नितिन कुमार (आईआईटी मुंबई) एवं प्राध्यापक हर्ष सोनी (आईआईटी मंडी) के नेतृत्व में यह कार्य किया, जो हमें जीवन के सबसे मौलिक पहलुओं में से एक, अर्थात् गतिशीलता या चलने-फिरने की क्षमता को अधिक अच्छे प्रकार से समझने में सहायता कर सकता है। उनका अध्ययन फिज़िकल रिव्यू लेटर्स शोधपत्रिका में प्रकाशित हुआ है। 

‘रन-एंड-टम्बल’ गति जीवाणुओं और शैवालों जैसे सूक्ष्मजीवों में देखी जाने वाली सबसे सामान्य चलन प्रणालियों में से एक है। ऐसे जीव सामान्यतः एक अपेक्षाकृत सीधी रेखा में तैरते हैं जिसे ‘रन’, अर्थात भागना कहा जाता है और इसके पश्चात वे अचानक रुककर एक नई और यादृच्छिक (रैंडम) दिशा में मुड़ जाते हैं जिसे ‘टम्बल’ कहा जाता है, अर्थात लुढ़कना।

“क्लैमिडोमोनास एक एककोशिकीय शैवाल है जो अपने शरीर के अगले भाग में जुड़े हुए दो कशाभिका (फ्लैजेला) की सहायता से गमन करता है। फ्लैजेला केश जैसी संरचनाएं होती हैं, जिन्हें लयबद्ध प्रकार से चाबुक की भांति चलाकर क्लैमिडोमोनास एक सीधे पथ पर आगे की ओर तैरता है जिसे ‘रन’ चरण माना जाता है। यद्यपि कभी-कभी कशाभिका की लय लुप्त होती है, जिससे उनके गति में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप दिशा में अचानक परिवर्तन आ जाता है जो ‘टम्बल’ की घटना को जन्म देता है,” प्रा. नितिन कुमार समझाते हैं।

उस जीव का अनुकरण करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक रोबोटिक प्रतिरूप का निर्माण किया।

प्रा. कुमार बताते हैं, “हमने कशाभिका के स्थान पर दो स्व-चालित रोबोटों का उपयोग किया जो कठोर छड़ों (रॉड्स) के माध्यम से यांत्रिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।”

शोधकर्ताओं का प्राथमिक ध्यान दो रोबोट को यांत्रिक रीति से जोड़ने पर केंद्रित था। सूक्ष्मजीवों में दोनों कशाभिका (फ्लैजेला) के आधार एक सूक्ष्म आंतरिक संरचना द्वारा जुड़े होते हैं जिसे डिस्टल फाइबर कहा जाता है, अर्थात जीव के केन्द्रस्थान से दूरस्थ तंतु। इन तंतुओं के लचीलेपन एवं विन्यास में परिवर्तन से जीव को दिशा बदलने या लुढ़कने की क्षमता प्रदान होती है। पूर्व के अध्ययनों ने यह दर्शाया है कि यह जीव प्रकाश जैसे पर्यावरणीय संकेतों की प्रतिक्रिया के रूप में इस तंतु की संकुचनशीलता या कठोरता को परिवर्तित कर सकता है। यह भी माना जाता है कि यह तंतु शरीर के अक्ष के सापेक्ष जुड़े हुए स्थान के निकट कशाभिका के विन्यास को बदल देता है जिससे उनके तरण व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है।

‘रन-एंड-टम्बल’ गति में तंतु की भूमिका का अनुकरण करने के लिए शोधदल ने रोबोट जोड़ी को एक कठोर छड़ से जोड़ा, जिसे प्रत्येक रोबोट पर दर्पण-सममित और केंद्र से कुछ अंतर पर स्थित मध्याधार बिंदुओं (पीवट पॉइंट) पर जोड़ा गया था। इससे उन्होंने डिस्टल फाइबर की प्रतिकृति पायी। उन्होंने रोबोट जोड़ने वाले छड़ के दो मुख्य मापदंडों में परिवर्तन किया : मध्याधार बिंदु से रोबोट के केंद्र का अंतर एवं मध्याधार बिंदु और रोबोट के अभिविन्यास अक्ष (ओरिएंटेशन एक्सिस) के बीच का कोण। इन मापदंडों के माध्यम से संकुचनशील तंतु की समायोजन क्षमता के प्रभाव को रोबोट मॉडल में समाहित किया गया।

प्रा. सोनी के अनुसार, “हमारा लक्ष्य जटिल जैविक विवरणों पर निर्भर न रहते हुए गति के पीछे के आवश्यक भौतिक तत्वों को समझना था। इसलिए हमने मॉडल को सरल रखा।”

तैरने वाले सूक्ष्मजीवों के प्रतिरूपण में एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती होती है उनके वातावरण का पुनर्निर्माण करना। जीवाणु और शैवाल जैसे सूक्ष्मजीव इतने छोटे होते हैं कि उनके आसपास का जल उन्हें वैसा प्रतीत नहीं होता जैसा वह हम मनुष्यों को प्रतीत होता है। मनुष्यों के लिए जल हल्का होता है और सरलता से प्रवाहित होता है, परंतु इन सूक्ष्म जीवों के लिए वही जल एक घने द्रव की भांति व्यवहार करता है। इसी कारण सूक्ष्मजीवों के विश्व में घर्षण का प्रभुत्व होता है एवं संवेग (मोमेंटम) का कोई महत्व नहीं रह जाता। यदि वे स्वयं को आगे धकेलना बंद कर दें, तो उनकी गति त्वरित खंडित होती है। इस प्रकार की गति का वर्णन और अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिक प्रायः एक सरल सैद्धांतिक मॉडल का उपयोग करते हैं जिसमें निरंतर स्व-प्रणोदन (सेल्फ-प्रोपल्शन) द्वारा गति संचालित होती है, परंतु घर्षण द्वारा उसे अत्यधिक मंद किया जाता है। इस मॉडल को ओवरडैम्प्ड एक्टिव ब्राउनियन मोशन, अर्थात अति-मंदित सक्रीय ब्राउनियन गति (एबी) के रूप में जाना जाता है। तैरनेवाले सूक्ष्म जीव उच्च प्रतिरोध वाले वातावरण में कैसे गतिमान होते हैं यह समझने में यह मॉडल सहायता करता है। 

अपने अध्ययन में इस वातावरण के पुनर्निर्माण हेतु शोधकर्ताओं ने पहियों का उपयोग करके स्वयं को आगे धकेलने के लिए अपने रोबोट जोड़ी को प्रोग्राम किया। इसके पश्चात रोबोट जोड़ी को एक समतल और उच्च-घर्षण वाले पृष्ठतल पर रखा गया जहाँ पहिए बिना फिसले घूम सकते थे। इस व्यवस्था ने ओवरडैम्प्ड एक्टिव ब्राउनियन गति का सटीक अनुकरण किया।

“यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से जड़त्व को समाप्त कर देती है जिससे हमारे असूक्ष्म रोबोट, गति के उन्हीं भौतिक समीकरणों का पालन करने में सक्षम होते हैं जो जल में सूक्ष्म शैवालों को नियंत्रित करते हैं,” प्रा. कुमार का कहना है। रोबोटिक प्रतिरूपों एवं उचित वातावरण के स्थापित होने के पश्चात रोबोट जोड़ी को गति प्रदान की गई। आश्चर्यकारक तत्थ्य है कि रोबोट जोड़ी ने उल्लेखनीय रूप से वास्तविक शैवाल के समान गतिकी का प्रदर्शन किया। इस प्रणाली ने लंबे और लगभग सीधे गति वाले ‘रन’ चरण प्रदर्शित किए जिनके मध्य अचानक, तीव्र और दिशा बदलने वाली ‘टम्बल’ गति देखी गई।

“प्रत्येक रोबोट एक निश्चित परिमाण वाले सक्रिय बल का अनुभव करता है जिसकी दिशा यादृच्छिक (रैंडम) रूप से परिवर्तित होती रहती है और हमारे प्रयोगों में इस यादृच्छिकता के स्तर को बदला गया था। जब ये दोनों बल संयोगवश एक ही दिशा में संरेखित हो जाते हैं, तब रोबोट की जोड़ी एक सीधे मार्ग पर आगे बढ़ती है जो ‘रन’ चरण को निर्मित करती है। यादृच्छिक समय पर बलों का अपने आप ही संरेखण से भटक जाना एक कुल टॉर्क या बलाघूर्ण उत्पन्न करता है जो प्रणाली को पुनः अभिविन्यासित करता है और क्लैमिडोमोनास के ‘टम्बल’ गति के समान दिशा-परिवर्तन की घटना उत्पन्न करता है,” प्रा. कुमार स्पष्ट करते हैं। 

‘टम्बल’ से पहले रोबोट कितने समय तक सीधे भागता है इसका मापन शोधकर्ताओं ने किया। इस समय को ‘रन-टाइम’ कहा जाता है। यह समय तैरने वाले जीवाणुओं और शैवालों सहित वास्तविक सूक्ष्मजीवों में सर्वव्यापी रूप से देखे जाने वाले स्वरूप के समान ही था। इसके अतिरिक्त, ‘टम्बल’ की क्रिया अत्यंत तीव्र पाई गईं, जिसके परिणामस्वरूप कई बार दिशा में पूर्ण 180-डिग्री का परिवर्तन देखा गया, जो क्लैमिडोमोनास में किए गए अवलोकनों के समान है।

प्रा. हर्ष सोनी के नेतृत्व में बनाये गए सैद्धांतिक मॉडल के माध्यम से शोधकर्ताओं ने यह प्रदर्शित किया कि ‘रन’ स्थिति जुड़े रोबोट के स्थिर तथा निश्चित विन्यासों के अनुरूप होती है। ‘टम्बल’ स्थिति रोबोट के सक्रिय स्व-प्रणोदन बलों और संयोजी छड़ द्वारा उत्पन्न उनके संबंधित आघूर्णों यानी टॉर्क के बीच होने वाली अंतःक्रिया से अपने आप ही उत्पन्न होती है।

प्रा. सोनी टिप्पणी करते हैं, “वास्तव में हमारा वर्तमान कार्य यह दर्शाता है कि यही मॉडल क्लैमिडोमोनास में देखी जाने वाली स्पिनिंग यानी घूर्णन गति को समझने में भी सहायक हो सकता है।”

मापदंडों की समायोजन क्षमता महत्वपूर्ण सिद्ध हुई, क्योंकि संयोजी छड़ के कोण और अंतर को बदलकर शोधकर्ता ‘टम्बल’ क्रिया की आवृत्ति को नियंत्रित करने में सफल रहे। इस समायोजन क्षमता के कारण शोधकर्ता एक प्रावस्था-आरेख या ग्राफ बना सके, जो यह निर्धारित करता है कि स्थिर ‘रन’ चरण कब ‘टम्बल’ में परिवर्तित होता है। उदाहरणस्वरूप, जोड़ने के स्थान पर कोण के उच्च मानों के कारण आरेख में बिना ‘टम्बल’ वाला क्षेत्र प्राप्त हुआ, जिससे रोबोट लगभग अनिश्चित काल तक सीधे चलने में सक्षम रहा। यह समायोजन क्षमता प्रत्यक्ष इस बात का प्रतिरूप है कि कैसे वास्तविक जीव विभिन्न परिस्थितियों में तैरने के लिए अपने आंतरिक तंतु को समायोजित कर सकता है।

रोचक बात यह है कि उनके रोबोटिक प्रतिरूप से यह स्पष्ट होता है कि जीवों की ‘रन-एंड-टम्बल’ गति में आसपास के जल की भूमिका नगण्य होती है या होती ही नहीं। संपूर्ण ‘रन-एंड-टम्बल’ गति को केवल रोबोट जोड़ी और संयोजी छड़ की अंतःक्रिया को समायोजित करके पुनः निर्मित किया गया था।

प्रा. कुमार टिप्पणी करते हैं, “हमारा संपूर्ण प्रायोगिक ढांचा इस अनुमान पर आधारित था कि कशाभिकाओं के लयबद्ध और बिना लय के असंगत स्पंदन चक्रीय रूप से उत्पन्न करने के लिए जलगतिकी अंतःक्रियाएं आवश्यक नहीं हैं। हमारी रोबोटिक प्रणाली में यह स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो गया है, क्योंकि रोबोट एक सूखे और घर्षणयुक्त पृष्ठतल पर चलते हैं जहाँ जलगतिकी उपस्थित नहीं होती।”

वास्तविक शैवाल की गतिशीलता और समायोजन क्षमता का सटीक अनुकरण करने वाली इस रोबोट प्रणाली की सफलता, स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में स्वायत्त प्रकार के सूक्ष्म यंत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शोध सूक्ष्म जगत में गतिशीलता के अंतर्निहित भौतिक विज्ञान में एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। 

प्रा. सोनी का कहना है, “विभिन्न तरण प्रणालियाँ सरल भौतिक तंत्रों से कैसे उत्पन्न हो सकती हैं यह खोजने की एक पद्धति हमारे दृष्टिकोण से प्रदान होती, जो सक्रिय पदार्थ प्रणालियों (एक्टिव मैटर सिस्टम्स) के विस्तृत प्रकार के लिए संबंधित हो सकता है।”

अपने शोध से मौलिक जीव विज्ञान को मिलने वाली जानकारी के बारे में बात करते हुए प्रा. कुमार कहते हैं, “हमारे परिणामों से मिलने वाला एक प्रमुख पूर्वानुमान यह है कि जिस प्रकार मध्याधर बिंदु (पीवट) के कोणों को समायोजित करने से रोबोट अपनी ‘टम्बल’ की आवृत्ति और ‘रन’ की गति को बदलने में सक्षम होता है, ठीक उसी प्रकार क्लैमिडोमोनास भी अपने डिस्टल फाइबर के यांत्रिक गुणों को नियंत्रित करके लयबद्ध गति (‘रन’) एवं असंगत गति (‘टम्बल’) के बीच परिवर्तन कर सकता है।

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